श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 616, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें६१४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 योगी यज्ञद्वारा पापोंका नाश करते हैं। अन्य दूसरे नित्य मिलनेपर साधक सभी प्राणियोंको अपनेमें ही देखता है। ही यज्ञसे बचे अमृत पदार्थका भोजनकर नित्य ब्रह्मको इस ज्ञानयोगसे अतिपापी प्राणी भी मुक्त हो जाता है। प्राप्त होते हैं। यज्ञ न करनेवालोंको तो यह लोक भी जिस प्रकारसे प्रचण्ड जलती अग्नि सबको क्षणभरमें भस्म नहीं मिलता, परलोक कहाँ मिलेगा ? ॥ ३६-३७ ॥ कर देती है, इसी प्रकार ज्ञानाग्निमें पाप-पुण्य दोनों हे राजन् ! वेदोंमें कायिक (वाचिक, मानसिक) प्रकारके कर्म सद्यः नष्ट हो जाते हैं ॥ ४३-४५ ॥ आदि तीन प्रकारके यज्ञोंका प्रतिपादन किया गया है, उन्हें हे राजन् ! ज्ञानके समान और कोई वस्तु पवित्र पूर्णतया जानकर तुम सारे बन्धनोंसे मुक्त हो जाओगे। हे नहीं है, योगसिद्ध महात्मा उस ज्ञानको योगाभ्यासके राजन् ! सब यज्ञोंमें ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। मोक्षसाधक प्रभावसे यथासमय स्वयं ही प्राप्त करते हैं ॥ ४६ ॥ ज्ञानयज्ञमें समस्त कर्म विलीन हो जाते हैं ॥ ३८-३९ ॥ इन्द्रियोंको वशमें करनेवाला भक्तिमान्, तत्पर पुरुष हे पुरुषश्रेष्ठ ! उस ज्ञानयज्ञको सत्पुरुषोंकी सेवा, ही ज्ञानको प्राप्त कर सकता है और ज्ञान प्राप्त होनेसे प्रणति और प्रश्नसे प्राप्त करो। तत्त्वको जाननेवाले ज्ञानीजन थोड़े समयमें ही वह मुक्तिको प्राप्त हो जाता है ॥ ४७ ॥ तुम्हें उसका उपदेश करेंगे। जो मनुष्य अनेक प्रकारकी जो भक्तिहीन, श्रद्धारहित और सर्वत्र संदिग्धचित्त संगति करता है, पर किसी साधुकी एक बार भी संगति नहीं है, उसे कल्याणकी प्राप्ति नहीं होती, न ज्ञान होता है करता, वह संसारमें बन्धनको प्राप्त होता है ॥ ४०-४१ ॥ तथा उसका इहलोक और परलोक नष्ट हो जाता है। सत्संगसे सभीको गुणोंकी प्राप्ति और आपदाओंका हे राजन् ! जो आत्मज्ञानमें रत हैं, जिन्होंने ज्ञानसे सभी नाश होता है तथा लोक और परलोकमें अपना कल्याण सन्देह दूर कर लिये हैं तथा योगमें स्थित होनेसे जिनके प्राप्त होता है ॥ ४२ ॥ कर्म क्षीण हो गये हैं, वे बन्धनमें नहीं पड़ते ॥ ४८-४९ ॥ हे राजन् ! अन्य सब तो सुलभ है, परंतु सत्संग बड़ा अतएव ज्ञानरूपी खड्गसे मनके अज्ञानजन्य दुर्लभ है। जिसके जाननेसे फिर संसारके बन्धनमें नहीं संशयको बलपूर्वक काटकर मनुष्यको योगका आश्रय आना होता, उसे जानना आवश्यक है। सत्संगसे ज्ञान लेना उचित है ॥ ५० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'ज्ञानयोग' नामक एक सौ चालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४० ॥ एक सौ इकतालीसवाँ अध्याय संन्यासयोग वरेण्य बोले- हे भगवन् ! आप कर्मसंन्यास (अर्थात् है ॥ ३ ॥ निष्कामभावसे कर्म करते-करते विशुद्धचित्त होनेपर कर्मसंन्यास और कर्मयोगको मूढ़ और अज्ञानी ही कर्मत्याग करने)-को ज्ञानका कारण कहकर फिर पृथक्-पृथक् कहते हैं, परंतु पण्डितगण उन्हें एक ही कर्मयोगको ज्ञानका कारण कहते हैं, इन दोनोंमें जो मानते हैं ॥ ४ ॥ हितकारी हो, उसे मुझसे कहिये ॥ १ ॥ जो फल कर्मसंन्याससे मिलता है, वही फल श्रीगणेशजी बोले- [अधिकारियोंके भेदसे] कर्मयोगसे प्राप्त होता है, कर्मसंन्यास और कर्मयोगको कर्मयोग और कर्मसंन्यास दोनों ही मुक्तिके साधन हैं, उन जो एक जानता है, वही यथार्थ ज्ञाता है ॥ ५ ॥ दोनोंमें कर्मसंन्याससे कर्मयोगमें विशेषता है ॥ २ ॥ पण्डितजन केवल कर्मके संन्यासको ही संन्यास जो सर्वदा द्वन्द्व और दुःखको सह लेता है, किसीसे नहीं कहते, यदि योगी अनिच्छासे अर्थात् अनासक्त द्वेष नहीं करता और किसी बातकी इच्छा नहीं करता, होकर कर्म करे, तो वह ब्रह्म ही हो जाता है ॥ ६ ॥ ऐसा प्राणी अनायास ही कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता शुद्धचित्त, मनको वशमें करनेवाले, जितेन्द्रिय,