श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 615, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०१४०] \hspace{60pt} * ज्ञानयोग * \hspace{60pt} ६१३
[बायाँ स्तम्भ]
दैत्योंका वध करता हूँ॥ १०-११ ॥ अनेक रूप धारणकर मैं वर्ण, आश्रम, मुनि और साधुओंका पालन करता हूँ, इस प्रकारसे जो युग-युगमें मेरी दिव्य विभूतिको, मेरे उस समयके कर्म, वीर्य और रूपको जानता है तथा अहंकार और ममताबुद्धिका त्याग कर देता है, वह मुक्त हो जाता है ॥ १२-१३ ॥ इच्छारहित, निर्भय, क्रोधहीन, मुझमें ही आश्रित, मेरी ही उपासना करनेवाले अनेक जन विज्ञान और तपस्यासे शुद्ध होकर मुझको प्राप्त हो गये हैं ॥ १४ ॥ श्रेष्ठजन जिस-जिस भावसे मेरा सेवन करते हैं, मैं अविनाश्र्वर परमात्मा उनको वैसा फल निश्चय ही देता हूँ। हे राजन्! जिस प्रकारसे दूसरे लोग भी मेरे अनुयायी हो जायँ, इसी प्रकारका व्यवहार वे (मेरे भक्तजन) अपने तथा दूसरे मनुष्योंमें करते हैं ॥ १५-१६ ॥ इस संसारमें जो लोग कर्मोंके फल प्राप्त होनेकी इच्छासे देवोपासना करते हैं, उन-उन कर्मोंके अनुसार उनको शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त होती है। हे पापरहित! मृत्युलोकमें मैंने चारों वर्णोंको सत्त्व, रज, तम—इन गुणोंसे और कर्मोंके अंशसे उत्पन्न किया है ॥ १७-१८ ॥ यद्यपि मैं इनका कर्त्ता हूँ, परंतु पण्डितजन मुझे अकर्ता जानते हैं। वे मुझे अनादि, ईश्वर, नित्य और कर्मोंके गुणोंसे अलिप्त मानते हैं। जो मुझे इच्छारहित जानता है, उसको कर्मबन्धन नहीं होता। ऐसा जानकर पूर्वमें पुरातन महर्षिजन कर्म करते थे ॥ १९-२० ॥ वासना, जो कि संसारका मूल और दृढ़ कारण है, और वही अज्ञानका बन्धन है, इसे जानकर प्राणी सभी बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है ॥ २१ ॥ क्या कर्म और क्या अकर्म है, यह मैं अब तुमसे कहता हूँ। इसके जाननेमें बुद्धिमान् ऋषिगण भी मोहको प्राप्त होकर मौन रह गये हैं ॥ २२ ॥ हे प्रिय! कर्म, अकर्म और विकर्मका तत्त्व मुक्तिकी इच्छा करनेवालोंको जानना आवश्यक है, वे तीनों ही कर्म हैं। इनकी गति जानना महाकठिन है ॥ २३ ॥ क्रियामें अक्रियाका ज्ञान और अक्रियामें क्रियाकी बुद्धि जिसकी होती है, वही इस लोकमें सभी कर्मोंका
[दायाँ स्तम्भ]
करनेवाला होकर भी मुक्त हो जाता है ॥ २४ ॥ तत्त्वज्ञानरूप अग्निमें जो अपनी क्रियाशक्तिको दग्ध कर चुका है तथा कर्मांकुरभूत संकल्पका त्याग करके कर्मानुष्ठानमें प्रवृत्त होता है, ऐसे व्यक्तिको ही पण्डितजन 'बुध' कहते हैं ॥ २५ ॥ जो फलकी इच्छाको छोड़कर साधनहीन होकर भी सदा तृप्त रहते हैं। यदि वे कर्म करनेमें लगे हों तो भी वे कुछ नहीं करते हैं ॥ २६ ॥ जो इच्छारहित, आत्मजित् एवं सम्पूर्ण परिग्रहका परित्याग किये हैं, ऐसे प्राणी यदि घरमें रहकर कर्म भी करें तो उन्हें कुछ पातक नहीं लगता। जो द्वन्द्व और ईर्ष्यासे हीन होकर सिद्धि-असिद्धिमें समान दृष्टि रखते हुए जो कुछ प्राप्ति हो, उसीमें सन्तुष्ट रहते हैं, ऐसे प्राणी कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होते ॥ २७-२८ ॥ सम्पूर्ण विषयोंसे मुक्त और ज्ञान-विज्ञानयुक्त प्राणीके सारे कर्म यज्ञ ही हैं। ऐसे व्यक्तिकी सारी क्रियाएँ विलीन हो जाती हैं। अग्नि, होमका द्रव्य, हवन करनेवाला और जो आहुति मुझे अर्पण की जाती है, वह सब मैं ही हूँ। ऐसा समझकर वह ब्रह्मको ही प्राप्त होता है; क्योंकि वह ब्रह्ममें ही स्थित है ॥ २९-३० ॥ कोई योगी देवयजनको यज्ञ कहते हैं, दूसरे ब्रह्मरूप अग्निमें यज्ञ करनेको यज्ञ मानते हैं ॥ ३१ ॥ हे राजन्! कोई योगी संयमरूप अग्निमें श्रोत्रादि इन्द्रियोंका हवन करते हैं, कोई इन्द्रियरूपी अग्निमें शब्दादि विषयोंकी आहुति देते हैं ॥ ३२ ॥ कोई दूसरे ज्ञानमें जलती हुई वैराग्यरूपी अग्निमें सम्पूर्ण इन्द्रिय, कर्म और प्राणोंका हवन करते हैं ॥ ३३ ॥ कोई द्रव्ययज्ञका अनुष्ठानकर, कोई तपस्यासे, कोई स्वाध्यायसे, कोई महात्मा तीव्र व्रतसे और कोई ज्ञानसे मेरा यजन करते हैं। जो पूरकसे प्राणवायुमें अपानको और रेचकसे प्राणका अपानमें हवन करते हैं और कुम्भकके अनुष्ठानसे प्राणापानकी गतिको रोक लेते हैं, वे प्राणायाममें परायण होते हैं ॥ ३४-३५ ॥ दूसरे नियताहार होकर पाँचों प्राणोंमें पाँचों प्राणोंकी आहुति देते हैं, इस प्रकारसे अनेकविध यज्ञोंमें निरत