श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 624, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें६२२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 दमसहित जो ज्ञान है, हे राजन्! उसीको यथार्थ ज्ञान | अधिक होनेसे कर्मकी और तमोगुण अधिक होनेसे समझो। हे राजन्! इस ज्ञानके विषयको मैं कहता हूँ, | सुखसे इतर निद्रा और आलस्यकी प्राप्ति होती है ॥ ३३ ॥ तुम श्रवण करो, जिसको जाननेसे संसारसागरसे छूटकर | इन तीनोंकी वृद्धिमें क्रमसे मुक्ति, संसार और मुक्त हो जाओगे ॥ २४-२६ ॥ | दुर्गंतिकी प्राप्ति मनुष्योंको होती है, इस कारण हे राजन्! जो अनादि, इन्द्रियरहित, सत्त्व-रज-तम आदि | सत्त्वगुणयुक्त होओ ॥ ३४ ॥ गुणोंका भोक्ता, किंतु गुणवर्जित, अव्यक्त, सत्-असत्से | हे नरेश्वर! इसलिये तुम सर्वत्र भलीभाँति विद्यमान परे तथा इन्द्रियोंके विषयोंका प्रकाशक है। जो विश्वको | मुझ परमात्माका निश्चल भक्तिपूर्वक सर्वभावसे भजन धारण करनेवाला, सर्वत्र व्यापक, एक होकर भी अनेक | करो। हे राजन्! अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, तारागण और विद्वान् रूपसे भासता है, वह बाहर-भीतरसे पूर्ण, असंग और | ब्राह्मणमें जो तेज है, उसे मेरा ही तेज जानो ॥ ३५-३६ ॥ अन्धकारसे परे है ॥ २७-२८ ॥ | मैं ही सम्पूर्ण संसारको उत्पन्नकर उसका संहार अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे वह जाना नहीं जाता, वह | करता हूँ और अपने तेजसे ओषधि और जगत्को मैं ही ज्योतियोंको भी प्रकाशित करनेवाला है, इस प्रकार | पुष्ट करता हूँ। इन्द्रियाधिष्ठातृ देवताओंके रूपमें इन्द्रियोंको ज्ञानसे जाननेयोग्य पुरातन पुरुषको ज्ञेय ब्रह्म जानो ॥ २९ ॥ | अधिष्ठित करके इन्द्रियविषयोंको और जठराग्निके रूपमें यही परब्रह्म ज्ञेय है, यही आत्मा, पर, अव्यय तथा | भुक्त-पीत अन्न-जलादिको मैं ही पुण्य-पापलेशशून्य प्रकृतिसे परे पुरुष कहलाता है। यह प्रकृतिसे उत्पन्न हुए | होकर भोगता हूँ। मैं ही विष्णु, रुद्र, ब्रह्मा, गौरी और गुणोंको भोगता है। प्रकृतिके तीन गुण ही इस पुरुषको देहमें | गणपति हूँ, इन्द्रादि देवता तथा लोकपाल मेरे ही अंशसे बाँधते हैं, जिस समय देहमें शान्ति और प्रकाशकी वृद्धि | उत्पन्न हुए हैं ॥ ३७-३९ ॥ हो, तब सत्त्वगुणकी अधिकता ज्ञात होती है ॥ ३०-३१ ॥ | जिस-जिस रूपसे प्राणी मेरी भक्तिपूर्वक उपासना लोभ, अशान्ति, स्पृहा और कर्मारम्भ—ये रजोगुणके | करते हैं, उनकी भक्तिके अनुसार मैं उन्हें वैसा ही रूप धर्म हैं। मोह, आलस्य, अज्ञान और प्रमाद—इन्हें ही | दिखाता हूँ। हे राजन्! इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञाता, ज्ञान तथा तमोगुण जानना चाहिये ॥ ३२ ॥ | ज्ञेयका विषय तुमसे मैंने वर्णन किया, जो तुमने पूछा था, सत्त्वगुण अधिक होनेसे सुख और ज्ञानकी, रजोगुण | वह सब मैंने बता दिया ॥ ४०-४१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'क्षेत्र-ज्ञातृ-ज्ञेय-विवेक' नामक एक सौ छियालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४६ ॥ एक सौ सैंतालीसवाँ अध्याय दैवी, आसुरी और राक्षसी प्रकृति श्रीगणेशजी बोले—दैवी, आसुरी, राक्षसी— | इत्यादि चिह्न दैवी प्रकृतिके समझने चाहिये। अब तीन प्रकारकी मनुष्योंकी प्रकृति होती है, उनके फल और | आसुरीके चिह्न सुनो ॥ ३ ॥ चिह्न संक्षेपसे अब तुम्हारे लिये वर्णन करता हूँ ॥ १ ॥ | हे राजन्! अतिवाद, अभिमान, दर्प, अज्ञान और दैवी प्रकृति मुक्तिको सिद्ध करती है, आगेकी दोनों | क्रोध—ये आसुरी प्रकृतिके चिह्न हैं ॥ ४ ॥ बन्धनमें डालती हैं। इनमें पहले दैवी प्रकृतिके चिह्न | [राक्षसी प्रकृतिके ये चिह्न हैं-] निष्ठुरता, मद, कहता हूँ, उन्हें तुम सुनो ॥ २ ॥ | मोह, अहंकार, गर्व, द्वेष, हिंसा, क्रूरता, क्रोध, उद्धतता, चुगली न करना, दया, अक्रोध, अचपलता, धैर्य, | विनयहीनता, दूसरोंके नाशके निमित्त अभिचारकर्म, क्रूर सरलता, तेज, अभय, अहिंसा, क्षमा, शौच, निरभिमानिता | कर्मोंमें प्रीति। श्रेष्ठ पुरुषोंके वाक्यमें अविश्वास, अपवित्रता, Kalyana Visheshank 2021_Section_21_2_Back