श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
क्री०ख०-अ०१४९] * ब्रह्माजीके द्वारा व्यासदेवकी जिज्ञासाका समाधान * ६२७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] उपासनामें दत्तचित्त रहेंगे। ब्राह्मण भाँति-भाँतिके वेष धारण करके अपना उदर-भरण करने लगेंगे। कुछ क्षत्रिय अपने कुलोचित आचारसे भ्रष्ट होकर भिक्षावृत्तिसे भी जीवननिर्वाह करेंगे। लोग व्रत-नियमादिका अल्पमात्र भी अनुपालन नहीं करेंगे॥ २६-२८॥ पृथ्वीपर रहनेवाले लोग वर्णसांकर्यको जन्म देनेवाले कार्योंको करने लगेंगे और पतिव्रताएँ अपने पातिव्रत्यधर्मसे च्युत हो जायेंगी। सभी [वर्णाश्रमी] लोग म्लेच्छोंके समान पराये धनका अपहरण करनेवाले, दयाशून्य, कुमार्गगामी तथा सर्वदा सत्यसे रहित व्यवहार करनेवाले हो जायेंगे॥ २९-३०॥ भूमिमें सस्य अर्थात् फसल नहीं उगेगी और वृक्ष नीरस हो जायँगे। कन्याएँ पाँच-छः वर्षकी आयुमें ही प्रसव करने लगेंगी। कलियुगमें मनुष्योंकी परमायु सोलह वर्ष होगी अर्थात् उनकी अधिकतम सोलह वर्ष ही जीनेकी अवधि होगी। तीर्थ और देवालय अपने दिव्य स्वरूपको अन्तर्हित कर लेंगे॥ ३१-३२॥ जब इस प्रकार पाप बढ़ने लगेगा और धर्म क्षीण होता जायगा, तो देवगण [यज्ञ-यागादिके अभावमें] भूखों मरने लगेंगे। तब स्वाहाकार, स्वधाकार, वषट्कारादि [के माध्यमसे जो हविष्य देवता प्राप्त करते थे, उस]- के अभावके कारण भयाकुल हुए देवगण अनामय गजाननदेवकी शरणमें जायँगे॥ ३३-३४॥ वे सभी विघ्नोंका नाश करनेवाले उन देवेश्वर गजाननका भाँति-भाँतिसे स्तवन और अभिवन्दन करेंगे तथा प्रार्थना करेंगे। देवताओंकी ऐसी प्रार्थनाका पूर्णतः विचार करनेके उपरान्त भगवान् गजानन अवतार ग्रहण करेंगे। उस समय उनके सूपके जैसे कान होंगे और वे धूम्रवर्ण नामसे विख्यात होंगे॥ ३५-३६॥ क्रोधसे मानो जलते हुए भगवान् गजानन तब हाथमें खड्ग लेकर नीलवर्ण अश्वपर आरूढ़ होंगे और अपनी इच्छाके अनुरूप अनेक रूपोंवाली सेनाका निर्माण करेंगे। वे बिना प्रयत्न किये [अपने संकल्पबलसे] बड़े- बड़े अस्त्र-शस्त्रोंको प्रकट करेंगे और सेनाके सहयोग तथा अपने तेजसे उन महाम्लेच्छोंका वध करेंगे। उस
[दायाँ स्तम्भ] समय गजाननदेव उन सारे लोगोंका वध करेंगे, जो म्लेच्छोंके जैसा आचरण कर रहे होंगे॥ ३७-३८ १/२॥ वे देवेश्वर [वनों और] कन्दराओंमें छिपे तथा वनके कन्द-मूल, फल खाकर जीवन-निर्वाह करनेवाले ब्राह्मणोंको बुलवायेंगे और उन्हें समादृत करके भूमिदान करेंगे तथा समस्त जनताको सत्कर्मनिरत एवं सज्जन बनायेंगे अर्थात् लोगोंको अनुशासितकर नैतिक जीवन जीनेकी शिक्षा देंगे॥ ३९-४०॥ तब (उनके ऐसा करनेपर) सम्पूर्ण विश्व धर्ममर्यादामें आबद्ध हो जायगा और सत्ययुगका प्रारम्भ होगा। गजाननदेव इस प्रकार धूम्रवर्णावतारके द्वारा धर्ममर्यादाकी स्थापना करनेके अनन्तर अन्तर्धान हो जायँगे॥ ४१॥ हे अनघ व्यासजी! इस प्रकार मैंने महात्मा विघ्नेश्वरके चारों युगोंमें होनेवाले नाम तथा रूप तुमको बतलाये और उनके चित्र-विचित्र लीलाकृत्योंका भी सम्पूर्ण रूपसे वर्णन किया, जिनका केवल श्रवण करनेसे भी सभी प्राणी मोक्ष प्राप्त करते हैं॥ ४२-४३॥ गजाननदेवके स्वरूप अन्तहीन हैं, अतः [उनका समग्रतया] वर्णन कर पाना मेरी शक्तिके बाहर है। जिनकी महिमाका वर्णन करनेमें चारों वेद कुण्ठित हो जाते हैं, वहाँ मेरी अथवा मेरे जैसे किसी अन्य व्यक्तिकी तो बात ही क्या है? [हे व्यासजी!] अब आप अनुष्ठानके लिये प्रस्थान कीजिये और मैं भी अपने [सृष्टि-] प्रपंचको सम्हालता हूँ॥ ४४-४५॥ भृगुजी बोले—हे सोमकान्त! ब्रह्माजीके मुखसे सभी पापोंका नाश करनेवाली कथाका श्रवण करके व्यासजी बड़े प्रसन्न हुए और उनसे कहने लगे॥ ४६॥ मुनि बोले—इस परम अद्भुत आख्यानको सुनकर मैं तृप्त नहीं हो पा रहा हूँ। आपका मुझपर बड़ा अनुग्रह हुआ है, मैं धन्य हो गया हूँ; क्योंकि गणपतिचरित्र- मूलक इस कथानकके माध्यमसे आपने मेरे सभी सन्देह दूर कर दिये। इसे बारम्बार सुनकर भी मुझे वैसे ही तृप्ति नहीं मिल रही है, जैसे अमृत कितना ही पिया जाय, तृप्ति नहीं होती॥ ४७-४८॥ इस आख्यानके श्रवणमात्रसे जन्म-जन्मान्तरमें अर्जित
६२८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
पाप भी नष्ट हो जाते हैं तथा सभी अभिलाषाएँ पूर्ण हो | वनकी ओर चल पड़े। जहाँपर कन्द, फलादि सुलभ थे, जाती हैं। इस पुराणको सुननेका अवसर मनुष्योंको | निर्मल जल था। जहाँ वायुकी प्रबलता नहीं थी और न पूर्वकृत पुण्योंके कारण ही मिलता है। सर्वसिद्धिप्रद यह | अग्नि अथवा घामका ही भय था। ऐसे [उत्तम तपः] पुराण दुर्जनको सुनानेयोग्य नहीं है॥ ४९-५०॥ | स्थानपर आसनस्थ होकर एकाग्र चित्तसे व्यासजी भृगुजी बोले—इस प्रकार कहकर व्यासजीने | [गणपतिके] एकाक्षर मन्त्र (गं)-का जप करने लगे। स्वयम्भू ब्रह्माजीको प्रणाम किया और उनकी परिक्रमा | जब तपस्या करते-करते व्यासमुनिके बारह वर्ष बीत गये, करके तपस्याहेतु आज्ञा प्राप्त की, तत्पश्चात् वे उत्तम | तब भगवान् गजानन उनके समक्ष प्रकट हुए॥ ५१-५३॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'मुनिविसर्जन' नामक एक सौ उनचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १४९॥
एक सौ पचासवाँ अध्याय
व्यासमुनिको गणपतिदेवका साक्षात्कार और उनसे वरकी प्राप्ति
सोमकान्तने कहा— हे भृगुजी! उन महात्मा व्यासजीके समक्ष गजाननदेव किस रूपमें प्रादुर्भूत हुए, वह सब बतलाइये, क्योंकि उस (के श्रवण)-से पापनाश होता है॥ १॥
भृगुजी बोले— हे भूमिप! जिस प्रकार गजाननदेव व्यासजीके समक्ष प्रादुर्भूत हुए थे, वह सब वृत्तान्त मैं बता रहा हूँ, उसका तुम आदरपूर्वक श्रवण करो। [जिस समय वे प्रकट हुए, उस समय] गजाननदेवने रक्तवर्णकी पुष्पमाला, रक्तवस्त्र तथा रक्तगन्धानुलेपन धारण कर रखा था। सिन्दूरके लेपनके कारण उनका मस्तक अरुणाभ था। कमलके समान नेत्रोंवाले गणपति अनेक सूर्योंके समान प्रतिभासित हो रहे थे। वे [कानोंमें] दिव्य कुण्डल, [बाहुयुगलमें] बाजूबन्द, [मस्तकपर] मुकुट, [हाथोंमें कंकण] तथा [यज्ञोपवीतके रूपमें] शेषनागको धारणकर शोभित हो रहे थे॥ २-४॥
मुनिने जब गणपतिके ऐसे रूपको देखा तो आँखें मूँद लीं, वे भयभीत होकर काँप उठे और मन्त्रका चिन्तन करते हुए मूच्छित हो गये। [जब उनकी मूर्च्छा दूर हुई] तब गजाननने कहा—'हे मुनिसत्तम! भयभीत मत होइये। हे मुने! जिसका आप अहर्निश चिन्तन करते हैं और जो ब्रह्मा आदि देवताओंके लिये भी अगम्य है, वह मैं तुमको वर प्रदान करनेके लिये तुम्हारे समीप आया हूँ'॥ ५-६ १/२॥
भृगुजी बोले— इस प्रकारकी मधुरवाणी सुनकर मुनिश्रेष्ठ व्यासजी बड़े प्रसन्न हुए। गजाननदेवके चरणोंमें अपना मस्तक रखकर वे बारम्बार कहने लगे कि मैं धन्य हूँ, मेरे माता-पिता धन्य हैं, मेरी तपस्या धन्य है, यह पृथिवी धन्य है और [तपोवनके ये] वृक्ष धन्य हैं; क्योंकि सर्वरूप, गुणातीत, समस्त प्रपंचके आश्रय, चिदानन्दघन, अनन्त और सभी कारणोंके परमकारण [आप गजानन]-का मैंने साक्षात्कार किया है। वरप्रद गजाननका इस प्रकार स्तवन करके वे उनसे प्रार्थना करने लगे॥ ७-९॥
मुनि बोले— हे देवेश! मेरी समस्त भ्रमबुद्धिको दूर करके आप मुझे अपने प्रति स्थिर भक्तिभाव प्रदान कीजिये। मैं जिस प्रकार अठारह महापुराणोंके प्रणयनमें समर्थ हो सकूँ और आपका भी गुणगान करनेमें सक्षम हो सकूँ, वैसा [कृपापूर्ण] विधान कीजिये। हे अनघ! यदि आप प्रसन्न हैं तो मेरे हृदयमें निवास कीजिये॥ १०-११ १/२॥
गजानन बोले— वत्स! तुमने जो प्रार्थना की है, वह सब आज ही पूर्ण हो जायगी। व्यास नामवाले मुनिवर! आप सबके मान्य, सभी पवित्रोंको भी पवित्र करनेवाले, अपरोक्षज्ञान (अद्वैतबोध)-से सम्पन्न तथा गुरुओंके भी गुरु होंगे। आप प्रसिद्धि, सद्गुण, कीर्ति तथा श्रीके विषयमें नारायणके तुल्य होंगे। हे मुनीश्वर!
