श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
६२२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 दमसहित जो ज्ञान है, हे राजन्! उसीको यथार्थ ज्ञान | अधिक होनेसे कर्मकी और तमोगुण अधिक होनेसे समझो। हे राजन्! इस ज्ञानके विषयको मैं कहता हूँ, | सुखसे इतर निद्रा और आलस्यकी प्राप्ति होती है ॥ ३३ ॥ तुम श्रवण करो, जिसको जाननेसे संसारसागरसे छूटकर | इन तीनोंकी वृद्धिमें क्रमसे मुक्ति, संसार और मुक्त हो जाओगे ॥ २४-२६ ॥ | दुर्गंतिकी प्राप्ति मनुष्योंको होती है, इस कारण हे राजन्! जो अनादि, इन्द्रियरहित, सत्त्व-रज-तम आदि | सत्त्वगुणयुक्त होओ ॥ ३४ ॥ गुणोंका भोक्ता, किंतु गुणवर्जित, अव्यक्त, सत्-असत्से | हे नरेश्वर! इसलिये तुम सर्वत्र भलीभाँति विद्यमान परे तथा इन्द्रियोंके विषयोंका प्रकाशक है। जो विश्वको | मुझ परमात्माका निश्चल भक्तिपूर्वक सर्वभावसे भजन धारण करनेवाला, सर्वत्र व्यापक, एक होकर भी अनेक | करो। हे राजन्! अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, तारागण और विद्वान् रूपसे भासता है, वह बाहर-भीतरसे पूर्ण, असंग और | ब्राह्मणमें जो तेज है, उसे मेरा ही तेज जानो ॥ ३५-३६ ॥ अन्धकारसे परे है ॥ २७-२८ ॥ | मैं ही सम्पूर्ण संसारको उत्पन्नकर उसका संहार अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे वह जाना नहीं जाता, वह | करता हूँ और अपने तेजसे ओषधि और जगत्को मैं ही ज्योतियोंको भी प्रकाशित करनेवाला है, इस प्रकार | पुष्ट करता हूँ। इन्द्रियाधिष्ठातृ देवताओंके रूपमें इन्द्रियोंको ज्ञानसे जाननेयोग्य पुरातन पुरुषको ज्ञेय ब्रह्म जानो ॥ २९ ॥ | अधिष्ठित करके इन्द्रियविषयोंको और जठराग्निके रूपमें यही परब्रह्म ज्ञेय है, यही आत्मा, पर, अव्यय तथा | भुक्त-पीत अन्न-जलादिको मैं ही पुण्य-पापलेशशून्य प्रकृतिसे परे पुरुष कहलाता है। यह प्रकृतिसे उत्पन्न हुए | होकर भोगता हूँ। मैं ही विष्णु, रुद्र, ब्रह्मा, गौरी और गुणोंको भोगता है। प्रकृतिके तीन गुण ही इस पुरुषको देहमें | गणपति हूँ, इन्द्रादि देवता तथा लोकपाल मेरे ही अंशसे बाँधते हैं, जिस समय देहमें शान्ति और प्रकाशकी वृद्धि | उत्पन्न हुए हैं ॥ ३७-३९ ॥ हो, तब सत्त्वगुणकी अधिकता ज्ञात होती है ॥ ३०-३१ ॥ | जिस-जिस रूपसे प्राणी मेरी भक्तिपूर्वक उपासना लोभ, अशान्ति, स्पृहा और कर्मारम्भ—ये रजोगुणके | करते हैं, उनकी भक्तिके अनुसार मैं उन्हें वैसा ही रूप धर्म हैं। मोह, आलस्य, अज्ञान और प्रमाद—इन्हें ही | दिखाता हूँ। हे राजन्! इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञाता, ज्ञान तथा तमोगुण जानना चाहिये ॥ ३२ ॥ | ज्ञेयका विषय तुमसे मैंने वर्णन किया, जो तुमने पूछा था, सत्त्वगुण अधिक होनेसे सुख और ज्ञानकी, रजोगुण | वह सब मैंने बता दिया ॥ ४०-४१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'क्षेत्र-ज्ञातृ-ज्ञेय-विवेक' नामक एक सौ छियालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४६ ॥ एक सौ सैंतालीसवाँ अध्याय दैवी, आसुरी और राक्षसी प्रकृति श्रीगणेशजी बोले—दैवी, आसुरी, राक्षसी— | इत्यादि चिह्न दैवी प्रकृतिके समझने चाहिये। अब तीन प्रकारकी मनुष्योंकी प्रकृति होती है, उनके फल और | आसुरीके चिह्न सुनो ॥ ३ ॥ चिह्न संक्षेपसे अब तुम्हारे लिये वर्णन करता हूँ ॥ १ ॥ | हे राजन्! अतिवाद, अभिमान, दर्प, अज्ञान और दैवी प्रकृति मुक्तिको सिद्ध करती है, आगेकी दोनों | क्रोध—ये आसुरी प्रकृतिके चिह्न हैं ॥ ४ ॥ बन्धनमें डालती हैं। इनमें पहले दैवी प्रकृतिके चिह्न | [राक्षसी प्रकृतिके ये चिह्न हैं-] निष्ठुरता, मद, कहता हूँ, उन्हें तुम सुनो ॥ २ ॥ | मोह, अहंकार, गर्व, द्वेष, हिंसा, क्रूरता, क्रोध, उद्धतता, चुगली न करना, दया, अक्रोध, अचपलता, धैर्य, | विनयहीनता, दूसरोंके नाशके निमित्त अभिचारकर्म, क्रूर सरलता, तेज, अभय, अहिंसा, क्षमा, शौच, निरभिमानिता | कर्मोंमें प्रीति। श्रेष्ठ पुरुषोंके वाक्यमें अविश्वास, अपवित्रता, Kalyana Visheshank 2021_Section_21_2_Back
