श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 644, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें६४२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
श्लोक तथा अनुवादके साथ विशेषाङ्कमें तथा आगेके कुछ मासिक अंकोंमें प्रकाशित किया जाय; किंतु ग्रन्थका कलेवर बढ़ जानेके भयसे तथा कभी-कभी मासिक अंकोंकी प्रतियाँ विशेषांकके साथ न रह पानेकी सम्भावनाके कारण यह विचार बदल देना पड़ा। गम्भीर विचार करनेपर यह निर्णय लिया गया कि गणेशपुराणका भाषानुवाद श्लोकाङ्क- सहित एक ही अङ्कमें—सन् २०२१ ई०के विशेषाङ्कके रूपमें निकाला जाय तथा भविष्यमें मूल श्लोकोंके साथ हिन्दी-अनुवाद पुस्तकरूपमें प्रकाशित कर दिया जाय, ताकि श्रीमद्भागवत, श्रीमद्देवीभागवत, श्रीविष्णुपुराण, श्रीकूर्म- पुराण, श्रीमत्स्यपुराण, श्रीवामनपुराण आदिके समान यह श्रीगणेशपुराण भी मूल तथा हिन्दी-अनुवादके साथ उपलब्ध हो जाय। यह निर्णय प्रायः अन्तिम समयमें हुआ, जिस कारण विशेषाङ्कके प्रकाशनमें कुछ विलम्ब भी हो गया। अकारणकरुणावरुणालय भगवान् गणेशजीकी अनुकम्पासे इस वर्ष विशेषाङ्कका सब कार्य सानन्द सम्पन्न हुआ। इस पुराणमें कुछ ऐसे भी स्थल हैं, जिनके भावोंको पूर्णरूपसे समझनेमें कठिनाईका अनुभव होता है, पर विद्वद्गणोंके सहयोगसे मूल श्लोकोंके भावोंको स्पष्ट करनेका विशेष ध्यान रखा गया है। काशीनिवासी पुराणोंके विद्वान् एवं गणेशपुराणके पाठभेदोंपर अपना मौलिक एवं वैदुष्यपूर्ण शोध-प्रबन्ध प्रस्तुत करनेवाले डॉ० श्रीश्याम गंगाधरजी बापटने भी इसके कुछ अंशोंका अनुवाद करनेकी महती कृपा की, साथ ही उनकी अनुमतिसे उनके उक्त शोध-प्रबन्धकी सहायता लेकर हमें पाठ निर्धारण करनेमें भी बड़ी सुविधा रही, जिसके लिये हम हृदयसे उनके कृतज्ञ हैं। इस पुराणके मूल श्लोकोंके अनुवादमें तथा इनके संशोधन एवं परिवर्द्धनमें सनातनधर्मकी शास्त्रीय परम्पराओंसे समन्वित अन्यान्य विद्वानोंने भी पूर्ण परिश्रमपूर्वक अपना योगदान किया। मैं इन महानुभावोंके प्रति आभार व्यक्त करते हुए इनके चरणोंमें प्रणति निवेदन करता हूँ। इस विशेषाङ्कके अनुवाद तथा इसकी आवृत्ति, प्रूफ-संशोधन तथा सम्पादनके कार्योंमें सम्पादकीय विभागके मेरे सहयोगी विद्वानोंने तथा अन्य सभी लोगोंने मनोयोगपूर्वक सहयोग प्रदान किया है, फिर भी अनुवाद, संशोधन तथा छपाई आदिमें कोई भूल हो तो इसके लिये हमारा अपना अज्ञान तथा प्रमाद ही कारण है, अतः इसके लिये हम अपने पाठकोंके प्रति क्षमाप्रार्थी हैं। इस बार 'श्रीगणेशपुराण' के सम्पादन-कार्यके क्रममें परम करुणानिधान, सर्वविघ्नहर्ता, विघ्नाधिपति भगवान् श्रीगणेशजी एवं उनकी ललित कथाओंका चिन्तन, मनन तथा स्वाध्यायका सौभाग्य निरन्तर प्राप्त होता रहा, यह हमारे लिये विशेष महत्त्वकी बात है। हमें आशा है कि इस विशेषाङ्कके पठन-पाठनसे हमारे सहृदय पाठकोंको भी यह सौभाग्य-लाभ अवश्य प्राप्त होगा। पाठकगण इस पुण्यमय पुराणको पढ़कर लाभ उठायें तथा लोक-परलोकमें सुख-शान्ति और मानवजीवनके परम एवं चरम लक्ष्य भगवान् गणेशजीकी करुणामयी कृपा प्राप्त करें—यही प्रार्थना है। अन्तमें अपनी त्रुटियोंके लिये हम सबसे क्षमा माँगते हुए अपने इस लघु प्रयासको विघ्नहर्ता भगवान् गणेशजीके चरणकमलोंमें अर्पित करते हैं, साथ ही भगवान् विनायकके श्रीचरणोंमें यह प्रार्थना निवेदित करते हैं— मुदा करात्तमोदकं सदा विमुक्तिसाधकं कलाधरावतंसकं विलासिलोकरञ्जकम्। अनायकैकनायकं विनाशितेभदैत्यकं नताशुभाशुनाशकं नमामि तं विनायकम्॥ 'जिन्होंने बड़े आनन्दसे अपने हाथमें मोदक ले रखे हैं; जो सदा ही मुमुक्षुजनोंकी मोक्षाभिलाषाको सिद्ध करनेवाले हैं; चन्द्रमा जिनके भालदेशके भूषण हैं; जो भक्तिभावमें निमग्न लोगोंके मनको आनन्दित करते हैं; जिनका कोई नायक या स्वामी नहीं है; जो एकमात्र स्वयं ही सबके नायक हैं; जिन्होंने गजासुरका संहार किया है तथा जो नतमस्तक पुरुषोंके अशुभका तत्काल नाश करनेवाले हैं, उन भगवान् विनायकको मैं प्रणाम करता हूँ।' —राधेश्याम खेमका (सम्पादक)