ब्रह्माजीके मुखसे मेरा माहात्म्य सुन लिया है, जिसके
क्री०ख०-अ०१५१ ] * गणेशपुराणके श्रवणसे राजाकी रोगनिवृत्ति * ६२९ आप अठारह पुराणों तथा उतने ही उपपुराणोंके प्रणेता बनेंगे। आपने पूर्वकालमें दम्भवश मेरा स्मरण-पूजन नहीं किया था, यही कारण है कि आपकी वाणी आश्चर्यजनक रीतिसे स्तम्भित हो गयी। हे अनघ! अब आपने ब्रह्माजीके मुखसे मेरा माहात्म्य सुन लिया है, जिसके कारण इस समय आपका समस्त [दम्भजनित] पाप विलीन हो चुका है। अब मैं तुम्हारे अन्तःकरणमें [निर्मल बोधके रूपमें] प्रविष्ट हो रहा हूँ॥ १२-१६१/२ ॥ भृगुजी बोले-ऐसा कहकर वे विभु व्यासमुनिके अन्तःकरणमें प्रविष्ट हो गये। [गणपतिके प्रवेश करते ही] मुनिवर व्यासजीने करोड़ों सूर्योंके जैसा अतुलनीय तेज प्राप्त कर लिया। वह [गणपतिका] तेज सभी दिशाओंको उद्भासित करने लगा। तदुपरान्त व्यासजीने गजाननकी एक विशाल मूर्ति बनवायी और उसे देवप्रासाद (देवमन्दिर)-में स्थापित कर दिया तथा उसका विविध उपचारोंसे पृथक्-पृथक् (उपचारोंके क्रमभेदसे) पूजन किया॥ १७-१९॥ यह सिद्धिक्षेत्र सभी लोगोंके नेत्रोंको पवित्र करनेवाला, शुभावह तथा मन्त्रानुष्ठानमें तत्पर जनोंको अनेकविध सिद्धियाँ देनेवाला होगा- ऐसा कहकर तथा उन गणपतिदेवसे अनुज्ञा प्राप्तकर नारायणस्वरूप व्यासदेवने [वहाँसे प्रस्थान किया और अपने आश्रममें आकर] ब्रह्माजीके मुखसे सुने गये उस गणेशपुराणका महर्षि वैशम्पायनको श्रवण कराया। इसके अनन्तर वह पुराण भूतलपर विख्यात हुआ॥ २०-२११/२ ॥ हे नृप! उसी पुराणको समग्ररूपमें आज मैंने तुम्हें सुनाया है। हे नृपसत्तम! इसके सदृश पवित्र करनेवाला कोई अन्य साधन तीनों लोकोंमें नहीं है। यह सभी लोगोंको परमानन्दकी प्राप्ति करानेवाला है॥ २२-२३ ॥ हे सोमकान्त! तुम्हें इस पुराणका प्रवचन कभी दुष्टोंसे नहीं करना चाहिये और विनयशील भक्तोंको प्रयत्नपूर्वक अवश्य ही सुनाना चाहिये। मैं तो इसका निरन्तर स्मरण और पारायण किया करता हूँ। हे राजसत्तम! तुमपर करुणा होनेके कारण मैंने इसे सुनाया है। तुमको गजाननदेवका निरन्तर ध्यान, स्मरण तथा [उनके मन्त्रका] जप करते रहना चाहिये॥ २४-२५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'व्यासानुग्रह-सिद्धिक्षेत्रवर्णन' नामक एक सौ पचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १५०॥ एक सौ इक्यावनवाँ अध्याय गणेशपुराणके श्रवणसे राजाकी रोगनिवृत्ति और गणपतिके द्वारा प्रेषित विमानपर आरूढ़ होकर परमधामगमन सूतजी बोले-राजा सोमकान्त मुनीश्वर भृगुसे इस प्रकार नित्यप्रति कथाश्रवण करते और कथाश्रवणके पुण्यकी भावना करके सूखे आम्रके मूलमें जल डाल देते। जब ऐसा करते हुए उनको एक वर्ष व्यतीत हो गया, तब वह आम्रवृक्ष पुराणश्रवणजनित पुण्यके प्रभावसे [नूतन] पल्लव, मंजरी और फलोंके कारण अतीव कान्तिमय तथा शोभासम्पन्न हो गया॥ १-२॥ वे सोमकान्त कुष्ठ व्याधिसे मुक्त और दिव्य कान्तिसम्पन्न हो गये। उनका शरीर व्रणरहित हो गया, शरीरसे निकलनेवाली दुर्गन्ध समाप्त हो गयी और उत्तम गन्ध आने लगी। राजा सोमकान्तको दसों दिशाओंमें फैलती हुई उत्तम गन्धसे युक्त, दिव्यदेह, कोटि-कोटि चन्द्रमाओंके सदृश आह्लादक, सूर्यतुल्य तेजस्वी और विषादशून्य देखकर लोग विस्मयमें पड़ गये कि अरे! यह तो वैसा अर्थात् गलित कुष्ठके कारण विकृत शरीरवाला था, फिर यह गणेशपुराणकी दोषहारिणी महिमाके प्रभावसे कैसे ऐसा अर्थात् नीरोग और सुदर्शन हो गया है?॥ ३-५॥ भृगुजी बोले-हे नृपशार्दूल! यह उपलब्धि तो तुम्हें पुराणश्रवणके कारण ही हुई है। अब तुम जाओ, जब वर्षभरकी लम्बी अवधिसे उत्कण्ठित अपने पुत्र, मन्त्रिगण और प्रजाजनोंको देखोगे तो
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६३० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ कॉलम]
बड़ी प्रसन्नता होगी ॥ ६१/२ ॥ सूतजी बोले—महर्षि भृगुकी ऐसी बातें सुनकर राजा सोमकान्त उनके चरणोंमें गिर पड़े और मानो आनन्दसागरमें डूबे हुए-से वे कहने लगे ॥ ७१/२ ॥ राजा बोले—हे मुने! मैंने आज आपके तपकी अद्भुत महिमाका दर्शन किया और पुराणश्रवणके महत्त्वका भी अनुभव किया, जिसके कारण कुष्ठसे गलती देहवाला मैं पतित व्यक्ति भी दिव्य शरीरवाला हो गया। हे मुनिसत्तम! इस [दिव्य] देहका निर्माण करनेवाले [सच्चे] माता-पिता तो आप ही हैं। [आपकी कथाका प्रभाव कुछ ऐसा है कि] रसहीन आम्रवृक्ष भी फल- पुष्पादिसे युक्त हो गया। इसलिये मैं आपको छोड़कर जाना ही नहीं चाहता, अब मुझे पुत्र (आदि बन्धु- बान्धवों) तथा प्रजाजनोंसे क्या प्रयोजन है? राजाके इस कथनको सुनकर महर्षि भृगु पुनः कहने लगे ॥ ८-११ ॥ भृगुजी बोले—हे जनेश्वर! जन्मान्तरीय पुण्योंके प्रभावसे तुमने मेरे द्वारा वर्णित इस श्लाघनीय पुराणका श्रवण किया, जिसके कारण तुम्हारा पाप नष्ट हो गया। [वास्तवमें] इस गणेशपुराणकी महिमाका वर्णन कर ही कौन सकता है? अब तुम अपने नगरको प्रस्थान करो और मेरा स्मरण करते रहना ॥ १२-१३ ॥ जब वे लोग इस प्रकार संवाद कर रहे थे, तभी उन्होंने एक विशाल विमान देखा, जो करोड़ों सूर्योंके समान तेजोमय था ॥ १४ ॥ भृगुजी बोले—हे नृप! तुम्हारे लिये ही यह अद्भुत विमान आया है। अब तुम इसपर आरूढ़ हो जाओ और गणपतिका सान्निध्य पानेके लिये प्रस्थान करो। हे राजन्! जिस विमानको मुनीश्वर साधनानुष्ठानादिके द्वारा भी नहीं प्राप्त कर पाते, उसे तुमने पुराणश्रवणके कारण हुए गणपतिके अनुग्रहसे पा लिया है ॥ १५-१६ ॥ जब वे लोग इस प्रकार वार्तालाप कर रहे थे, तभी विमान क्षणभरमें भूतलपर आ पहुँचा। उसमें विनायकके गण विद्यमान थे। चार भुजाओंसे युक्त वे गण मुकुट, बाजूबन्द, हार आदि आभूषणोंसे अलंकृत थे। उन्होंने दिव्य चन्दनानुलेपन तथा दिव्याम्बर धारण किया था।
[दायाँ कॉलम]
उनके हाथोंमें कमल तथा परशु शोभायमान थे। [उस विमानमें गणोंके साथ] नृत्य करती हुई किन्नरकन्याएँ थीं और मृदंग, ताल (एक विशिष्ट वाद्य) तथा करताल बजाते हुए किन्नर थे, जो गायन कर रहे थे। यह देखकर राजा सोमकान्त पुनः कहने लगे ॥ १७-१९ ॥ राजा बोले—हे मुनीश्वर! हे ब्रह्मन्! मैंने यद्यपि विमानोंकी चर्चा तो अनेक बार सुनी थी, किन्तु उसे प्रत्यक्ष देख पानेका सौभाग्य तो आज आपके तपोबलके कारण ही मुझे मिला है। आपकी महिमाका वर्णन बारम्बार बहुत-से मुखोंसे होता रहा है, जिसे मैं अपने कानोंसे सुनता आया हूँ, किंतु आपसे पुराणश्रवण करके मैंने उसका आज स्वयं अनुभव भी कर लिया है ॥ २०-२१ ॥ जब राजा इस प्रकार कह रहे थे, तभी वे दूत विमानसे उतरे और प्रणाम करके राजा सोमकान्तसे कहने लगे कि हे शुद्धात्मन्! तुमने पुराणश्रवणादिसे जो पुण्य अर्जित किया है, उसके कारण परात्पर गजाननदेवने तुम्हारा स्मरण किया है। उन्हींकी आज्ञासे हम दूत लोग पवित्र कीर्तिवाले तुमको ले जानेके लिये विमान लेकर आये हैं। अब तुम उस उत्तमोत्तम गणपतिलोकके लिये प्रस्थान करो। उन गजाननका दर्शन करके तुम जन्म- मरणसे मुक्त हो जाओगे और वहाँ गणपतिदेवके समीप जाकर उनके अनुग्रहसे तुम आत्यन्तिक सुख प्राप्त करोगे ॥ २२-२५ ॥ दूतोंकी वे बातें सुनकर राजाको देहका भान न रहा और सारा शरीर रोमांचित हो गया। वे गद्गद वाणीमें बोले—'हे निष्पाप दूतो! चराचर विश्वकी सृष्टि करनेवाले, निर्गुण, गुणोंको [सृष्टिहेतु] क्षुब्ध करनेवाले, विश्वके प्रधान कारण, दीनरक्षक, परात्पर उन गजाननदेवने कृपापूर्वक मेरा स्मरण किया है। ब्रह्मा आदि देवगण तथा सनक आदि परमर्षिगण ध्यानावस्थित होकर भी जिनका स्वरूपसाक्षात्कार नहीं कर पाते और जो अनन्त गुणोंसे परिपूर्ण हैं, उन्होंने मेरे लिये यह उत्तम विमान भेजा है ॥ २६-२८१/२ ॥ जो परम मायावी, नानाविध अवतार धारण करनेवाले तथा अनेकानेक रूपोंवाले हैं, उन गजाननदेवने मेरा
क्री०ख०-अ०१५२] * अमात्योंका राजसभामें जाकर हेमकण्ठको राजाके आगमनकी सूचना देना * ६३१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
किसलिये स्मरण किया, यह बात आश्चर्यजनक है?' ॥ २९१/२ ॥ राजाने इस प्रकार [दूतोंसे] कहकर महर्षि भृगुको नमस्कार किया और उनसे कहा—[हे मुनीश्वर!] आपके अनुग्रहके कारण और आपकी आज्ञासे अब मैं गजाननके विमानपर आरूढ़ होकर दूतोंके साथ प्रस्थान कर रहा हूँ, आप [कभी] मेरा विस्मरण नहीं कीजियेगा ॥ ३०-३१ ॥ सूतजी बोले-राजाके कथनको सुनकर सम्भ्रमविह्वल महर्षि भृगुके नेत्र आनन्दाश्रुपूरित हो गये, उनका शरीर रोमांचित हो उठा। भृगुजीने राजाको कण्ठसे लगा लिया और कहने लगे- 'हे नृपते! मैं बड़ा ही भाग्यहीन ब्राह्मण हूँ। तुमने उत्तम पुण्यफल प्राप्त किया है। गणेशलोकमें पहुँचकर मुझको कभी भूल मत जाना' ॥ ३२-३३ ॥ इस प्रकार [अपने-अपने मनोभावोंको एक-दूसरेसे] कहकर राजा सोमकान्त और महर्षि भृगु एक-दूसरेका हाथ पकड़े हुए [आश्रमसे] बाहर निकले। [तदुपरान्त] परमप्रसन्न राजाने उन मुनिवर भृगुको नमस्कार किया और दूतोंके कथनके कारण उतावले-से होकर उस विमानमें आरूढ़ हो गये। [राजाकी पत्नी] सुधर्मा तथा [राजाके अनुगामी] दोनों अमात्य भी उस उत्तम विमानपर आरूढ़ हुए। इसके बाद वे दूत भी विमानमें आरूढ़ हो गये। [विमानमें बज रहे] वाद्योंके घोषने दिग्दिगन्तको व्याप्त कर लिया। विमानकी शोभाको देखकर राजा सोमकान्त आनन्दमग्न हो गये ॥ ३४-३६ ॥ राजा सोचने लगे कि यह अवसर मुझे जन्मान्तरीय पुण्यके ही कारण प्राप्त हुआ है। इसके अनन्तर महर्षि भृगुके देखते-देखते विमान आकाशमें उड़ चला ॥ ३७ ॥ इस पार्थिव शरीरसे सर्वोत्कृष्ट पदकी प्राप्तिको देखकर राजा अत्यन्त विस्मित हुए और दूतोंको प्रणाम करके उस परम-धामकी ओर चल पड़े ॥ ३८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'सोमकान्तको विमानप्राप्तिका वर्णन' नामक एक सौ इक्यावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५१ ॥
एक सौ बावनवाँ अध्याय अमात्योंका राजसभामें जाकर हेमकण्ठको राजाके आगमनकी सूचना देना और उसी प्रसंगमें राजा सोमकान्तके ऊपर हुए गणपति-अनुग्रह आदिका वर्णन करना
