भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 622, कुल 656 में से

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६२० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 मुझ सर्वव्यापक, अजन्मा और अव्ययको चर्मचक्षु नहीं | तथा मैं भी डर गया हूँ, यह आपका मुख अनेक तीक्ष्ण देख सकते ॥ ४॥ | दाढ़ोंसे भयंकर है तथा आप अनेक विद्याओंके पारगामी व्यासजी बोले-तब वे राजा वरेण्य दिव्य | हैं ॥ १५-१६ ॥ दृष्टिको प्राप्तकर भगवान् गणेशजीके महान् अद्भुत | प्रलयकी अग्निके समान दीप्तिमान् आपका मुख परमरूपको देखनेमें समर्थ हुए ॥ ५ ॥ | है, आपका रूप जटिल एवं नभःस्पर्शी है। हे गणेशजी ! असंख्य शोभायमान मुख, असंख्य सूँड एवं हाथ | आपका यह रूप देखकर मैं भ्रान्त-सा हो गया हूँ ॥ १७ ॥ और सुगन्धिसे लिप्त, दिव्य भूषण, वसन और मालासे | देवता, मनुष्य, नागादि और खग तुम्हारे उदरमें शोभित, असंख्य नेत्र, करोड़ों सूर्योंकी किरणोंके समान | शयन करते हैं, वे अनेक योनियोंको भोगकर अन्तमें प्रकाशित आयुध धारण किये उन गजाननदेवके शरीरमें | आपमें ही उसी प्रकार प्रवेश करते हैं, जैसे सागरसे उत्पन्न राजाने अलग-अलग तीनों लोक देखे ॥ ६-७ ॥ | हुए मेघके जलबिन्दु फिर उसीमें लीन होते हैं ॥ १८ ॥ ईश्वरका यह परम रूप देखनेके बाद प्रणाम करके | इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर, राजा (वरेण्य) बोले- हे भगवन् ! मैं आपकी इस देहमें | ईशान, सोम, सूर्य और सम्पूर्ण जगत्- यह सब आप ही देवता-ऋषिगण और पितरोंको देख रहा हूँ। हे विभो ! | हैं, हे स्वामिन् ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ, आप मेरे मैं सात पाताल, सात समुद्र, सात द्वीप, सात पर्वत, सात | ऊपर अब कृपा करें ॥ १९-२० ॥ महर्षि और अनेक पदार्थोंके समूह देख रहा हूँ ॥ ८-९ ॥ | आप मेरेद्वारा पूर्वमें देखा हुआ अपना सौम्य रूप मैं पृथ्वी, अन्तरिक्ष, स्वर्ग, मनुष्य, सर्प, राक्षस, | मुझे दिखाइये, हे भूमन् ! अपनी इच्छासे क्रीडा करनेवाले ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इन्द्र, देवता और अनेक प्रकारके | आपकी लीलाको कौन जान सकता है ? आपकी कृपासे जन्तुओंको देख रहा हूँ ॥ १० ॥ | मैंने इस प्रकारका ऐश्वर्यशाली रूप देखा; क्योंकि आपने मैं अनादि, अनन्त, लोकादि, अनन्त भुजा और | प्रसन्न होकर मुझे ज्ञानचक्षु दिये थे ॥ २१-२२ ॥ सिरोंसे युक्त तथा जलती हुई अग्निके समान प्रकाशमान | श्रीगणेशजी बोले- हे महाबाहु ! योग न करनेवाले अप्रमेय पुरातन आपको देख रहा हूँ ॥ ११ ॥ | लोग मेरे इस रूपका कभी भी दर्शन नहीं पाते, सनकादि मैं किरीट-कुण्डल धारण किये, कठिनाईसे देखनेयोग्य, | तथा नारदादि मेरे अनुग्रहसे इस रूपका दर्शन करते हैं। आनन्ददायक तथा विशाल वक्षःस्थलयुक्त आप प्रभुका | चारों वेदोंके अर्थके तत्त्वको जाननेवाले, सम्पूर्ण शास्त्रोंमें दर्शन कर रहा हूँ। देवता, विद्याधर, यक्ष, किन्नर, मुनि, | कुशल, यज्ञ, दान और तप करनेवाले भी मेरे रूपको मनुष्य, नृत्य करती हुई अप्सराओं और गान करते हुए | [यथार्थतः] नहीं जानते ॥ २३-२४ ॥ गन्धर्वोंसे आपका स्वरूप सेवित है ॥ १२-१३ ॥ | मैं भक्तिभावसे जानने, दीखने, प्राप्त होनेके योग्य आठ वसु, बारह आदित्योंके गण, सिद्ध, साध्य- | हूँ, अब तुम भय और मोहको त्यागकर मेरे सौम्य रूपको ये सब प्रसन्नतापूर्वक महाभक्तिसे आपकी सेवा कर रहे | देखो ॥ २५ ॥ हैं और विस्मयको प्राप्त होकर आपको देख रहे हैं ॥ १४ ॥ | हे राजन् ! जो भक्त मेरे परायण एवं सर्वसंगत्यागी ये आपको ज्ञाता, अक्षर, वेद्य, धर्मके रक्षक, | होकर सब कर्म मुझमें ही समर्पित करते हैं और क्रोध पाताल, दिशा, स्वर्ग और पृथ्वीमें व्यापक और ईश्वरके | त्यागकर सभी प्राणियोंमें समान दृष्टि रखते हैं, वे मुझको रूपमें जानते हैं। आपके रूपको देखकर सम्पूर्ण लोक | ही प्राप्त होते हैं ॥ २६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'विश्वरूपदर्शन' नामक एक सौ पैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४५ ॥ Kalyana Visheshank 2021_Section_21_1_Back