भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 614, कुल 656 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 614

६१२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- अपना धर्म यदि गुणरहित हो तो भी अच्छा है और दूसरेका धर्म गुणयुक्त होनेसे भी भला नहीं, अपने धर्ममें मरना भी परलोकमें कल्याणकारी है, परंतु दूसरेका श्रेष्ठ धर्म भी भय प्रदान करता है ॥ ३५ ॥ वरेण्यने कहा—हे गणेशजी! प्राणी जो पाप करता है, वह किसके द्वारा प्रेरित होता है ? इच्छा नहीं होनेपर भी बलात् किससे प्रेरित होता हुआ वह पापाचरण करता है ? ॥ ३६ ॥ श्रीगणेशजी बोले—रजोगुण और तमोगुणसे उत्पन्न हुए ये काम और क्रोध ही दो महापापी हैं। ये लोगोंको अपने वशमें करते हैं, इन्हीं दोनोंको तुम महान् शत्रु जानो। जिस प्रकार माया जगत्‌को ढकती है, जैसे भाप जलको और जैसे वर्षाकालका मेघ सूर्यको ढक लेता है, इसी प्रकार काम और क्रोधने सबको ढक लिया है ॥ ३७-३८ ॥ महाबली, सदैव द्वेष करनेवाले और कभी पूरा न हो सकनेवाले इस इच्छारूप कामने ही बुद्धिमानोंके ज्ञानको भी ढक रखा है ॥ ३९ ॥ यह काम बुद्धि, मन तथा इन्द्रियोंके आश्रित होकर रहता है, उन्हींसे ज्ञानको आच्छादित करके यह ज्ञानियोंको भी मोहित करता है। अतः पहले मनके सहित इन्द्रियोंको वशमें करके ज्ञान और विज्ञानका नाश करनेवाले इस मनोभव पापी कामको जीतना चाहिये ॥ ४०-४१ ॥ स्थूल देहसे इन्द्रियाँ परे हैं, इन्द्रियोंसे परे मन है, मनसे परे बुद्धि है और बुद्धिसे परे आत्मा है ॥ ४२ ॥ इस प्रकार बुद्धिसे आत्माको जानकर, बुद्धिसे ही मनको स्थिर करके कामरूपी शत्रुको मारकर परम पदको प्राप्त करना चाहिये ॥ ४३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'कर्मयोग' नामक एक सौ उनतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३९ ॥ एक सौ चालीसवाँ अध्याय ज्ञानयोग श्रीगणेशजी बोले—पूर्वकालमें, सृष्टिरचनाके अवसरपर [ब्रह्म-विष्णु-रुद्रात्मक] तीन स्वरूपोंवाले मुझ गणपतिने [ब्रह्मरूपसे] त्रिगुणात्मक जगत्प्रपंचका निर्माण करनेके अनन्तर [जगत्पालक] विष्णुको इस उत्तम योगका उपदेश किया था ॥ १ ॥ विष्णुने यही योग सूर्यसे कहा। सूर्यने अपने पुत्र वैवस्वत मनुसे कहा। इसके उपरान्त परम्परासे प्राप्त हुए इस योगको महर्षिगण जान पाये ॥ २ ॥ हे राजन्! कलियुगमें यह बहुत काल बीत जानेके बाद विलुप्त हो गया। [उस समय उन कलियुगीन मनुष्योंके द्वारा] इसे श्रद्धा-विश्वासके अयोग्य तथा निन्दनीय समझा गया। अब फिर तुमने मेरे मुखसे इस पुरातन योगको सुना है, यह गुप्त-से-गुप्त, अत्यन्त कल्याणकारक और सम्पूर्ण वेदोंका सार है ॥ ३-४ ॥ राजा वरेण्य बोले—हे गजानन! आप तो इस समय गर्भसे उत्पन्न हुए हैं, फिर आपने विष्णुसे यह उत्तम योग किस प्रकारसे [और कब] वर्णन किया था ? ॥ ५ ॥ गणेशजी बोले—[हे राजन्!] मेरे और तुम्हारे अनेक जन्म बीत चुके हैं, मैं उन सबको जानता हूँ, परंतु तुम नहीं जानते। हे महाबाहो! मुझसे ही विष्णु आदि देवता उत्पन्न हुए हैं और युग-युगमें प्रलयके समय मुझमें ही लय हो जाते हैं ॥ ६-७ ॥ मैं ही विष्णु तथा ब्रह्मा हूँ, मैं ही महारुद्र हूँ, मैं ही स्थावर-जंगमरूप सम्पूर्ण जगत् हूँ ॥ ८ ॥ मैं अजन्मा, अविनाशी तथा सभी जीवोंका आत्मा अनादि ईश्वर हूँ और त्रिगुणात्मक मायामें स्थित होकर मैं ही अनेक अवतार धारण करता हूँ ॥ ९ ॥ जिस समय अधर्मकी वृद्धि और धर्मकी हानि होती है, उस समय साधुओंकी रक्षा और दुष्टोंको मारनेके लिये मैं अवतार लेता हूँ। मैं अधर्मके समूहको नष्टकर धर्मका संस्थापन करता हूँ और प्रसन्नतापूर्वक अनेक प्रकारकी लीला करता हुआ दुष्टों तथा [धर्महन्ता]