सूतजी बोले-[विमानमें बैठे हुए] राजा सोमकान्तने ऊपरसे ही अपनी राजधानी देवपुरका अवलोकन किया और वहाँके मुख्यद्वार, अट्टालिका आदिकी स्वर्णिम कान्तिको देखकर बड़े प्रसन्न हुए ॥ १ ॥ तदुपरान्त [महारानी] सुधर्माने रमणीय सभाभवनको देखकर अपने पुत्रका स्मरण किया और स्नेहके कारण गद्गद वाणीसे कहने लगीं- 'मेरा पुत्र हेमकण्ठ भद्रासन-पर बैठा होगा और आज वर्षभरकी अवधि पूर्ण होनेसे वह हम माता-पिताकी प्रतीक्षा कर रहा होगा। हे स्वामिन्! हे कृपानिधे! आपको [वहाँ जाकर] उसे अवश्य ही दर्शन देना चाहिये।' तब पत्नीकी ऐसी बातको सुनकर राजा चिन्तित हो उठे ॥ २-४ ॥ राजा बोले-मेरा पुत्र हेमकण्ठ पता नहीं इस समय जीवित होगा या मर चुका होगा। मैंने उससे कहा था कि वर्षभरके बाद तुम मुझे देख सकोगे। मैंने कभी असत्य भाषण नहीं किया, किन्तु इस असत्यसे बचकर अब कैसे निकलूँ? इस समय न तो मैं [पुत्रके पास] जा पा रहा हूँ और न ही परमपद (गणपतिधाम)-को त्यागनेमें ही सक्षम हो पा रहा हूँ। ये दोनों बातें अर्थात् परमधामगमन और पुत्रसे भेंट-परस्पर विरोधी हैं, अतः इन दोनोंका साथ-साथ पूर्ण होना कठिन है-ऐसा [कहते हुए] राजा फूट-फूटकर रोने लगे ॥ ५-६१/२ ॥ उन दोनों (राजा-रानी)-को शोकाकुल देखकर दूत उन नृपश्रेष्ठसे कहने लगे- [राजन्!] आप दोनोंका
६३२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- रोदन सुनकर हमको बड़ी दया आ रही है। हम लोग अभी क्षणभरमें यहीं विमानको उतार देते हैं, आप अपने पुत्रको देखकर शीघ्रतासे चले आइये। आप लोगों (की समस्या)-का समाधान करके हमें भी अत्यन्त सन्तुष्टि होगी॥ ७-८१/२॥ तदुपरान्त दूतोंने देवपुरके उत्तरी भूभागमें विमानको उतार दिया। गणेशपुराणश्रवणरूप पुण्यके कारण आये उस विमानने अपनी प्रभासे नगरको आच्छादित कर लिया तथा वाद्यध्वनियोंसे उसे गुँजा दिया॥ ९-१०॥ तदुपरान्त [राजाके अमात्य] सुबल और ज्ञानगम्यने राजा तथा दूतोंको नमस्कार किया और [उनसे अनुमति लेकर] उस हेमकण्ठको समस्त वृत्तान्त बतलानेके लिये वहाँ जा पहुँचे॥ ११॥ उन्होंने क्षणभरमें भद्रासनपर विराजमान हेमकण्ठको देखा, जो अमात्यों, नागरिकों एवं सन्नद्ध [अस्त्र- शस्त्रादिसे संयुक्त] महाबली वीरशिरोमणियोंसे घिरा हुआ उत्तम नृत्यका अवलोकन कर रहा था॥ १२१/२॥ तभी हेमकण्ठके मन्त्रियोंकी दृष्टि [सहसा] सुबल और ज्ञानगम्यपर पड़ी। [मन्त्रियोंके संकेतपर] सभी वीर और मन्त्रिगंणसहित हेमकण्ठ उठ खड़ा हुआ। वे सब लोग ज्ञानगम्य और सुबलका आलिंगन करनेके लिये संभ्रमपूर्वक वहाँ जा पहुँचे॥ १३-१४॥ जब उन सभीकी आपसी भेंट-मुलाकात हो गयी, तब परमहर्षित राजपुत्र हेमकण्ठ उनके पास गया और रोमांचित होता हुआ उनसे कहने लगा-'मन्त्रियो ! मेरे माता-पिता सकुशल हैं या नहीं। उन दोनोंको छोड़कर आपलोग अकेले ही यहाँ कैसे चले आये ?' ऐसा कहकर हेमकण्ठने उन दोनोंको उत्तम आसनपर बैठाया और वस्त्र, चन्दन, आभूषण, फल, ताम्बूल, सुवर्ण आदिसे पूजन किया ॥ १५-१७॥ [पूजनके उपरान्त वह पुनः कहने लगा कि] उन दोनों (माता-पिता)-के न होनेके कारण मेरे प्राण सर्वदा कण्ठमें ही अटके रहते हैं। मैं रातों-दिन उन्हींके बारेमें सोचा करता हूँ, उनके अतिरिक्त और कोई बात मेरे मनमें आती ही नहीं है। मेरे पिताश्रीने मुझसे पहले ऐसा कहा था कि एक बार दर्शन देने अवश्य आऊँगा, अतः वे अपनी उस बातको मिथ्या कैसे होने देंगे ?॥ १८-१९॥ वे दोनों (मन्त्री) बोले-हे नृप ! व्यर्थमें चिन्ता मत करो, तुम्हारे माता-पिता सकुशल हैं। उन दोनोंके पुण्यप्रभावको तीनों लोकोंमें कौन जान सकता है ? ॥ २० ॥ जब आपसे अनुमति लेकर हम चारों लोग (दो मन्त्री, राजा और रानी) नगरसे निकले तो सुकुमार होनेके कारण आपके पिताको अत्यन्त कष्टका अनुभव होने लगा। उनके कमलतुल्य चरण रक्तरंजित हो गये। वे क्षुधासे अत्यधिक पीड़ित रहने लगे, उन महाराजको कन्द, मूल, फलादिसे सन्तुष्टि नहीं होती थी ॥ २१-२२ ॥ आपकी माताकी भी वैसी ही दशा हो गयी। वे दोनों उस समय [सुखपूर्वक] एक डग भी नहीं चल पाते थे। हम सभी बहुत समयतक भटकते रहे, तब हमें एक विशाल और मनोरम सरोवर दिखायी पड़ा। [वहाँका परिसर] वृक्षों तथा लताओंके कारण [अत्यन्त] शीतल था। अतः महाराज वहीं विश्राम करने लगे और रानी सुधर्मा थकी होनेपर भी उनके पैर दबाती रहीं ॥ २३-२४ ॥ [इधर जब] हम लोग कन्द-मूल आदि लेनेके लिये निकले हुए थे, इसी बीचमें वहाँपर मुनीश्वर च्यवन जल लेनेके लिये आये और उन्होंने दोनों (महाराज एवं महारानी)-को देखा। मुनीश्वरने [बातचीतके द्वारा] उन दोनोंकें हार्दिक अभिप्रायको जाना और अपने आश्रमकी ओर चले गये। तबतक बहुत-से कन्द-मूल-फलादिको लेकर हमलोग भी लौट आये ॥ २५-२६ ॥ [इसके उपरान्त च्यवनमुनिके पिता महर्षि भृगुकी आज्ञासे] हम सभी लोग उनके आश्रममें गये, जहाँ मुनिने हमारा प्रचुर सत्कार किया। [उन लोगोंने] हमें षड्रसयुक्त भोजन कराया, जिससे हमें अत्यधिक विश्राम मिला। इसके उपरान्त महर्षि भृगु और महाराज सोमकान्त परस्पर बातचीत करने लगे। तब महाराजने अपना समस्त वृत्तान्त उन मुनिवरको सुना दिया ॥ २७-२८ ॥ तदुपरान्त मुनिवर ध्यानके द्वारा [जान करके] उनका पूर्वजन्म बतलाने लगे और करुणावश होकर [पूर्वजन्मके] पाप तथा उसकी शान्तिका उपाय भी उन्होंने बतलाया। हे नृप ! राजाके [पूर्वजन्मके] पापको सुनकर हम लोग भयभीत हो उठे और महाराज
क्री०ख०-अ०१५२ ]* अमात्योंका राजसभामें जाकर हेमकण्ठको राजाके आगमनकी सूचना देना * ६३३ सत्यताके विषयमें] सन्देह करने लगे। वे उसपर सन्देहपूर्वक विचार कर ही रहे थे कि तभी उनके शरीरसे श्वेत वर्णके पक्षी निकले और वे राजाको नोचने लगे। उनके चंचुप्रहारसे महाराज व्याकुल होकर गिर पड़े तथा 'रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये'-इस प्रकार मुनिसे प्रार्थना करने लगे। राजाकी प्रार्थनाको सुनकर मुनिने कृपापूर्वक उनकी ओर देखा। मुनिके अवलोकनमात्रसे क्षणभरमें वे पक्षी अन्तर्धान हो गये॥ २९-३२॥ तदुपरान्त महाराज अंजलि बाँधकर मुनिके समक्ष बैठ गये और कृपानिधि भृगुमुनिने राजाके महापापको जान लेनेके उपरान्त उनको भक्तिभावसे एक वर्षपर्यन्त गणेशपुराणका श्रवण कराया ॥ ३३१/२॥ मुनिने सर्वप्रथम गणपतिके एक सौ आठ नामोंसे अभिमन्त्रित जल राजाके ऊपर छिड़ककर अपनी तपस्याके प्रभावसे राजाके शरीरसे एक ऐसे भयानक पुरुषको बाहर निकाला, जिसके केश आकाशतक लम्बे थे, जिह्वा लटक रही थी और जो भूखसे अत्यन्त पीड़ित था॥ ३४-३५॥ उसने भृगुमुनिसे भोजनकी याचना की, तो मुनिने कहा कि यह जो सामने सूखा हुआ विशाल आम्रवृक्ष है, तुम उसीका भक्षण करो। तब जैसे ही उस पुरुषने आम्रवृक्षका स्पर्श किया, वैसे ही वह क्षणभरमें भस्म हो गया। उसके बाद [जब धीवररूपधारी पापपुरुषने पुनः भोजन माँगा तो] मुनिने धीवरसे कहा कि इसे (भस्मको) ही खाओ। तब वह पुरुष मुनिके भयके कारण उसी भस्ममें विलीन हो गया ॥ ३६-३७॥ इसके बाद मुनिने राजासे कहा- हे भूमिपाल ! पुराणश्रवणके इस महान् पुण्यको [जलरूप प्रतीकके माध्यमसे] तुम वृक्षकी भस्ममें तबतक प्रतिदिन डालते रहो, जबतक कि भस्मके स्थानपर पहलेके जैसा दूसरा आम्रवृक्ष उत्पन्न न हो जाय। हे राजेन्द्र! ऐसा होते ही तुम दिव्य शरीरवाले हो जाओगे॥ ३८-३९॥ दोनों मन्त्रियोंने कहा- हे नृप! [मुनिने जैसा कहा था,] महाराजने वैसा ही किया। वे प्रतिदिन स्नान करके बहुत देरतक कथाश्रवण करते और इसके बाद भक्तिपूर्वक वह पुण्यफल उस भस्ममें डाल देते। जब ऐसा करते-करते एक वर्ष बीत गया और गणेशपुराणकी कथा भी पूर्ण हो गयी, तो वहाँ पहलेकी भाँति फूलों- फलोंसे लदा हुआ एक वृक्ष उत्पन्न हो गया तथा महाराज भी दिव्य कान्तिसे समन्वित और सूर्य-चन्द्रमाके समान तेजोमय हो गये॥ ४०-४११/२॥ [इस प्रकारके दिव्य नैरोग्यलाभके कारण कृतज्ञतावश] जबतक महाराज मुनिका स्तवन करते अर्थात् उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करते, तबतक एक विमान वहाँपर आया। उसमें नृत्य-गान हो रहा था और वह वाद्योंकी ध्वनिसे गूँज रहा था। गणेशजीके दूतोंसे युक्त वह विमान आश्रमके निकट आ पहुँचा। हे नाथ! उस विमानकी शोभाका अवलोकन करके हम दोनोंके नेत्र सफल हो गये॥ ४२-४३१/२ ॥ आपके पिताके पुण्योंकी अधिकताके कारण गजाननदेवकी आज्ञासे उन दूतोंने आपके पिता महाराज सोमकान्तको विमानमें बैठा लिया और महाराजके संकेतसे दूतोंने हमलोगोंको भी प्रसन्नतापूर्वक विमानमें बैठाया। महारानी सुधर्मा भी भृगुमुनिसे आज्ञा प्राप्तकर विमानमें आरूढ़ हो गयीं ॥ ४४-४५॥ [गणपतिधामको जाते समय मार्गमें] जैसे ही देवपुर दिखायी पड़ा, [आपके माता-पिताको] वैसे ही आपका स्मरण हो आया। हे नृप! इसीलिये नगरके उत्तरी भूभागमें विमानको उतारा गया है। आपके माता-पिता आपको देखना चाहते हैं, इसीलिये हमलोग आपको बतानेके लिये यहाँ आये हैं। उनके दर्शनार्थ आप शीघ्र चलिये, अन्यथा वे लोग चले जायँगे ॥ ४६-४७॥ उन (मन्त्रियों)-की ऐसी बातें पूर्णरूपसे सुनकर राजाको रोमांच हो आया, वह रोने लगा और अपने माता-पिताको देखनेकी उत्कण्ठाके कारण मन्त्रियोंको आगे करके त्वरापूर्वक वह दौड़ने लगा। नागरिकों और सेवकोंसे घिरा, आँसू बहाता हुआ तथा गिरते हुए आभूषणोंवाला वह हेमकण्ठ गणेशजीके दूतोंसे युक्त विमानके समीप क्षणभरमें जा पहुँचा ॥ ४८-४९॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'हेमकण्ठदर्शन' नामक एक सौ बावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १५२॥
एक सौ तिरपनवाँ अध्याय
६३४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 एक सौ तिरपनवाँ अध्याय राजा सोमकान्तका विमानसे उतरकर पुत्र तथा नागरिकोंसे मिलना और उन सभीके साथ गणपतिलोकको जाना
सूतजी बोले—राजाके वे चारों अमात्य महाराज सोमकान्तके सामने उपस्थित हुए और [वहाँ विद्यमान] सभी लोगोंको प्रणामकर कहने लगे—हे नृप! आपका पुत्र आया हुआ है। समस्त वीरों और नागरिकोंसे वह वैसे ही घिरा है, जैसे इन्द्र देवताओंसे घिरे रहते हैं। उसने हर्ष तथा विषाद दोनों ही भावोंसे विमानको देखा है॥ १-२॥
इस प्रकार जबतक अमात्योंने सोमकान्तसे निवेदन किया, तबतक वह हेमकण्ठ भी बालक, स्त्री, वृद्ध तथा सेवकादिसे घिरा हुआ त्वरापूर्वक वहाँ आ पहुँचा। विमानकी शोभाका अवलोकनकर वे सभी (नगरवासी आदि) आनन्दविह्वल हो गये। वहाँपर महाराज सोमकान्त अपनी सुन्दरी पत्नी और गणपतिके दूतोंके साथ बैठे थे। उस (विमान)-के मध्यभागमें अवस्थित सोमकान्तको देखकर उन्होंने (हेमकण्ठ आदिने) पृथ्वीपर मस्तक रखकर प्रणाम किया। तब यानसे उतरकर सोमकान्तने प्रीतिपूर्वक पुत्रका आलिंगन किया॥ ३-५॥
वे दोनों (पिता-पुत्र) प्रसन्नताके आँसू बहाते हुए रोमांचित हो रहे थे और क्षणभरके लिये तो उन्हें शरीरका भानतक न रहा। वे आपसमें कुछ बोल भी नहीं पा रहे थे॥ ६॥
वर्षभर बाद मिले पुत्रसे पिता सोमकान्त स्नेहपूर्वक कहने लगे कि [वत्स!] मेरे वंशको विभूषित करनेवाले तुझ सत्पुत्रका ही मैं नित्य चिन्तन करता था। लोगोंके बहुत-से पुत्र हैं, किंतु उनमें मैं तुम्हारे जैसा एक भी पुत्र नहीं देख पाता। इसी बीचमें स्नेहमयी रानी सुधर्मा दौड़ती हुई पुत्रके निकट आ पहुँचीं। रानीने वात्सल्यपूर्वक पुत्रका आलिंगन किया। उस समय माता और पुत्रकी आँखोंसे आँसू झर रहे थे। माताने पुत्रसे कहा—बालक! लम्बे समयके बाद तुमको देख सकी हूँ॥ ७-९॥
