श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 643, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंअङ्क ] * नम्र निवेदन एवं क्षमा-प्रार्थना * ६४१ नम्र निवेदन एवं क्षमा-प्रार्थना
एक या अधिक महापुराण उपलब्ध ही हैं। गणेशजीपर भी २१००० श्लोकीय गणेश-भागवतके विषयमें सुना जाता है, परंतु दुर्भाग्यवश अबतक उसकी कोई प्रति मिल नहीं सकी है। अन्यान्य महापुराणोंके अन्तर्गत भी गणपति- केन्द्रित खण्ड कहे जाते हैं, यथा- ब्रह्मवैवर्तपुराणका गणपतिखण्ड, वामनपुराणकी सहस्रश्लोकी गाणेश्वरी- संहिता इत्यादि। इनमेंसे केवल गणपतिखण्ड ही प्राप्त है। इस परिप्रेक्ष्यमें गाणपत्य-सम्प्रदाय एवं अन्य गणेशभक्तोंमें गणेशपुराणका महत्त्व सर्वोपरि है। सभी एक मतसे गणेशोपपुराणको महापुराणके समान महत्त्व एवं आदर देते हैं। इसके प्रमाण भी धर्मशास्त्रमें यत्र-तत्र ससम्मान उद्धृत किये जाते रहे हैं। गणेशजीपर मुद्गलपुराण नामक एक अन्य उपपुराण भी प्राप्त है, परंतु गणेशपुराणकी प्रसिद्धि अपेक्षाकृत अधिक है।
गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम् । उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम्॥
गणेशपुराणमें ११००० से अधिक श्लोक हैं, जो दो खण्डोंमें विभाजित हैं—प्रथम उपासनाखण्ड तथा दूसरा क्रीड़ाखण्ड। उल्लेखनीय है कि कुछ महापुराण भी परिमाणमें प्रायः गणेशपुराणके बराबर ही हैं। सुप्रसिद्ध गणेशगीता भी इसी 'गणेशपुराण' के क्रीड़ाखण्डके अन्तर्गत समाहित है।
'जो हाथीके समान मुखवाले हैं, भूतगणादिसे सदा सेवित रहते हैं, कैथ तथा जामुन फल जिनके लिये प्रिय भोज्य हैं, पार्वतीके पुत्र हैं तथा जो प्राणियोंके शोकका विनाश करनेवाले हैं, उन विघ्नेश्वरके चरणकमलोंमें नमस्कार करता हूँ।'
आर्ष वाङ्मयमें वेदका सर्वोपरि स्थान है, परंतु वेदोंमें उन्हींका अधिकार है, जिनका उपनयन हुआ हो। इस दृष्टिसे स्त्री, अनुपनीत व्यक्ति तथा अन्य वर्णोंके कल्याणहेतु पुराण-साहित्यका आश्रयण सर्वथा निरापद एवं कल्याणकारी है। वस्तुतः पुराणोंमें सर्वसामान्य एवं विद्वान्—सभीके लिये वेदोक्त ज्ञानका ही उपबृंहण सरल-सुबोध भाषा- शैलीमें किया गया है। स्मार्त-परम्परामें पंचदेवोपासनाके अन्तर्गत—गणेश, शिव, शक्ति, विष्णु एवं सूर्यकी गणना होती है। भगवान्के अन्यान्य स्वरूप एवं अवतार आदि इन्हींके अन्तर्गत आ जाते हैं। इनमेंसे प्रत्येकपर केन्द्रित
'गणेशपुराण' के आदिवक्ता पितामह ब्रह्माजी हैं, जिसे उन्होंने सर्वप्रथम महर्षि व्यासको सुनाया। भगवान् व्याससे इसे महर्षि भृगुने प्राप्त किया, तदनन्तर भृगुमुनिने कृपापूर्वक इसे सौराष्ट्रदेशके सोमकान्त नामक एक धर्मपरायण राजाको प्रदान किया, जिसके प्रभावसे वे धर्मात्मा नरेश दुर्भाग्यवश प्राप्त हुए गलितकुष्ठरूपी महान् क्लेशसे सर्वथा मुक्त होकर निर्मल एवं आनन्दित हो गये थे। वस्तुतः गणेशपुराणकी कथा अत्यन्त दिव्य एवं पुरुषार्थचतुष्टयकी सिद्धि प्रदान करनेमें सर्वथा समर्थ है। इन्हीं सब दृष्टियोंसे इस पुराणके विशेषाङ्कके रूपमें प्रकाशनकी योजना बनी थी। भगवान् गणेशकी कृपासे यह आप महानुभावोंके समक्ष प्रस्तुत है। प्रारम्भमें यह योजना थी कि इस पुराणको मूल