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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

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क्री०ख०-अ०१४५ ] * श्रीगणेशजीका राजा वरेण्यको अपने विराट्स्वरूपका दर्शन कराना * ६१९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अथवा कोई भी व्यक्ति हो, जो मेरी केवल पूजा ही | बहिर्मातृकान्यास तथा षडंगन्यास करे ॥ १४-१५ ॥ करता है अर्थात् अन्य साधन नहीं करता, वह भी | इसके उपरान्त मूलमन्त्रका न्यास करके ध्यान करे सिद्धिको प्राप्त होता है। मुझे छोड़कर और मुझसे | और स्थिर चित्तसे गुरुमुखसे सुने हुए मन्त्रका जप करे। [चित्र] | फिर देवताके निमित्त जपको निवेदनकर अनेक स्तोत्रोंसे | स्तवन करे। इस प्रकारसे जो मेरी उपासना करता है, वह | सनातनी मुक्तिको प्राप्त होता है ॥ १६-१७ ॥ | जो मनुष्य उपासनासे हीन है, उसे धिक्कार है और | उसका जन्म वृथा है। यज्ञ, औषध, मन्त्र, अग्नि, आज्य, | हवि और हुत—यह सब मेरा ही स्वरूप है ॥ १८ ॥ | ध्यान, ध्येय, स्तुति, स्तोत्र, नमस्कार, भक्ति, उपासना, | वेदत्रयीसे जाननेयोग्य, पवित्र, पितामहका पितामह— | सब मैं ही हूँ ॥ १९ ॥ | ओंकार, पावन, साक्षी, प्रभु, मित्र, गति, लय, | उत्पत्ति, पोषक, बीज, शरण, इसी प्रकार असत्, सत्, | मृत्यु, अमृत, आत्मा, ब्रह्म, दान, होम, तप, भक्ति, जप, | स्वाध्याय—यह सब मैं ही हूँ ॥ २०-२१ ॥ | यह जो कुछ भी करे, वह सब मुझे निवेदन कर द्वेषकर जो अन्य किसी देवताका भक्तिसे पूजन करता है। | दे। मेरा आश्रय ग्रहण करनेवाले स्त्री, दुराचारी, पापी, हे राजन्! वह भी मेरी ही पूजा करता है, किंतु | क्षत्रिय-वैश्य-शूद्रादि भी मुक्त हो जाते हैं, फिर मेरे भक्त विधिपूर्वक नहीं। जो अन्य देवताका अथवा मेरा पूजन | द्विजातिकी तो बात ही क्या है? मेरा भक्त मेरी इन करके अन्यके प्रति द्वेष करता है, वह सहस्र कल्पवर्षतक | विभूतियोंको जानकर कभी नष्ट नहीं होता ॥ २२-२३ ॥ नरकमें पड़कर सदा दुःख भोगता है ॥ ११-१३ १/२ ॥ | मेरे प्रभव (उत्पत्ति) और मेरी विभूतियोंको देवता [पूजनार्थ उद्यत साधक] सर्वप्रथम भूतशुद्धि करके | और ऋषि भी नहीं जानते। मैं अनेक विभूतियोंसे विश्वको फिर प्राणायाम करे। फिर चित्तकी वृत्तियोंका निरोध | व्याप्त करके स्थित हूँ। जो-जो इस लोकमें श्रेष्ठतम हैं, वे करके न्यास करे, पहले अन्तर्मातृकान्यास करके फिर | सब मेरी विभूति हैं—ऐसा समझो ॥ २४-२५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'उपासनायोगका वर्णन' नामक एक सौ चौवालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४४ ॥ एक सौ पैंतालीसवाँ अध्याय श्रीगणेशजीका राजा वरेण्यको अपने विराट्स्वरूपका दर्शन कराना वरेण्य बोले—हे भगवन्! नारदजीके मुखसे | इस समय आप अपना मनोहर और व्यापक रूप मुझे मैंने आपकी अनेक विभूतियोंका श्रवण किया है, | दिखाइये ॥ २ ॥ उन्होंने मुझसे कहा कि मैं उन (विभूतियोंमें कुछ)- | श्रीगणेशजी बोले—अकेले मुझमें ही तुम यह को जानता हूँ, समस्त विभूतियोंको तो वे (गजानन) | चराचर संसार देखो और अनेक प्रकारके दिव्य आश्चर्य ही जानते हैं ॥ १ ॥ | देखो, जो पूर्वकालमें किसीने नहीं देखे हैं ॥ ३ ॥ हे गजानन! आप ही उन सबको तत्त्वसे जानते हैं, | मैं अपने प्रभावसे तुमको ज्ञाननेत्र देता हूँ; क्योंकि