मेरा मन तुम्हारे लिये उत्कण्ठित रहता था, इसलिये मुझे तनिक भी सुखका अनुभव नहीं होता था। इस समय तुम्हारा मुख देखकर मेरा मन आह्लादित हो गया है। [देखो!] तुम्हारे वियोगके कारण मैं कितना अधिक दुर्बल हो गयी हूँ॥ १०१/२॥
इसके उपरान्त नगरवासियों तथा नामधारक अर्थात् सेनाध्यक्ष, कोषाध्यक्ष आदि विभिन्न पदोंपर अधिष्ठित राजकीय कर्मचारियोंने राजाका आलिंगन किया। उस समय उनमें कुछ लोग राजाकी परिक्रमा कर रहे थे, कुछ लोग चरणस्पर्श करने लगे और कुछ उनका दर्शन करके ही नगरकी ओर लौट गये॥ ११-१२॥
इसके उपरान्त राजाने उन सभीसे कहा कि भृगु मुनिने कृपा करके जो मुझे पापनाशक गणेशपुराण सुनाया है, उससे मैं पापहीन तथा दिव्य देहवाला हो गया और अब विमानके द्वारा [गणपतिधामको] जा रहा हूँ। [मैं आप सबको देखना चाहता था और गणेशजीकी कृपासे] मैंने सबको देख भी लिया, अब मैं विमानपर आरूढ़ होकर जा रहा हूँ॥ १३-१४॥
हे पुत्र! मैंने स्वेच्छानुसार राज्य तथा सम्पत्तियोंका उपभोग किया। कृपालु गणपतिने मेरे निमित्त भूतलपर विमान भेजा। अब मैं [कृतकृत्य होकर] भृगुमुनिके अनुग्रहसे परमधामको जा रहा हूँ॥ १५१/२॥
जब उन लोगोंने सोमकान्तके द्वारा कही गयी ये बातें सुनीं तो वे सभी उच्चस्वरसे रोने लगे और कुछ लोग तो [शोकवश] भूमिपर गिर पड़े। तदुपरान्त [नगरके] प्रमुख व्यापारी एवं गणमान्यजन दयानिधि राजा सोमकान्तसे कहने लगे—'हे जगतीपाल! हमलोगोंके बिना आप उस परमधामको क्यों जा रहे हैं? हे नृप! [यदि आप ऐसा करेंगे तो] हम सभी लोग प्राण त्यागकर आपके पीछे-पीछे चले आयेंगे। ऐसी दशामें हमारी हत्याका पाप आपके सिरपर आयेगा। हमारे पास वैसा पुण्य तो है नहीं कि हम गणेश्वरका दर्शन कर
क्री०ख०-अ०१५३ ] * राजा सोमकान्तका विमानसे उतरकर पुत्र तथा नागरिकोंसे मिलना * ६३५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 सकें, किंतु आप यदि कृपा करें तो हमलोग भी गणपति- देवके उत्तम लोकको प्राप्त कर सकेंगे। इस संसारमें तो तनिक भी सुख नहीं है, अपितु व्यर्थमें ही यहाँ आयुका नाश होता रहता है। इसके अतिरिक्त, हम लोगोंसे कोई साधना-उपासना भी तो नहीं हो सकती, जो गणपतिधामकी प्राप्तिका साधन बन सके' ॥ १६-२०१/२ ॥ इसके बाद हेमकण्ठ भी अपने पिता राजा सोमकान्तसे आदरपूर्वक कहने लगा—हे तात! अपने बालकको छोड़कर गजाननके दर्शनार्थ आप किसलिये जा रहे हैं ? मेरा राज्यसे क्या प्रयोजन हो सकता है, मैंने तो केवल आपकी आज्ञासे वर्षपर्यन्त समग्र राज्यका परिपालन किया। अब मेरी भी राज्य करनेकी इच्छा नहीं है। राजन् ! अब मेरी भी आपको शपथ है, इसलिये आपको मुझे भी साथ ले चलना चाहिये ॥ २१-२३ ॥ सोमकान्तने कहा—हे जनो (नगरवासियो एवं बन्धु-बान्धवो) ! आप सभी लोगोंकी इच्छा गजाननदेवके चरणारविन्दोंको देखनेकी है, किंतु मैं तो स्वयं ही पराधीन हूँ, तब मैं कैसे आपकी इच्छापूर्ति कर सकता हूँ ? आप लोगोंके स्नेहके कारण और विशेषरूपसे पुत्रके प्रति वात्सल्यवश चिन्तित था, इसीलिये ऊपर-ऊपर जा रहे विमानको [आग्रहपूर्वक] उतारकर मैं देखनेके लिये चला आया ॥ २४-२५ ॥ सूतजी बोले—तदुपरान्त (राजाकी बातें सुननेके बाद) नगरनिवासी शोकाकुल हो गये और [स्वयं राजा] सोमकान्त तथा उनका पुत्र हेमकण्ठ—ये दोनों रोने लगे, तब देवदूतों (के मन)-में दया आ गयी। वे राजा सोमकान्तसे कहने लगे—'हे राजन् ! आप धन्य हैं; क्योंकि आपकी प्रजा आपके लिये वैसे ही प्राण न्योछावर कर चुकी है, जैसे कि आपने अपने-आपको जगदीश्वर गजाननको समर्पित किया है। अतः हम गजाननके समीप सबको लेकर शीघ्र ही चलेंगे' ॥ २६-२७१/२ ॥ राजाने कहा—यदि सारे नगरको [गणपतिधाम] ले जाया जा रहा है, तो निश्चय ही मेरी कीर्ति भूतलपर स्थिर रहेगी, ऐसा न होनेपर [कीर्ति भी] नहीं रहेगी ॥ २८१/२ ॥ सूतजी बोले—ऐसा कहनेके बाद राजाने गणेशपुराणके श्रवणका जो पुण्यफल था, उसे दूतोंकी आज्ञासे [धाम जानेके इच्छुक] लोगोंके हाथोंमें जलके रूपमें छोड़ दिया। जैसे ही [पुण्यफलका प्रतीकरूप] जल उनके हाथोंमें गिरा, वैसे ही वे लोग पापोंसे रहित तथा पुण्यशाली हो गये ॥ २९-३० ॥ तदुपरान्त स्त्री-पुरुष, बालक-वृद्ध सभी लोग उस उत्तम विमानपर आरूढ़ हुए और वे गणपतिदूत ऊपर (आकाश-) मार्गसे चल पड़े। उस समय कुछ ऐसे पापात्मा भी थे, जिन्होंने हाथमें जल नहीं लिया। वे पुनः नगरको लौट गये और जो लोग वहाँ बचे थे, उनसे सारा समाचार कह सुनाया। तब उन [बचे हुए] लोगोंने ऊपर आकाशमें जाते हुए विमानका बहुत [उत्कण्ठावश] अवलोकन किया ॥ ३१-३२१/२ ॥ इसके उपरान्त [गये हुए लोगोंके] धनको पाकर सन्तुष्ट हुए वे शेष नागरिक परस्पर वार्तालाप करने लगे और प्रसन्न चित्तसे नानाविध क्रियाकलापोंमें निरत हो गये। [विमानमें आरूढ़ कुछ लोग] भागना चाह रहे थे, उन्हें गणपतिदूतोंने दण्डसे ताड़ित करते हुए पकड़ लिया और बलपूर्वक विमानके भीतर बैठा दिया। यह बड़े कौतुककी बात थी ! जो लोग भाँति-भाँतिके बहाने बनाकर निकल पड़े थे, उन्हें भी दूतोंने वैसे ही बैठा दिया ॥ ३३-३५ ॥ विमानके मध्यभागमें राजा सोमकान्त, पत्नी सुधर्मा और पुत्र हेमकण्ठ आदि विराजमान हुए, उनके चारों ओर अमात्यगण तथा [यथास्थान] सुखपूर्वक नागरिक बैठे। वे लोग 'मयूरेश ! तुम्हारी जय हो, मयूरेश ! तुम्हारी जय हो' इस प्रकारका जयघोष कर रहे थे। वहाँ अप्सराएँ नाच रही थीं, देववाद्य बज रहे थे और इसके कारण दिशामण्डल प्रतिध्वनित हो रहा था ॥ ३६-३७१/२ ॥ अतिशय वेगपूर्वक वे सभी गणपतिके मंगलमय धाममें जा पहुँचे और वहाँकी सुन्दरताको निहारते
६३६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- हुए विस्मयपूर्वक कहने लगे—'अहो! इन (महाराज सोमकान्त)-का महान् पुण्य है, जिसके कारण हम गजाननदेवका साक्षात्कार कर सके।' [गणपति- धाममें गये हुए] उन सभी लोगोंने सामीप्यमुक्ति प्राप्त की और राजाको [गणपतिका] सायुज्य प्राप्त हुआ॥ ३८-३९१/२॥ सूतजी बोले-हे विप्रो! इस प्रकारसे मैंने गणेशपुराणकी कथा आप लोगोंको सुनायी, जो श्रवण की जानेपर सभी लोगोंके पापोंका ध्वंस कर देती है। हे विप्रो! अब उसे सुनो, जो राजाने [विमानमें] देवदूतोंसे पूछा था। मैं उस समस्त कथानकका आप लोगोंसे वर्णन करता हूँ॥ ४०-४१॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'सोमकान्तको देवपदकी प्राप्तिका वर्णन' नामक एक सौ तिरपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १५३॥ एक सौ चौवनवाँ अध्याय राजाके पूछनेपर गणपतिदूतोंका काशीमें स्थित विनायकोंके आवरणोंका क्रमिक वर्णन ऋषिगण बोले-हे अनघ! विमानमें बैठे हुए राजा सोमकान्तने [दूतोंसे] क्या पूछा था, उसे हम सभी सुनना चाहते हैं, अतः वह सब हमें पूर्णरूपसे बतलाइये॥ १॥ सूतजी बोले-हे अनघ ऋषियो! आकाशमार्गसे जाते हुए महामना नरेशने दूतोंसे महात्मा गणेशके वाराणसीमें स्थित परिवारों (आवरणों)-के नामोंको जानना चाहा था। उनका आप लोग श्रवण कीजिये॥ २१/२॥ राजाने कहा-हे दूतो! स्मरणमात्रसे समस्त सिद्धियोंको देनेवाले और विश्वेशके परिवारदेवताओंमें परिगणित गणपतिविग्रहोंके बारेमें आपलोग कृपापूर्वक मुझको सम्पूर्ण रूपसे बतलाइये॥ ३१/२॥ दूत बोले-हे राजन्! समस्त भयोंको दूर करनेवाले और विश्वेश्वरके परिवारदेवताओंके रूपमें परिगणित गणपतिविग्रहोंके विषयमें हम बता रहे हैं; आप श्रवण कीजिये॥ ४१/२॥ [वाराणसीको आवृतकर स्थित गणपतिके सात आवरणोंमें अन्यतम] प्रथम आवरणके अन्तर्गत दुर्ग- विनायक, अर्कविनायक, भीमचण्डीविनायक, देहली- विनायक, उद्दण्डविनायक, पाशपाणिविनायक, खर्व- विनायक तथा सिद्धिप्रद सिद्धिविनायक—ये आठ विनायक हैं॥ ५-६१/२॥ द्वितीय आवरणमें लम्बोदर विनायक, कूट- दन्तविनायक, शूलटंकविनायक, चौथे कूष्माण्डविनायक, पाँचवें मुण्डविनायक, विकटद्विजविनायक, राजपुत्र- विनायक तथा अन्तिम प्रणवविनायक—ये आठ विनायक स्थित हैं॥ ७-८१/२॥ तृतीय आवरणमें वक्रतुण्डविनायक, एकदन्तविनायक, त्रिमुखविनायक, पंचमुखविनायक, हेरम्बविनायक, विघ्नराजविनायक, वरदविनायक तथा मोदकप्रिय विनायक—ये आठ विनायक स्थित हैं॥ ९-१०१/२॥ चतुर्थ आवरणमें अभयप्रद विनायक, सिंहतुण्ड- विनायक, कूर्णिताक्षविनायक, क्षिप्रप्रसादविनायक, चिन्तामणिविनायक, दन्तहस्तविनायक, प्रचण्डविनायक तथा उद्दण्डमुण्ड-विनायक—ये आठ विनायक स्थित जानने चाहिये॥ ११-१३॥ पंचम आवरणमें स्थूलदन्तविनायक, कलिप्रिय- विनायक, चतुर्दन्तविनायक, द्वितुण्डविनायक, ज्येष्ठ- विनायक, गजविनायक, कालविनायक तथा मार्गेश- विनायक (नागेश या नागविनायक)—ये आठ विनायक जानने चाहिये॥ १४-१५॥ षष्ठ आवरणमें मणिकर्णिविनायक, आशाविनायक, सृष्टिविनायक, यक्षविनायक, गजकर्णविनायक, चित्रघण्ट- विनायक, सुमंगलविनायक तथा मित्रविनायक—ये आठ विनायक स्थित हैं॥ १६१/२॥ सप्तम आवरणमें मोदविनायक, प्रमोदविनायक, सुमुखविनायक, दुर्मुखविनायक, गणपविनायक, ज्ञान- विनायक, द्वारविनायक तथा आठवें मोक्षप्रद अविमुक्त-
क्री०ख०-अ०१५५] * गणेशपुराणीय माहात्म्य-निरूपणके प्रसंगमें विविध इतिहास * ६३७ विनायक—ये आठ विनायक स्थित हैं ॥ १७-१८१/२ ॥ इन [आवरणस्थ विनायकों]-के अतिरिक्त भी भगीरथविनायक, हरिश्चन्द्रविनायक, कपर्दीविनायक तथा बिन्दुविनायक आदि अन्य विनायक स्थित हैं। इन सभी विनायकोंका नित्यप्रति स्मरण सभी कामनाओंको फलीभूत करनेवाला है ॥ १९-२० ॥ जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर शुद्ध चित्तसे इनके नामोंका पाठ करता है, उसके किसी भी कार्यमें विघ्न (उपद्रवादि) बाधा नहीं पहुँचाते हैं। हे राजेन्द्र ! भक्तिमान् मनुष्यको चाहिये कि वह विनायकोंके एक-एक नामका उच्चारण करके दूर्वांकुर, तिल, अक्षत तथा शमीपत्रोंसे इनकी पूजा करे ॥ २१-२२ ॥ ऐसा करनेवाला मनुष्य असाध्य कार्योंको भी सिद्ध कर लेगा, उसे सर्वत्र विजय मिलेगी और वह आयुष्य, पुष्टि, धन तथा आरोग्य प्राप्त करेगा ॥ २३ ॥ हे नृप ! जो तुमने पूछा था, वह सब हमने बता दिया है, ऐसा कहकर वे दूत मौन हो गये और प्रसन्नतापूर्वक अपने (गणपतिके) धामको चले गये ॥ २४ ॥ सूतजी बोले—हे विप्रो ! यह जो विश्वेश्वरके आवरणोंके बारेमें आप लोगोंने पूछा था, वह मैंने बता दिया है। अब मैं गणेशपुराणकी फलश्रुतिका वर्णन करूँगा ॥ २५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'छप्पन विनायकोंका वर्णन' नामक एक सौ चौवनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५४ ॥ एक सौ पचपनवाँ अध्याय गणेशपुराणीय माहात्म्य-निरूपणके प्रसंगमें विविध इतिहास एवं ग्रन्थकी फलश्रुति सूतजी बोले—हे द्विजो ! इस पुराणका एक बार भी श्रवण करनेसे जन्म-मरणरूप बन्धनसे मुक्ति मिल जाती है। यदि इसे अनेक बार सुना जाय तो उस फलको बता पानेमें शेषनाग अथवा ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं हैं। सूर्यग्रहण तथा चन्द्रग्रहणके अवसरपर कुरुक्षेत्रतीर्थमें ब्राह्मणोंको भक्तिभावसे सहस्र भार सुवर्ण देकर मनुष्य जिस पुण्यफलको प्राप्त करता है, वही पुण्यफल उस भक्तिसम्पन्न मनुष्यको इस पुराणके श्रवणसे प्राप्त हो जाता है ॥ १-३ ॥ ब्रह्माजीने सांगोपांग रीतिसे अनुष्ठित और [प्रचुर] दक्षिणावाले समस्त यज्ञ-यागादिके पुण्यफलकी पुराणश्रवणके पुण्यफलसे तुलना की, जिसमें गणेशपुराणके श्रवणका जो पुण्यफल था, वह यज्ञफलकी अपेक्षा अधिक गौरवपूर्ण सिद्ध हुआ। [जब सांगोपांग अनुष्ठान किये गये यज्ञोंके पुण्यफलकी ऐसी दशा है, तो] वहाँपर सभी प्रकारके दान-व्रत आदि पुण्यकर्मोंके फलकी गणनाकी बात ही क्या हो सकती है ! ॥ ४-५ ॥ करोड़ों कन्यादान तथा हजारों गोदान करनेका जो पुण्यफल है, उससे कोटिगुणित अधिक पुण्यफल इस पुराणके श्रवणसे प्राप्त होता है। अंगोंसहित चारों वेदोंके स्वाध्याय-आवर्तनादिका, निरन्तर शास्त्रोंके निरूपण- चिन्तनादिमें तत्पर रहनेका और सत्पुरुषोंकी सेवाका जो पुण्यफल है, उससे करोड़ गुना अधिक पुण्यफल इस पुराणको सुननेसे मिल जाता है ॥ ६-७१/२ ॥ महाभारत तथा समस्त पुराणोंके श्रवणका जो फल होता है, उससे करोड़गुना अधिक पुण्यफल गणेशपुराणके श्रवणसे मिलता है। जिसके भवनमें लिखकर गणेशपुराण स्थापित किया जाता है, वहाँपर राक्षस, भूत, प्रेत, पूतना आदि बालग्रह तथा अन्य ग्रह कभी भी पीड़ा नहीं पहुँचाते। उस घरकी गणेशजी सर्वदा रक्षा करते रहते हैं ॥ ८-१०१/२ ॥ जो मनुष्य एकाग्र चित्तसे इस पुराणका श्रवण अथवा पूजन करता है, उसके दर्शनसे तो पतित जन भी पवित्र हो जाते हैं और वह ब्रह्मा आदि देवताओं तथा मुनिजनोंका भी आदरणीय हो जाता है ॥ ११-१२ ॥ वह क्रुद्ध हो जाय तो पूरे विश्वको भस्म कर सकता है और सन्तुष्ट हो जाय तो इन्द्रपद प्रदान करनेमें समर्थ है। इस पुराणका नित्यप्रति श्रवण करनेसे
६३८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
क्री०ख०-अ०१५५] * गणेशपुराणीय माहात्म्य-निरूपणके प्रसंगमें विविध इतिहास * ६३९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] हे मुनियो! अब एक अन्य प्राचीन इतिहासका श्रवण कीजिये। इक्ष्वाकुवंशमें संवरण नामके एक परम धार्मिक राजा हुए थे। वे यज्ञकर्ता, दाता, पवित्र, लोकरक्षक, स्वाध्यायनिरत, शत्रुहन्ता तथा प्रजापालनमें तत्पर थे। वे सभी धर्मोंका प्रतिपादन करनेमें समर्थ, प्रजाकी आयका छठा भाग ही ग्रहण करनेवाले, लोकपूजित और [सबको] परमप्रिय थे। उनकी ख्याति तीनों लोकोंमें फैली थी॥ ३३-३५ १/२॥ महाराज संवरण सन्तानहीन थे, इसलिये उन्होंने पुत्रेष्टि नामक यागका आरम्भ किया। संवरणने यद्यपि दक्षिणा एवं अन्नदानसे समन्वित पुत्रेष्टिका सांगोपांग सम्पादन किया था, तथापि उन्हें सन्तानप्राप्ति नहीं हुई, तब उन्होंने हरिवंशपुराणका श्रवण किया और ब्राह्मणोंकी पूजा करनेके बाद कथावाचकको भी वस्त्र, धेनु, सुवर्ण, रत्न, मूल, फल आदिके द्वारा सन्तुष्ट किया॥ ३६-३८॥ इतना करनेपर भी उन्हें पुत्रप्राप्ति न हो सकी। [इसके कुछ दिन बाद] दैवयोगसे उनके भवनमें मूकमुनिका आगमन हुआ, जो कि गणेशपुराणके मर्मज्ञके रूपमें प्रसिद्ध थे॥ ३९॥ राजा संवरणने प्रार्थना करके उनको अपने यहाँ रोक लिया और बड़ी प्रसन्नताके साथ उनके मुखसे गणेशपुराणका श्रवण किया। पुराणश्रवणके बाद राजाने उन द्विजश्रेष्ठ मूकको रत्न, मुक्ताफल, वस्त्र तथा स्वर्णांलंकारादि समर्पित करके प्रसन्न किया। इसके [कुछ काल] बाद राजाको पुत्रकी प्राप्ति हुई और वे गणेशजीकी भक्तिमें तत्पर हो गये। उन्होंने अनेक सुखोंको भोगनेके पश्चात् गणपतिदेवके परमधामको प्राप्त किया॥ ४०-४२॥ राजा संवरणकी एक वन्ध्या बहन थी, वह तीस वर्षकी तरुण-अवस्थाको प्राप्त करके भी रजोधर्मसे रहित थी। उसने जब सुना कि 'यथोचित समय आनेपर राजाको सन्तानप्राप्ति हुई है और वह सन्ततिलाभ गणेशपुराणके श्रवणका परिणाम है' तो उसने मूक
[दायाँ स्तम्भ] मुनिको बुलाया और उनके मुखसे मंगलमय गणेशपुराणका श्रवण किया। गणेशजीकी भक्तिमें निरत उस महिलाने भी परम शूर पुत्रको प्राप्त किया। इसके अतिरिक्त और भी बहुत-से पुत्र-पौत्रोंको प्राप्तकर तथा मनोहर भोगोंको भोगनेके पश्चात् उसका देहावसान हुआ और उसने गणपतिके परमधामको पा लिया॥ ४३-४५ १/२॥ प्राचीनकालकी बात है। राजा सगरके पुत्रोंमें एक पुत्र पंगु था। उसने विनयपूर्वक भक्तिभावसे बारह वर्षोंतक महर्षि लोमशसे इस पवित्र पुराणका श्रवण किया तथा बड़ी भक्तिसे लोमशजीको [नानाविध] द्रव्य समर्पित करके सन्तुष्ट किया। इससे उसके चरण स्वस्थ हो गये और उसने विजय, पुष्टि तथा दीर्घायुष्यके साथ- साथ अन्तमें गणपतिदेवके उस परमधामको भी प्राप्त कर लिया॥ ४६-४८॥ अठारह पुराणोंका श्रवण करनेसे जो पुण्यफल प्राप्त होता है, वही पुण्यफल एकमात्र गणेशपुराणको सुननेसे भी मिल जाता है। हे विप्रो! काकवन्ध्या नारी इसका श्रवण करके बहुत-से पुत्रोंको प्राप्त करती है और जिस स्त्रीका बार-बार गर्भपात होता है, वह स्थिर गर्भवाली हो जाती है॥ ४९-५०॥ हे मुनिवरो! इसका श्रवण करके गूँगा व्यक्ति बृहस्पतिके सदृश भाषणकुशल हो जाता है और वेदाभ्यासी श्रेष्ठ ब्राह्मण निस्सन्देह सर्वमान्य और सर्वज्ञ बन जाता है॥ ५१॥ गणेशपुराणका [सतत] स्मरण-चिन्तन करते रहनेसे शूद्र वैश्यत्व, वैश्य क्षत्रियत्व तथा क्षत्रिय ब्राह्मणत्वरूप वर्णोत्कर्षको प्राप्त कर लेता है॥ ५२॥ इस पुराणके एक अध्यायका भी श्रवण करनेसे कुमारी कन्या गुणवान्, कुलीन, समृद्ध और सदाचारी पतिको प्राप्त कर लेती है और जन्मान्ध मनुष्य पुराणके श्रवणसे देखनेकी शक्ति पा लेता है। जो मनुष्य समस्त तीर्थोंमें स्नान करता है और सब प्रकारके दान देता है, उसे जिस फलकी प्राप्ति होती है, वही फल इस पुराणको भक्तिभावसे सुननेवाला पा लेता है॥ ५३-५४ १/२॥
६४० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 जो मनुष्य अनेक वर्षोंतक ग्रीष्म-ऋतुमें पंचाग्नि- | जाता है ॥ ६१ १/२ ॥ साधन (चारों ओर अग्नि और ऊपर सूर्यके आतपका | मथुरापुरी, हरिद्वार, बदरिकाश्रम, सेतुबन्धतीर्थ, कुरुक्षेत्र सेवन करते हुए तपश्चरण), हेमन्त-ऋतुमें जलवासन | और श्रीशैलक्षेत्र—इनमें [तपस्या करनेका] जो फल (कण्ठ या नाभिपर्यन्त जलमें स्थित रहना) और वर्षा- | होता है, उससे कोटिगुना अधिक फल मनुष्योंको सर्वदा ऋतुमें आकाशवास (खुले आकाशके नीचे रहकर | [इस पुराणके श्रवणसे] मिल जाता है ॥ ६२-६३ ॥ वृष्टिका सहन) करता है, उसको मिलनेवाला फल | वैसे ही गोमतीनदीके संगममें जो मनुष्य भक्तिपूर्वक गणेशपुराणके पाँच अध्यायोंको सुननेमात्रसे मिल जाता | स्नान करता है, उससे मिलनेवाले पुण्यफलसे कोटिगुना है। जो मनुष्य भक्तिभावसे सर्वदा (यावज्जीवन) अग्निहोत्रका | अधिक फल इस पुराणका श्रवण करनेसे वह प्राप्त कर अनुष्ठान करता है, उसे प्राप्त होनेवाला फल इस पुराणका | लेता है ॥ ६४ ॥ श्रवण करनेमात्रसे मिल जाता है ॥ ५५-५७ ॥ | जो भक्तिमान् मनुष्य इस गणेशपुराणका श्रवण हे द्विजो ! जो मनुष्य दस हजार वर्षोंतक अपने | करता है, उसे न [भगवान् शंकरके] त्रिशूलसे, न पैरके एक अंगूठेके सहारे खड़ा रहकर तपस्या करता है, | [देवराज इन्द्रके] वज्रसे और न चक्रधर भगवान् उसको जैसा फल मिलता है, वैसा ही पुण्यफल इस | नारायणके सुदर्शन चक्रसे ही भय रह जाता है ॥ ६५ ॥ पुराणके दस अध्यायोंको भक्तिभावसे सुननेमात्रसे निश्चय | हे मुनीश्वरो ! मैंने आपलोगोंके समक्ष इस पुराणका ही प्राप्त हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ५८ १/२ ॥ | विस्तारपूर्वक समग्र वर्णन किया है। इसके सम्पूर्ण जो मनुष्य यावज्जीवन इस लोकमें नित्यप्रति | माहात्म्यको तो ब्रह्मा, कार्तिकेय अथवा शेषनाग भी गणेशपुराणका श्रवण करता है, वह चक्रवर्ती सम्राट् होता | करोड़ों वर्षोंमें बतलानेमें समर्थ नहीं हो सकते ॥ ६६ ॥ है। जो मनुष्य जन्मसे लेकर मृत्युपर्यन्त काशीवास करता | आप लोगोंने जो पूछा है, वह सभी पापोंका है, उसे [काशीवाससे] मिलनेवाला पुण्यफल गणेशपुराणके | नाशक, सभी अभीष्टोंको देनेवाला, भोग-मोक्षप्रद तथा श्रवणसे प्राप्त हो जाता है ॥ ५९-६० १/२ ॥ | पुण्योंकी वृद्धि करनेवाला है। नानाविध लीलाएँ करनेवाले जो मनुष्य एक हजार माघमासोंतक प्रयागमें | परमेश्वर गणपतिका यह पुराण वक्ता और श्रोताको स्नान करता है, उससे मिलनेवाला जो पुण्यफल है, वही | निष्पाप बनानेवाला है। [इसे मैं आप लोगोंको सुना चुका फल उसको गणेशपुराणका श्रवण करनेसे प्राप्त हो | हूँ], अब आप और क्या सुनना चाहते हैं? ॥ ६७-६८॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'फलश्रुतिनिरूपण' नामक एक सौ पचपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण क्रीडाखण्ड पूर्ण हुआ ॥ ॥ गणेशपुराण सम्पूर्ण ॥
अङ्क ] * नम्र निवेदन एवं क्षमा-प्रार्थना * ६४१ नम्र निवेदन एवं क्षमा-प्रार्थना
एक या अधिक महापुराण उपलब्ध ही हैं। गणेशजीपर भी २१००० श्लोकीय गणेश-भागवतके विषयमें सुना जाता है, परंतु दुर्भाग्यवश अबतक उसकी कोई प्रति मिल नहीं सकी है। अन्यान्य महापुराणोंके अन्तर्गत भी गणपति- केन्द्रित खण्ड कहे जाते हैं, यथा- ब्रह्मवैवर्तपुराणका गणपतिखण्ड, वामनपुराणकी सहस्रश्लोकी गाणेश्वरी- संहिता इत्यादि। इनमेंसे केवल गणपतिखण्ड ही प्राप्त है। इस परिप्रेक्ष्यमें गाणपत्य-सम्प्रदाय एवं अन्य गणेशभक्तोंमें गणेशपुराणका महत्त्व सर्वोपरि है। सभी एक मतसे गणेशोपपुराणको महापुराणके समान महत्त्व एवं आदर देते हैं। इसके प्रमाण भी धर्मशास्त्रमें यत्र-तत्र ससम्मान उद्धृत किये जाते रहे हैं। गणेशजीपर मुद्गलपुराण नामक एक अन्य उपपुराण भी प्राप्त है, परंतु गणेशपुराणकी प्रसिद्धि अपेक्षाकृत अधिक है।
गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम् । उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम्॥
गणेशपुराणमें ११००० से अधिक श्लोक हैं, जो दो खण्डोंमें विभाजित हैं—प्रथम उपासनाखण्ड तथा दूसरा क्रीड़ाखण्ड। उल्लेखनीय है कि कुछ महापुराण भी परिमाणमें प्रायः गणेशपुराणके बराबर ही हैं। सुप्रसिद्ध गणेशगीता भी इसी 'गणेशपुराण' के क्रीड़ाखण्डके अन्तर्गत समाहित है।
'जो हाथीके समान मुखवाले हैं, भूतगणादिसे सदा सेवित रहते हैं, कैथ तथा जामुन फल जिनके लिये प्रिय भोज्य हैं, पार्वतीके पुत्र हैं तथा जो प्राणियोंके शोकका विनाश करनेवाले हैं, उन विघ्नेश्वरके चरणकमलोंमें नमस्कार करता हूँ।'
आर्ष वाङ्मयमें वेदका सर्वोपरि स्थान है, परंतु वेदोंमें उन्हींका अधिकार है, जिनका उपनयन हुआ हो। इस दृष्टिसे स्त्री, अनुपनीत व्यक्ति तथा अन्य वर्णोंके कल्याणहेतु पुराण-साहित्यका आश्रयण सर्वथा निरापद एवं कल्याणकारी है। वस्तुतः पुराणोंमें सर्वसामान्य एवं विद्वान्—सभीके लिये वेदोक्त ज्ञानका ही उपबृंहण सरल-सुबोध भाषा- शैलीमें किया गया है। स्मार्त-परम्परामें पंचदेवोपासनाके अन्तर्गत—गणेश, शिव, शक्ति, विष्णु एवं सूर्यकी गणना होती है। भगवान्के अन्यान्य स्वरूप एवं अवतार आदि इन्हींके अन्तर्गत आ जाते हैं। इनमेंसे प्रत्येकपर केन्द्रित
'गणेशपुराण' के आदिवक्ता पितामह ब्रह्माजी हैं, जिसे उन्होंने सर्वप्रथम महर्षि व्यासको सुनाया। भगवान् व्याससे इसे महर्षि भृगुने प्राप्त किया, तदनन्तर भृगुमुनिने कृपापूर्वक इसे सौराष्ट्रदेशके सोमकान्त नामक एक धर्मपरायण राजाको प्रदान किया, जिसके प्रभावसे वे धर्मात्मा नरेश दुर्भाग्यवश प्राप्त हुए गलितकुष्ठरूपी महान् क्लेशसे सर्वथा मुक्त होकर निर्मल एवं आनन्दित हो गये थे। वस्तुतः गणेशपुराणकी कथा अत्यन्त दिव्य एवं पुरुषार्थचतुष्टयकी सिद्धि प्रदान करनेमें सर्वथा समर्थ है। इन्हीं सब दृष्टियोंसे इस पुराणके विशेषाङ्कके रूपमें प्रकाशनकी योजना बनी थी। भगवान् गणेशकी कृपासे यह आप महानुभावोंके समक्ष प्रस्तुत है। प्रारम्भमें यह योजना थी कि इस पुराणको मूल
६४२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
श्लोक तथा अनुवादके साथ विशेषाङ्कमें तथा आगेके कुछ मासिक अंकोंमें प्रकाशित किया जाय; किंतु ग्रन्थका कलेवर बढ़ जानेके भयसे तथा कभी-कभी मासिक अंकोंकी प्रतियाँ विशेषांकके साथ न रह पानेकी सम्भावनाके कारण यह विचार बदल देना पड़ा। गम्भीर विचार करनेपर यह निर्णय लिया गया कि गणेशपुराणका भाषानुवाद श्लोकाङ्क- सहित एक ही अङ्कमें—सन् २०२१ ई०के विशेषाङ्कके रूपमें निकाला जाय तथा भविष्यमें मूल श्लोकोंके साथ हिन्दी-अनुवाद पुस्तकरूपमें प्रकाशित कर दिया जाय, ताकि श्रीमद्भागवत, श्रीमद्देवीभागवत, श्रीविष्णुपुराण, श्रीकूर्म- पुराण, श्रीमत्स्यपुराण, श्रीवामनपुराण आदिके समान यह श्रीगणेशपुराण भी मूल तथा हिन्दी-अनुवादके साथ उपलब्ध हो जाय। यह निर्णय प्रायः अन्तिम समयमें हुआ, जिस कारण विशेषाङ्कके प्रकाशनमें कुछ विलम्ब भी हो गया। अकारणकरुणावरुणालय भगवान् गणेशजीकी अनुकम्पासे इस वर्ष विशेषाङ्कका सब कार्य सानन्द सम्पन्न हुआ। इस पुराणमें कुछ ऐसे भी स्थल हैं, जिनके भावोंको पूर्णरूपसे समझनेमें कठिनाईका अनुभव होता है, पर विद्वद्गणोंके सहयोगसे मूल श्लोकोंके भावोंको स्पष्ट करनेका विशेष ध्यान रखा गया है। काशीनिवासी पुराणोंके विद्वान् एवं गणेशपुराणके पाठभेदोंपर अपना मौलिक एवं वैदुष्यपूर्ण शोध-प्रबन्ध प्रस्तुत करनेवाले डॉ० श्रीश्याम गंगाधरजी बापटने भी इसके कुछ अंशोंका अनुवाद करनेकी महती कृपा की, साथ ही उनकी अनुमतिसे उनके उक्त शोध-प्रबन्धकी सहायता लेकर हमें पाठ निर्धारण करनेमें भी बड़ी सुविधा रही, जिसके लिये हम हृदयसे उनके कृतज्ञ हैं। इस पुराणके मूल श्लोकोंके अनुवादमें तथा इनके संशोधन एवं परिवर्द्धनमें सनातनधर्मकी शास्त्रीय परम्पराओंसे समन्वित अन्यान्य विद्वानोंने भी पूर्ण परिश्रमपूर्वक अपना योगदान किया। मैं इन महानुभावोंके प्रति आभार व्यक्त करते हुए इनके चरणोंमें प्रणति निवेदन करता हूँ। इस विशेषाङ्कके अनुवाद तथा इसकी आवृत्ति, प्रूफ-संशोधन तथा सम्पादनके कार्योंमें सम्पादकीय विभागके मेरे सहयोगी विद्वानोंने तथा अन्य सभी लोगोंने मनोयोगपूर्वक सहयोग प्रदान किया है, फिर भी अनुवाद, संशोधन तथा छपाई आदिमें कोई भूल हो तो इसके लिये हमारा अपना अज्ञान तथा प्रमाद ही कारण है, अतः इसके लिये हम अपने पाठकोंके प्रति क्षमाप्रार्थी हैं। इस बार 'श्रीगणेशपुराण' के सम्पादन-कार्यके क्रममें परम करुणानिधान, सर्वविघ्नहर्ता, विघ्नाधिपति भगवान् श्रीगणेशजी एवं उनकी ललित कथाओंका चिन्तन, मनन तथा स्वाध्यायका सौभाग्य निरन्तर प्राप्त होता रहा, यह हमारे लिये विशेष महत्त्वकी बात है। हमें आशा है कि इस विशेषाङ्कके पठन-पाठनसे हमारे सहृदय पाठकोंको भी यह सौभाग्य-लाभ अवश्य प्राप्त होगा। पाठकगण इस पुण्यमय पुराणको पढ़कर लाभ उठायें तथा लोक-परलोकमें सुख-शान्ति और मानवजीवनके परम एवं चरम लक्ष्य भगवान् गणेशजीकी करुणामयी कृपा प्राप्त करें—यही प्रार्थना है। अन्तमें अपनी त्रुटियोंके लिये हम सबसे क्षमा माँगते हुए अपने इस लघु प्रयासको विघ्नहर्ता भगवान् गणेशजीके चरणकमलोंमें अर्पित करते हैं, साथ ही भगवान् विनायकके श्रीचरणोंमें यह प्रार्थना निवेदित करते हैं— मुदा करात्तमोदकं सदा विमुक्तिसाधकं कलाधरावतंसकं विलासिलोकरञ्जकम्। अनायकैकनायकं विनाशितेभदैत्यकं नताशुभाशुनाशकं नमामि तं विनायकम्॥ 'जिन्होंने बड़े आनन्दसे अपने हाथमें मोदक ले रखे हैं; जो सदा ही मुमुक्षुजनोंकी मोक्षाभिलाषाको सिद्ध करनेवाले हैं; चन्द्रमा जिनके भालदेशके भूषण हैं; जो भक्तिभावमें निमग्न लोगोंके मनको आनन्दित करते हैं; जिनका कोई नायक या स्वामी नहीं है; जो एकमात्र स्वयं ही सबके नायक हैं; जिन्होंने गजासुरका संहार किया है तथा जो नतमस्तक पुरुषोंके अशुभका तत्काल नाश करनेवाले हैं, उन भगवान् विनायकको मैं प्रणाम करता हूँ।' —राधेश्याम खेमका (सम्पादक)
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कॉलम १
कोड | श्रीमद्भगवद्गीता गीता-तत्त्व-विवेचनी- ■ 1 बृहदाकार ■ 2 ,, ग्रन्थाकार विशिष्ट संस्करण [बाँग्ला, तमिल, ओड़िआ, कन्नड, अंग्रेजी, तेलुगु, गुजराती, मराठीमें भी] ■ 3 ,, साधारण संस्करण गीता-साधक-संजीवनी- ■ 5 बृहदाकार, परिशिष्टसहित ■ 6 ,, ग्रन्थाकार, परिशिष्टसहित [मराठी, तमिल (दो खण्डोंमें), गुजराती, अंग्रेजी (दो खण्डोंमें), कन्नड (दो खण्डोंमें), बाँग्ला, ओड़िआमें भी] ■ 8 गीता-दर्पण- (स्वामी श्रीरामसुखदासजीद्वारा) गीताके तत्त्वोंपर प्रकाश [मराठी, बाँग्ला, ओड़िआमें भी] ■1562 गीता-प्रबोधनी-पुस्तकाकार [असमिया, बाँग्ला, ओड़िआमें भी] ■1590 ,, पॉकेट, वि०सं० ■1796 श्रीज्ञानेश्वरी-हिन्दीभावानुवाद ■1958 गीता-संग्रह ■ 784 ज्ञानेश्वरी गूढार्थ-दीपिका [मराठी] ■ 859 ,, मूल, मझला [मराठी] ■ 748 ,, मूल, गुटका [मराठी] ■ 10 गीता-शांकर-भाष्य ■ 581 गीता-रामानुज-भाष्य ■ 11 गीता-चिन्तन- (श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दारके गीता-विषयक लेखों, विचारों, पत्रों आदिका संग्रह) ■ 17 गीता-मूल, पदच्छेद, अन्वय, भाषा-टीका [गुजराती, बाँग्ला, मराठी, नेपाली, कन्नड, तेलुगु, तमिलमें भी] ■1973 गीता-पदच्छेद-अन्वय-पॉकेट, वि०सं० ■ 16 गीता-प्रत्येक अध्यायके माहात्म्यसहित, सजिल्द, मोटे अक्षरोंमें (मराठी, गुजराती भी) ■1555 गीता-माहात्म्य (विशिष्ट सं०) ■ 19 गीता-केवल भाषा (तेलुगु, उर्दू, तमिलमें भी)
कॉलम २
कोड ■ 18 गीता-भाषा-टीका, टिप्पणी-प्रधान विषय, मोटा टाइप [ओड़िआ, गुजराती, मराठी, मलयालममें भी] ■ 502 गीता-भाषा-टीका, (सजि०) [तेलुगु, ओड़िआ, गुजराती, कन्नड़, तमिलमें भी] ■ 20 गीता-भाषा-टीका, पॉकेट साइज [अंग्रेजी, मराठी, बाँग्ला, असमिया, ओड़िआ, गुजराती, कन्नड, तेलुगु, तमिल, मलयालम भी] ■1566 गीता-भाषा-टीका, पॉकेट साइज, सजिल्द [गुजराती, बाँग्ला, ओड़िआ, अंग्रेजी भी] ■2025 गीता-हिन्दी, संस्कृत अजिल्द पाकेट ■ 21 श्रीपञ्चरत्नगीता-गीता, विष्णुसहस्रनाम, भीष्मस्तवराज, अनुस्मृति, गजेन्द्रमोक्ष (मोटे अक्षरोंमें) [ओड़िआमें भी] ■2210 ,, (नित्यस्तुति एवं गजल-गीतासहित) पॉकेट साइज (वि०सं०) ■ 22 गीता-मूल, मोटे अक्षरोंवाली [तेलुगु, गुजरातीमें भी] ■ 23 गीता-मूल, विष्णुसहस्रनामसहित [कन्नड, तेलुगु, तमिल, मलयालम, ओड़िआमें भी] ■1602 गीता-भाषा-टीका सजिल्द (वि०सं०)-लघु आकार ■ 700 गीता-मूल, लघु आकार (ओड़िआ, बाँग्ला, तेलुगुमें भी) ■1392 गीता ताबीजी-(सजिल्द) [गुजराती, बाँग्ला, तेलुगु, ओड़िआमें भी] ■ 566 गीता-ताबीजी एक पन्नेमें सम्पूर्ण गीता (१०० प्रति एक साथ) ▲ 388 गीता-माधुर्य-सरल प्रश्नोत्तर-शैलीमें (हिन्दी) [तमिल, मराठी, गुजराती, तेलुगु, नेपाली, बाँग्ला, असमिया, कन्नड़, ओड़िआ, अंग्रेजीमें भी] ■1242 पाण्डवगीता एवं हंसगीता
कॉलम ३
कोड ■1431 गीता-दैनन्दिनी-पुस्तकाकार, वि०सं० (बाँग्ला, तेलुगु, ओड़िआमें भी) ■ 503 गीता-दैनन्दिनी-रोमन, पुस्तकाकार, प्लास्टिक जिल्द ■ 506 गीता-दैनन्दिनी-पाकेट ▲ 464 गीता-ज्ञान-प्रवेशिका ■ 508 गीता-सुधा-तरंगिणी ■2042 गीता व्याकरण-सजिल्द ■2099 सरल गीता-दो रंगोंमें (गुजराती, नेपाली, ओड़िआ, मराठी, अंग्रेजीमें भी) ■2178 सरल गीता-सजिल्द ■2181 ,, (मूल-पाठ) पॉकेट साइज सजिल्द रामायण ■1389 श्रीरामचरितमानस-बृहदाकार (विशिष्ट संस्करण) ■ 80 ,, बृहदाकार (सामान्य संस्करण) ■1095 श्रीरामचरितमानस-ग्रन्थाकार (वि०सं०) [गुजरातीमें भी] ■ 81 ,, ग्रन्थाकार सचित्र, सटीक, मोटा टाइप, [ओड़िआ, बाँग्ला, तेलुगु, मराठी, गुजराती, कन्नड, अंग्रेजी, नेपालीमें भी] ■1402 ,, सटीक, ग्रंथाकार ■2166 श्रीरामचरितमानस-सटीक, ग्रंथाकार (सामान्य संस्करण) ■ 790 श्रीरामचरितमानस-केवल हिन्दी, अनुवाद ■1563 ,, मझला, सटीक, वि० सं० ■ 82 ,, मझला साइज, सटीक सजिल्द [गुजराती, अंग्रेजी भी] ■1318 ,, रोमन, ग्रन्थाकार ■1617 ,, ,, मझला ■ 456 ,, अंग्रेजी अनुवादसहित ■1436 ,, मूलपाठ बृहदाकार ■ 83 ,, मूलपाठ, ग्रंथाकार [गुजराती, ओड़िआ भी] ■ 84 ,, मूल, मझला साइज [गुजराती भी] ■ 85 ,, मूल, गुटका [,,] ■1544 ,, मूल गुटका (वि०सं०) [श्रीरामचरितमानस-अलग-अलग काण्ड (सटीक)] ■ 94 श्रीरामचरितमानस-बालकाण्ड ■ 95 ,, अयोध्याकाण्ड
कॉलम ४
कोड ■ 98 श्रीरामचरितमानस-सुन्दरकाण्ड [कन्नड, तेलुगु, बाँग्ला भी] ■1349 ,, सुन्दरकाण्ड सटीक मोटा टाइप (लाल अक्षरोंमें) (श्रीहनुमानचालीसासहित) [गुजरातीमें भी] ■ 101 ,, लंकाकाण्ड ■ 102 ,, उत्तरकाण्ड ■ 141 ,, अरण्य, किष्किन्धा एवं सुन्दरकाण्ड ■ 2107 ,, किष्किन्धाकाण्ड-सटीक, पॉकेट ■ 2234 ,, सुन्दरकाण्ड मूल बृहदाकार (रंगीन) ■ 1583 ,, सुन्दरकाण्ड, (मूल) मोटा (आड़ी) रंगीन ■ 1919 ,, ,, रंगीन (वि० सं०) ■ 2130 ,, ,, सचित्र, मोटा टाइप ■ 99 श्रीरामचरितमानस-सुन्दरकाण्ड-मूल, गुटका [गुजराती भी] ■ 100 ,, सुन्दरकाण्ड मूल, मोटा टाइप [गुजराती, ओड़िआ, नेपाली भी] ■ 858 ,, सुन्दरकाण्ड-मूल, लघु आकार [गुजराती भी] ■1710 ,, किष्किन्धाकाण्ड ■ 86 मानसपीयूष- (श्रीरामचरितमानसपर सुप्रसिद्ध तिलक, टीकाकार-श्रीअञ्जनीनन्दनशरण (सातों खण्ड) (अलग-अलग खण्ड भी उपलब्ध) ■1907 श्रीमद्वाल्मीकीयरामायण-बृहदाकार, भाषा ■ 75 श्रीमद्वाल्मीकीय-रामायण- 76 सटीक, दो खण्डोंमें सेट [कन्नड़, गुजराती, तेलुगु भी] ■ 77 ,, -केवल भाषा [गुजराती भी] ■ 583 ,, (मूलमात्रम्) ■1953 ,, सुन्दरकाण्ड-पुस्तकाकार मूलमात्रम् [तमिल भी] ■ 78 श्रीमद्वाल्मीकीयरामायण सुन्दरकाण्ड-मूल, गुटका ■1549 श्रीमद्वाल्मीकीयरामायण सुन्दरकाण्ड-सटीक [तमिल भी]
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| ■ 452} श्रीमद्वाल्मीकीयरामायण (अंग्रेजी<br> 453} अनुवादसहित दो खण्डोंमें सेट)<br>■1291 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण<br> कथा सुधा सागर<br>■ 74 अध्यात्मरामायण-सटीक<br> [तमिल, तेलुगु, कन्नड, मराठी भी]<br>■ 223 मूल रामायण<br> [गुजराती, मराठी भी]<br>▲1654 लवकुश-चरित्र<br>▲ 401 मानसमें नाम-वन्दना<br>■ 103 मानस-रहस्य<br>■ 104 मानस-शंका-समाधान | ■2009 भागवत नवनीत (संत श्रीडोंगरेंजी<br> महाराज) [गुजराती भी]<br>■ 571 श्रीकृष्णलीलाचिन्तन<br>■ 30 श्रीप्रेम-सुधासागर<br>■ 31 भागवत एकादश स्कन्ध<br>■1927 जीवन-संजीवनी<br>■ 728 महाभारत-हिन्दी टीकासहित,<br> सजिल्द, सचित्र [छः खण्डोंमें] सेट<br> (अलग-अलग खण्ड भी उपलब्ध)<br>■ 38 महाभारत-खिलभाग<br> हरिवंशपुराण-सटीक<br>■1589 ,, केवल हिन्दी [गुजराती भी]<br>■ 39 } संक्षिप्त महाभारत-केवल<br> 511} भाव, सचित्र सजिल्द सेट (दो खण्डोंमें)<br> [बँगला, गुजराती, तेलुगु भी]<br>■ 44 संक्षिप्त पद्मपुराण-<br> सचित्र, सजिल्द [गुजराती भी] | ■ 47 पातञ्जलयोग-प्रदीप<br>■ 135 पातञ्जलयोगदर्शन [बँगला भी]<br>■ 517 गर्गसंहिता<br>■ 582 छान्दोग्योपनिषद्<br> सानुवाद शांकरभाष्य<br>■ 577 बृहदारण्यकोपनिषद्-(,,)<br>■ 1421 ईशादि नौ उपनिषद्- (,,)<br> एक ही जिल्दमें<br>■ 66 ईशादि नौ उपनिषद्-<br> अन्वय-हिन्दी व्याख्या [बँगला भी]<br>■ 67 ईशावास्योपनिषद्-सानुवाद,<br> शांकरभाष्य [तेलुगु, कन्नड भी]<br>■ 68 केनोपनिषद्-सानुवाद, शांकरभाष्य<br>■ 578 कठोपनिषद्- "<br>■ 69 माण्डूक्योपनिषद्- "<br>■ 513 मुण्डकोपनिषद्- "<br>■ 70 प्रश्नोपनिषद्- "<br>■ 71 तैत्तिरीयोपनिषद्- "<br>■ 72 ऐतरेयोपनिषद्- "<br>■ 73 श्वेताश्वतरोपनिषद्-,,<br>■ 65 वेदान्त-दर्शन-हिन्दी<br> व्याख्या-सहित, सजिल्द | ■ 174 भक्त चन्द्रिका-सखू,<br> विट्ठल आदि छः भक्तगाथा<br> [गुजराती, कन्नड, तेलुगु,<br> मराठी, ओड़िआ भी]<br>■ 176 प्रेमी भक्त-बिल्वमंगल,<br> जयदेव आदि [गुजराती भी]<br>■ 177 प्राचीन भक्त-<br> मार्कण्डेय, उत्तंक आदि<br>■ 178 भक्त सरोज-गंगाधरदास,<br> श्रीधर आदि [गुजराती भी]<br>■ 179 भक्त सुमन-नामदेव, राँका-<br>बाँका आदिकी भक्तगाथा<br> [गुजराती भी]<br>■ 180 भक्त सौरभ-व्यासदास,<br> प्रयागदास आदि<br>■ 181 भक्त सुधाकर-रामचन्द्र, लाखा<br> आदिकी भक्तगाथा [गुजराती भी]<br>■ 182 भक्त महिलारत्न-रानी रत्नावती,<br> हरदेवी आदि [गुजराती भी]<br>■ 186 सत्यप्रेमी हरिश्चन्द्र<br> [ओड़िआ, अंग्रेजी भी]<br>■ 183 भक्त दिवाकर-सुव्रत,<br> वैश्वानर आदिकी भक्तगाथा |
| अन्य तुलसीकृत साहित्य | भक्त-चरित्र | ■ 184 भक्त रत्नाकर-माधवदास,<br> विमलतीर्थ आदि चौदह भक्तगाथा<br>■ 185 भक्तराज हनुमान्-हनुमान्जीका<br> जीवनचरित्र [मराठी, अंग्रेजी,<br> ओड़िआ, तमिल, तेलुगु, कन्नड,<br> गुजराती भी]<br>■ 187 प्रेमी भक्त उद्धव [तमिल,<br> तेलुगु, गुजराती, ओड़िआ भी]<br>■ 188 महात्मा विदुर [गुजराती,<br> तमिल, ओड़िआ भी]<br>■ 136 विदुरनीति-[नेपाली, अंग्रेजी,<br> कन्नड़, तमिल, तेलुगु भी]<br>■ 138 भीष्मपितामह [तेलुगु भी]<br>■ 189 भक्तराज ध्रुव [तेलुगु भी] | |
| ■ 105 विनयपत्रिका-सरल<br> भावार्थसहित<br>■1701 विनयपत्रिका, सजिल्द<br>■ 106 गीतावली-भावार्थसहित<br>■ 107 दोहावली- "<br>■ 108 कवितावली- "<br>■ 109 रामाज्ञाप्रश्न-भावार्थसहित<br>■ 110 श्रीकृष्णगीतावली "<br>■ 111 जानकीमंगल- "<br>■ 112 हनुमानबाहुक- "<br>■ 113 पार्वतीमंगल- "<br>■ 114 वैराग्य-संदीपनी एवं<br> बरवै रामायण | ■2223} श्रीशिवमहापुराण-सटीक, भाग-१<br>■2224} श्रीशिवमहापुराण-सटीक, भाग-२<br>■2020 शिवमहापुराण मूलमात्रम्<br>■1468 सं० शिवपुराण (वि० सं०)<br>■ 789 सं० शिवपुराण-मोटा टाइप<br> [बँगला, तेलुगु, कन्नड़, तमिल,<br> गुजराती भी]<br>■1133 सं० देवीभागवत<br> [गुजराती, कन्नड़, तेलुगु भी]<br>■1770 श्रीमद्देवीभागवत-मूल<br>■ 48 श्रीविष्णुपुराण-सटीक<br> [बँगला, गुजराती भी]<br>■1364 श्रीविष्णुपुराण (केवल हिन्दी)<br>■1183 सं० नारदपुराण<br>■ 279 सं० स्कन्दपुराणाङ्क [गुजराती भी]<br>■ 539 सं.मार्कण्डेयपुराण [गुजराती, तेलुगु भी]<br>■1111 सं० ब्रह्मपुराण [गुजराती भी]<br>■1113 नरसिंहपुराणम्-सटीक<br>■1189 सं० गरुडपुराण [गुजराती भी]<br>■1362 अग्निपुराण (मूल संस्कृतका<br> हिन्दी-अनुवाद)<br>■1432 वामनपुराण-सटीक<br>■1985 लिङ्गमहापुराण-सटीक [गुजराती]<br>■1897} देवीभागवतमहापुराण-<br> सटीक, प्रथम खण्ड<br>■1898} देवीभागवतमहापुराण-<br> सटीक, द्वितीय खण्ड<br>■ 557 मत्स्यमहापुराण-सटीक<br>■1610 महाभागवत देवीपुराण<br>■1361 सं० श्रीवराहपुराण<br>■ 584 सं० भविष्यपुराण [गुजराती भी]<br>■1131 कूर्मपुराण-सटीक<br>■ 631 सं० ब्रह्मवैवर्तपुराण [गुजराती भी] | ■2066 श्रीभक्तमाल<br>■ 40 भक्त चरिताङ्क-सचित्र, सजिल्द<br>■1771 जैमिनीकृतमहाभारतमें<br> भक्तोंकी गाथा-सजिल्द<br>■ 51 श्रीतुकाराम-चरित<br>■ 121 एकनाथ-चरित्र<br>■ 53 भागवतरत्न प्रह्लाद<br>■ 123 चैतन्य-चरितावली<br>■ 751 देवर्षि नारद<br>■ 168 भक्त नरसिंह मेहता<br> [मराठी, गुजराती भी]<br>■ 169 भक्त बालक-गोविन्द, मोहन<br> आदिकी गाथा [तेलुगु, कन्नड,<br> मराठी भी]<br>■ 170 भक्त नारी-<br> मीरा, शबरी आदिकी गाथा<br>■ 171 भक्त पञ्चरत्न-रघुनाथ,<br> दामोदर आदिकी [तेलुगु भी]<br>■ 172 आदर्श भक्त-<br> शिवि, रन्तिदेव आदिकी गाथा<br> [तेलुगु, कन्नड भी]<br>■ 175 भक्त-कुसुम-जगन्नाथ<br> आदि छः भक्तगाथा<br>■ 173 भक्त सप्तरत्न-<br> दामा, रघु आदिकी भक्तगाथा<br> [गुजराती, कन्नड भी] | |
| सूर-साहित्य | परम श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दकाके शीघ्र कल्याणकारी प्रकाशन | ||
| ■ 555 श्रीकृष्णमाधुरी<br>■ 61 सूर-विनय-पत्रिका<br>■ 62 श्रीकृष्ण-बाल-माधुरी<br>■ 735 सूर-रामचरितावली<br>■ 547 विरह-पदावली<br>■ 864 अनुराग-पदावली | ■ 683 तत्त्वचिन्तामणि [गुजराती भी]<br> (सभी खण्ड एक साथ)<br>■ 814 साधन-कल्पतरु<br> (१३ महत्त्वपूर्ण पुस्तकोंका संग्रह)<br>▲2117 प्रेमके वशमें भगवान्<br>▲1876 एक महापुरुषके<br> अनुभवकी बातें<br>▲2027 भगवत्प्राप्तिकी अमूल्य बातें<br>▲1944 परम सेवा<br>▲1597 चिन्ता-शोक कैसे मिटें? | ||
| पुराण, उपनिषद् आदि | |||
| ■1930 श्रीमद्भागवत-सुधासागर<br> (कन्नड़, तेलुगु, मराठी, गुजराती भी)<br>■1945 ,, (विशिष्ट संस्करण)<br>■ 25 श्रीकृष्णसुधासागर-<br> बृहदाकार, बड़े टाइपमें<br>■1951} श्रीमद्भागवतमहापुराण-सटीक<br>■1952} ओड़िआ-दो खण्डोंमें सेट<br>■ 26} श्रीमद्भागवतमहापुराण-<br> 27} सटीक, दो खण्डोंमें सेट<br> [अंग्रेजी, तेलुगु, तमिल, ओड़िआ,<br> गुजराती, मराठी, बँगला भी]<br>■ 564 } श्रीमद्भागवतमहापुराण-<br> 565 } अंग्रेजी सेट दो खण्डोंमें<br>■ 29 ,,मूल मोटा टाइप [तेलुगु भी]<br>■ 124 ,, मूल मझला<br>■1855 ,, मूल गुटका-वि०सं० |
[ ६४५ ]
| कोड | कोड | कोड | कोड |
|---|---|---|---|
| ▲1631 भगवान् कैसे मिलें ? | ▲ 254 व्यवहारमें परमार्थकी कला—<br>त० चि० भाग-५, (खण्ड-१)<br>[गुजराती भी] | ▲1022 निष्काम श्रद्धा और प्रेम<br>[ओड़िआ भी] | ▲ 293 सच्चा सुख और.......<br>[गुजराती भी] |
| ▲1653 मनुष्य-जीवनका उद्देश्य | ▲ 255 श्रद्धा-विश्वास और प्रेम-<br>गुजराती, भाग-५,<br>(खण्ड-२) [गुजराती भी] | ▲ 292 नवधा भक्ति<br>[तेलुगु, मराठी, कन्नड भी] | ▲ 294 संत-महिमा [गुजराती, ओड़िआ भी] |
| ▲1681 भगवत्प्राप्ति कठिन नहीं | ▲ 258 तत्त्वचिन्तामणि—<br>भाग-६, (खण्ड-१) | ▲ 274 महत्त्वपूर्ण चेतावनी | ▲ 295 सत्संगकी कुछ सार बातें<br>[बँगला, तमिल, तेलुगु, गुजराती,<br>ओड़िआ, मराठी, अंग्रेजी भी] |
| ▲1747 भगवत्प्राप्ति कैसे हो ? | ▲ 257 परमानन्दकी खेती—<br>भाग-६, (खण्ड-२) | ▲1871 आवागमनसे मुक्ति | ▲ 301 भारतीय संस्कृति तथा<br>शास्त्रोंमें नारीधर्म |
| ▲1666 कल्याण कैसे हो ? | ▲ 260 समता अमृत और विषमता विष-<br>भाग-७, (खण्ड-१) | ▲ 273 नल-दमयन्ती [मराठी, तमिल,<br>कन्नड, अंग्रेजी, बँगला, गुजराती,<br>ओड़िआ, तेलुगु भी] | ▲ 310 सावित्री और सत्यवान्<br>[गुजराती, तमिल, तेलुगु, अंग्रेजी,<br>बँगला, ओड़िआ, कन्नड़, मराठी भी] |
| ▲ 527 प्रेमयोगका तत्त्व<br>[अंग्रेजी भी] | ▲ 259 भक्ति-भक्त-भगवान्-<br>भाग-७, (खण्ड-२) | ▲ 277 उद्धार कैसे हो ?—<br>५१ पत्रोंका संग्रह [गुजराती,<br>ओड़िआ, मराठी भी] | ▲ 623 धर्मके नामपर पाप [गुजराती भी] |
| ▲ 242 महत्त्वपूर्ण शिक्षा—<br>[तेलुगु भी] | ▲ 256 आत्मोद्धारके सरल उपाय | ▲1856 महात्माओंकी अहैतुकी दया | ▲ 299 श्रीप्रेमभक्ति-प्रकाश—<br>ध्यानावस्थामें प्रभुसे वार्तालाप<br>[तेलुगु व अंग्रेजी भी] |
| ▲ 528 ज्ञानयोगका तत्त्व<br>[अंग्रेजी भी] | ▲261 भगवान्के रहनेके पाँच स्थान<br>[मराठी, कन्नड, तेलुगु, तमिल,<br>गुजराती, ओड़िआ, अंग्रेजी भी] | ▲1860 भगवत्प्राप्तिकी युक्तियाँ | ▲ 304 गीता पढ़नेके लाभ और<br>त्यागसे भगवत्प्राप्ति-गजल-<br>गीतासहित [गुजराती, असमिया,<br>बँगला, तमिल, मराठी भी] |
| ▲ 266 कर्मयोगका तत्त्व-I<br>(गुजराती भी) | ▲ 262 रामायणके कुछ आदर्श पात्र<br>[तेलुगु, अंग्रेजी, कन्नड,<br>गुजराती, ओड़िआ, नेपाली,<br>तमिल, मराठी भी] | ▲1874 महत्त्वपूर्ण कल्याणकारी बातें | ▲ 297 गीतोक्त संन्यास तथा<br>निष्काम कर्मयोगका स्वरूप |
| ▲ 267 कर्मयोगका तत्त्व—(भाग-२) | ▲ 263 महाभारतके कुछ आदर्श पात्र<br>[तेलुगु, अंग्रेजी, कन्नड़,<br>गुजराती, तमिल, मराठी भी] | ▲1790 जन्म-मरणसे छुटकारा | ▲ 309 भगवत्प्राप्तिके विविध उपाय<br>[ओड़िआ भी] |
| ▲ 303 प्रत्यक्ष भगवद्दर्शनके उपाय<br>[तमिल, गुजराती भी] | ▲ 264 मनुष्य-जीवनकी<br>सफलता—भाग-१ | ▲ 278 सच्ची सलाह-८० पत्रोंका संग्रह | ▲ 311 परलोक और पुनर्जन्म<br>एवं वैराग्य [ओड़िआ भी] |
| ▲ 298 भगवान्के स्वभावका रहस्य<br>[तमिल, गुजराती, मराठी भी] | ▲ 265 मनुष्य-जीवनकी<br>सफलता—भाग-२ | ▲ 280 साधनोपयोगी पत्र | ▲ 271 भगवत्प्रेमकी प्राप्ति कैसे हो ? |
| ▲ 243 परम साधन—भाग-१ | ▲ 268 परमशान्तिका मार्ग—<br>भाग-१ (गुजराती भी) | ▲ 281 शिक्षाप्रद पत्र | ▲ 306 धर्म क्या है ? भगवान् क्या हैं ?<br>[गुजराती, ओड़िआ व अंग्रेजी भी] |
| ▲ 244 ” ” —भाग-२ | ▲ 269 परमशान्तिका मार्ग-(भाग-२) | ▲ 282 पारमार्थिक पत्र | ▲ 307 भगवान्की दया (भगवत्कृपा<br>एवं कुछ अमृत-कण )<br>[ओड़िआ, कन्नड, गुजराती भी] |
| ▲ 245 आत्मोद्धारके साधन (भाग-१) | ▲1792 शान्तिका उपाय | ▲ 284 अध्यात्मविषयक पत्र | ▲ 316 ईश्वर-साक्षात्कारके लिये<br>और सत्यकी शरणसे मुक्ति |
| ▲ 335 अनन्यभक्तिसे भगवत्प्राप्ति—<br>(आत्मोद्धारके साधन भाग-२)<br>[गुजराती भी] | ▲ 543 परमार्थ-सूत्र-संग्रह [ओड़िआ भी] | ▲ 283 शिक्षाप्रद ग्यारह कहानियाँ<br>[अंग्रेजी, कन्नड, गुजराती,<br>मराठी, तेलुगु, ओड़िआ भी] | ▲ 314 व्यापार-सुधारकी आवश्यकता<br>और हमारा कर्तव्य<br>[गुजराती, मराठी भी] |
| ▲ 579 अमूल्य समयका सदुपयोग<br>[तेलुगु, गुजराती, मराठी,<br>कन्नड़, ओड़िआ भी] | ▲1530 आनन्द कैसे मिले ? | ▲1120 सिद्धान्त एवं रहस्यकी बातें | ■2058 श्रीसेठजीके अन्तिम अमृतोपदेश<br>स्टीकर (१०० पर्चोंका पैकेटमें) |
| ▲ 246 मनुष्यका परम कर्तव्य (भाग-१) | ▲1837 अनन्यभक्ति कैसे प्राप्त हो ? | ▲ 680 उपदेशप्रद कहानियाँ<br>[अंग्रेजी, गुजराती, कन्नड, तेलुगु भी] | ▲ 315 चेतावनी और सामयिक<br>चेतावनी [गुजराती भी] |
| ▲ 247 ” ” ” (भाग-२) | ▲ 769 साधन नवनीत [गुजराती,<br>ओड़िआ, कन्नड भी] | ▲ 891 प्रेममें विलक्षण एकता<br>[मराठी, गुजराती भी] | ▲ 318 ईश्वर दयालु और न्यायकारी है<br>और अवतारका सिद्धान्त<br>[गुजराती, तेलुगु भी] |
| ▲ 611 इसी जन्ममें परमात्मप्राप्ति | ▲ 599 हमारा आश्चर्य | ▲ 958 मेरा अनुभव<br>[गुजराती, मराठी भी] | ▲ 270 भगवान्का हेतुरहित सौहार्द<br>एवं महात्मा किसे कहते हैं ?<br>[तेलुगु भी] |
| ▲ 588 अपात्रको भी भगवत्प्राप्ति | ▲ 681 रहस्यमय प्रवचन | ▲1283 सत्संगकी मार्मिक बातें<br>[गुजराती भी] | ▲ 302 ध्यान और मानसिक पूजा<br>[गुजराती भी] |
| ▲1015 भगवत्प्राप्तिमें भावकी प्रधानता | ▲1021 आध्यात्मिक प्रवचन<br>[गुजराती भी] | ▲1150 साधनकी आवश्यकता<br>[मराठी भी] | ▲ 326 प्रेमका सच्चा स्वरूप और<br>शोकनाशके उपाय [ओड़िआ,<br>गुजराती, अंग्रेजी भी] |
| ▲1923 भगवत्प्राप्तिके सुगम साधन | ▲1324 अमृत वचन [बँगला भी] | ▲1908 प्रतिकूलतामें प्रसन्नता | |
| ▲1974 व्यवहार सुधार और परमार्थ | ▲1409 भगवत्प्रेम-प्राप्तिके उपाय | ▲ 320 वास्तविक त्याग | |
| ▲1296 कर्णवासका सत्संग | ▲1433 साधना पथ | ▲1791 त्यागकी महिमा | |
| ▲ 248 कल्याणप्राप्तिके उपाय-<br>(त०चि०म०भाग१) [बँगला भी] | ▲1483 भगवत्पथ-दर्शन | ▲ 285 आदर्श भ्रातृप्रेम [ओड़िआ भी] | |
| ▲ 249 शीघ्र कल्याणके सोपान-<br>भाग-२, खण्ड-१ [गुजराती भी] | ▲1493 नेत्रोंमें भगवान्को बसा लें | ▲ 286 बालशिक्षा [तेलुगु, कन्नड,<br>ओड़िआ, गुजराती भी] | |
| ▲ 250 ईश्वर और संसार—<br>भाग-२, (खण्ड-२) | ▲1435 आत्मकल्याणके विविध उपाय | ▲ 287 बालकोंके कर्तव्य<br>[ओड़िआ भी] | |
| ▲1900 निष्कामभावसे भगवत्प्राप्ति | ▲1529 सम्पूर्ण दुःखोंका अभाव कैसे हो ? | ▲ 272 स्त्रियोंके लिये कर्तव्य-शिक्षा<br>[कन्नड, गुजराती भी] | |
| ▲ 519 अमूल्य शिक्षा-<br>भाग-३, (खण्ड-१) | ▲1561 दुःखोंका नाश कैसे हो ? | ▲ 290 आदर्श नारी सुशीला<br>[बँगला, तेलुगु, तमिल, अंग्रेजी,<br>ओड़िआ, गुजराती, मराठी भी] | |
| ▲ 253 धर्मसे लाभ अधर्मसे हानि—<br>भाग-३, (खण्ड-२) | ▲1587 जीवन-सुधारकी बातें | ▲ 291 आदर्श देवियाँ<br>[ओड़िआ, अंग्रेजी भी] | |
| ▲ 251 अमूल्य वचन तत्त्वचिन्तामणि-<br>भाग-४, (खण्ड-१) | ▲ 300 नारीधर्म | ||
| ▲ 252 भगवद्दर्शनकी उत्कण्ठा-<br>भाग-४ (खण्ड-२) |
[ ६४६ ] --- स्तम्भ १ --- कोड
परम श्रद्धेय श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार (भाईजी)-के अनमोल प्रकाशन
■ 820 भगवच्चर्चा (ग्रन्थाकार) सभी खण्ड एक साथ ■ 050 पदरत्नाकर ■ 049 श्रीराधा-माधव-चिन्तन ▲ 058 अमृत-कण ▲ 332 ईश्वरकी सत्ता और महत्ता ▲ 333 सुख-शान्तिका मार्ग ▲ 343 मधुर ▲ 056 मानव-जीवनका लक्ष्य ▲ 331 सुखी बननेके उपाय ▲ 334 व्यवहार और परमार्थ ▲ 514 दुःखमें भगवत्कृपा ▲ 386 सत्संग-सुधा ▲ 342 संतवाणी-ढाई हजार अनमोल बोल [तमिल भी, तीन भागमें] ▲ 347 तुलसीदल ▲ 339 सत्संगके बिखरे मोती ▲ 349 भगवत्प्राप्ति एवं हिन्दू-संस्कृति ▲ 350 साधकोंका सहारा ▲ 351 भगवच्चर्चा- (भाग-५) ▲ 352 पूर्ण समर्पण ▲ 353 लोक-परलोक-सुधार-I ▲ 354 आनन्दका स्वरूप ▲ 355 महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर ▲ 356 शान्ति कैसे मिले ? ▲ 357 दुःख क्यों होते हैं ? ▲ 348 नैवेद्य ▲ 337 दाम्पत्य-जीवनका आदर्श [गुजराती, तेलुगु भी] ▲ 336 नारीशिक्षा [गुजराती, कन्नड़ भी] ▲ 340 श्रीरामचिन्तन ▲ 338 श्रीभगवन्नाम-चिन्तन ▲ 345 भवरोगकी रामबाण दवा [ओड़िआ भी] ▲ 341 प्रेमदर्शन [तेलुगु, मराठी भी] ▲ 366 मानव-धर्म ▲ 358 कल्याण-कुंज (क० कुं० भाग-१) ▲ 359 भगवान्की पूजाके पुष्प- (क० कुं० भाग-२) ▲ 360 भगवान् सदा तुम्हारे साथ हैं (क० कुं० भाग-३) ▲ 361 मानव-कल्याणके साधन (क० कुं० भाग-४) ▲ 362 दिव्य सुखकी सरिता- (क० कुं० भाग-५) [गुजराती भी] --- स्तम्भ २ --- कोड
▲ 363 सफलताके शिखरकी सीढ़ियाँ- (क० कुं० भाग-६) ▲ 364 परमार्थकी मन्दाकिनी- (क० कुं० भाग-७) ▲ 346 सुखी बनो ▲ 526 महाभाव-कल्लोलिनी ▲ 367 दैनिक कल्याण-सूत्र ▲ 369 गोपीप्रेम [अंग्रेजी भी] ▲ 370 श्रीभगवन्नाम [ओड़िआ भी] ▲ 368 प्रार्थना-प्रार्थना-पीयूष [ओड़िआ भी] ▲ 373 कल्याणकारी आचरण ▲ 374 साधन-पथ-सचित्र [गुजराती, तमिल भी] ▲ 375 वर्तमान शिक्षा ▲ 376 स्त्री-धर्म-प्रश्नोत्तरी ▲ 377 मनको वश करनेके कुछ उपाय [गुजराती भी] ▲ 378 आनन्दकी लहरें [बंगला, ओड़िआ, गुजराती, अंग्रेजी भी] ▲ 379 गोवध भारतका कलंक एवं गायका माहात्म्य ▲ 381 दीन-दुःखियोंके प्रति कर्तव्य ▲ 382 सिनेमा मनोरंजन या विनाशका साधन ▲ 344 उपनिषदोंके चौदह रत्न [नेपाली भी] ▲ 371 राधा-माधव-रससुधा- (षोडशगीत) सटीक ▲ 384 विवाहमें दहेज ▲ 809 दिव्य संदेश एवं मनुष्य सर्वप्रिय और जीवन कैसे बनें ?
परम श्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजीके कल्याणकारी साहित्य
■ 465 साधन-सुधा-सिन्धु [ओड़िआ, गुजराती भी] ■2197 साधन-सुधा-निधि ▲1675 सागरके मोती ▲1598 सत्संगके फूल ▲1733 संत-समागम ▲1633 एक संतकी वसीयत [बंगला भी] ▲ 400 कल्याण-पथ ▲ 401 मानसमें नाम-वन्दना ▲ 605 जित देखूँ तित-तू [गुजराती, मराठी भी] ▲ 406 भगवत्प्राप्ति सहज है [अंग्रेजी भी] ▲ 535 सुन्दर समाजका निर्माण ▲1485 ज्ञानके दीप जले --- स्तम्भ ३ --- कोड
▲1447 मानवमात्रके कल्याणके लिये [मराठी, ओड़िआ, बँगला, गुजराती, अंग्रेजी, नेपाली भी] ▲1175 प्रश्नोत्तर मणिमाला [बँगला, असमिया, नेपाली, ओड़िआ, गुजराती भी] ▲1247 मेरे तो गिरधर गोपाल ▲ 403 जीवनका कर्तव्य [गुजराती भी] ▲ 436 कल्याणकारी प्रवचन [गुजराती, अंग्रेजी, बँगला, ओड़िआ भी] ▲ 821 किसान और गाय [तेलुगु भी] ▲1093 आदर्श कहानियाँ [ओड़िआ, बँगला भी] ▲ 407 भगवत्प्राप्तिकी सुगमता [कन्नड, मराठी भी] ▲ 408 भगवान्से अपनापन [गुजराती, ओड़िआ भी] ▲ 861 सत्संग-मुक्ताहार [,,] ▲ 405 नित्ययोगकी प्राप्ति [ओड़िआ भी] ▲ 409 वास्तविक सुख [बंगला, तमिल, ओड़िआ भी] ▲1308 प्रेरक कहानियाँ [बंगला, ओड़िआ भी] ▲1408 सब साधनोंका सार [बँगला भी] ▲ 411 साधन और साध्य [मराठी, बँगला, गुजराती भी] ▲ 412 तात्त्विक प्रवचन [मराठी, ओड़िआ, बँगला, गुजराती भी] ▲ 410 जीवनोपयोगी प्रवचन [अंग्रेजी भी] ▲ 414 तत्त्वज्ञान कैसे हो ? एवं मुक्तिमें सबका समान अधिकार [बँगला, गुजराती भी] ▲ 822 अमृत-बिन्दु [बँगला, तमिल, ओड़िआ, अंग्रेजी, तेलुगु, असमिया, गुजराती, मराठी, कन्नड भी] ▲ 417 भगवन्नाम [मराठी, अंग्रेजी भी] ▲ 416 जीवनका सत्य [गुजराती, अंग्रेजी भी] ▲ 418 साधकोंके प्रति [बँगला, मराठी भी] ▲ 419 सत्संगकी विलक्षणता [गुजराती भी] ▲ 545 जीवनोपयोगी कल्याण-मार्ग [गुजराती भी] ▲ 420 मातृशक्तिका घोर अपमान [तमिल, बँगला, मराठी, गुजराती, ओड़िआ भी] --- स्तम्भ ४ --- कोड
▲ 421 जिन खोजा तिन पाइयाँ [बँगला भी] ▲ 422 कर्मरहस्य [बँगला, तमिल, कन्नड, ओड़िआ भी] ▲ 424 वासुदेवः सर्वम् [मराठी, अंग्रेजी भी] ▲ 425 अच्छे बनो [अंग्रेजी, नेपाली भी] ▲ 426 सत्संगका प्रसाद [गुजराती भी] ▲1019 सत्यकी खोज [गुजराती, अंग्रेजी भी] ▲1479 साधनके दो प्रधान सूत्र [ओड़िआ, बँगला भी] ▲1035 सत्यकी स्वीकृतिसे कल्याण ▲1360 तू-ही-तू ▲1434 एक नयी बात ▲1440 परम पितासे प्रार्थना ▲1441 संसारका असर कैसे छूटे ? ▲1176 शिखा (चोटी) धारणकी आवश्यकता और..[बँगला भी] ▲ 431 स्वाधीन कैसे बनें ? [अंग्रेजी भी] ▲ 702 यह विकास है या विनाश जरा सोचिये ? ▲ 589 भगवान् और उनकी भक्ति [गुजराती, ओड़िआ भी] ▲ 617 देशकी वर्तमान दशा तथा उसका परिणाम [तमिल, बँगला, तेलुगु, ओड़िआ, कन्नड, गुजराती, मराठी भी] ▲ 770 अमरताकी ओर [गुजराती भी] ▲ 445 हम ईश्वरको क्यों मानें ? [बँगला भी] ▲ 745 भगवत्तत्त्व [गुजराती भी] ▲ 432 एकै साधे सब सधै [गुजराती, तमिल, तेलुगु भी] ▲ 434 शरणागति [तमिल, ओड़िआ, असमिया, नेपाली, तेलुगु, कन्नड़ भी] ▲ 427 गृहस्थमें कैसे रहें ? [बँगला, मराठी, कन्नड, ओड़िआ, अंग्रेजी, तमिल, तेलुगु, गुजराती, असमिया, पंजाबी भी] ▲ 433 सहज साधना [गुजराती, बँगला, ओड़िआ, मराठी, अंग्रेजी भी] ▲ 435 आवश्यक शिक्षा (सन्तानका कर्तव्य एवं आहारशुद्धि) [गुजराती, ओड़िआ, अंग्रेजी, मराठी भी] ■1037 हे मेरे नाथ! मैं आपको भूलूँ नहीं स्टीकर (१०० पन्नोंका पैकेटमें) ■1012 पञ्चामृत स्टीकर ■1611 मैं भगवान्का अंश हूँ , ,