क्री०ख०-अ०१४८ ] * तप, दान, ज्ञान आदि एवं गणेशगीताकी महिमा * ६२३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 कर्मोंका न करना, वेद, भक्त, देवता, मुनि, श्रोत्रिय, | मुझमें भक्ति होना दुर्लभ है ॥ १५ ॥ ब्राह्मण तथा स्मृति और पुराणकी निन्दा करना, पाखण्ड- | मूर्ख लोग मोहजाल तथा अपने कर्मोंसे बन्धनमें वाक्योंमें विश्वास, दुष्टों तथा मलिन पुरुषोंकी संगति | पड़ते हैं, वे मैं ही हन्ता, मैं ही कर्ता, मैं ही भोक्ता हूँ— करना ॥ ५-८ ॥ | ऐसा कहा करते हैं। मैं ही ईश्वर, मैं शासक, मैं पाखण्डसहित कर्म करना, दूसरेकी वस्तुओंको | जाननेवाला, मैं सुखी हूँ—इस प्रकारकी मति मनुष्योंको पानेकी इच्छा, अनेक कामनाओंसे युक्त होना, सदा | नरकमें ले जाती है ॥ १६-१७ ॥ झूठ बोलना, दूसरेका उत्कर्ष न सहना, दूसरेके कृत्यको | इस कारण तुम इस (तामसी प्रकृति)-को छोड़कर नष्ट करना इत्यादि बहुत सारे दूसरे भी राक्षसी प्रकृतिके | दैवी प्रकृतिका आश्रय करो और दृढ़ चित्तसे मेरी निरन्तर गुण हैं ॥ ९-१० ॥ | भक्ति करो ॥ १८ ॥ पृथ्वी और स्वर्गलोकमें ये सब गुण रहते हैं। जो | हे राजन्! वह भक्ति भी सात्त्विकी, राजसी और लोग मेरी भक्तिसे रहित हैं, वे ही राक्षसी प्रकृतिको प्राप्त | तामसी—इन भेदोंसे तीन प्रकारकी है। जिस भक्तिसे होते हैं। हे राजन्! जो इस तामसी प्रकृतिका आश्रय लेते | देवताओंका भजन किया जाता है, वह कल्याणकारिणी हैं, वे रौरव नरकको प्राप्त होते हैं और वहाँ अकथनीय | सात्त्विकी भक्ति कही गयी है। जन्म-मृत्यु देनेवाली दुःखको भोगते हैं ॥ ११-१२ ॥ | भक्ति राजसी कही गयी है, जिसमें सर्वभावसे यक्ष और हे राजन्! वे तमोगुणी लोग दैववश नरकसे | राक्षसोंकी ही पूजा होती है ॥ १९-२० ॥ निकलकर भूलोकमें हीन जातियोंमें जन्मान्ध, पंगु, कुबड़े | जो लोग वेदविधानसे रहित, क्रूरता, अहंकार तथा और दीन होकर जन्म लेते हैं ॥ १३ ॥ | दम्भसहित हैं, जो प्रेतभूतादिकोंको भजते हैं और कामुक पापाचरणवाले तथा मुझमें भक्ति न करनेवाले | कर्म करते हैं तथा दुराग्रहपूर्वक अपने शरीर और उसमें पतित होते हैं, परंतु मेरे भक्त चाहे किसी भी योनिमें जन्म | स्थित मुझे भी क्लेश पहुँचाते हैं, उनकी यह तामसी लें, नष्ट नहीं होते, उनका उद्धार हो जाता है ॥ १४ ॥ | भक्ति नरक देनेवाली है ॥ २१-२२ ॥ हे राजन्! यज्ञसे अथवा दूसरे कर्मोंसे स्वर्गकी | काम, लोभ, क्रोध, दम्भ—ये नरकके चार महाद्वार प्राप्ति होती है, जो सकाम पुरुषोंको सुलभ है, परंतु | हैं, इस कारण इनको त्यागना चाहिये ॥ २३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'योगोपदेशवर्णन' नामक एक सौ सैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४७ ॥ एक सौ अड़तालीसवाँ अध्याय तप, दान, ज्ञान, कर्म, कर्ता, सुख-दुःख, ब्रह्म एवं वर्णानुसार कर्मोंके भेद तथा गणेशगीताकी महिमा श्रीगणेशजी बोले—हे राजन्! कायिक, वाचिक | अन्तःकरणमें प्रसन्नता, शान्ति, मौन, जितेन्द्रियता, और मानसिक—इन तीन भेदोंसे तप भी तीन प्रकारका | सदा निर्मल भाव रखना—यह मानसिक तप है ॥ ४ ॥ है। ऋजुता, आर्जव, पवित्रता, ब्रह्मचर्य, अहिंसा, गुरु- | निष्काम भाव और श्रद्धासे जो तप किया जाता है, पण्डित-ब्राह्मण एवं देवताका पूजन करना तथा नित्य | वह सात्त्विक है। ऐश्वर्य और सत्कार-पूजाके निमित्त स्वधर्मका पालन करना—यह कायिक तप है ॥ १-२ ॥ | तथा दम्भसहित जो तप किया जाता है, वह राजसी तप जो मर्मस्पर्शी न हों, ऐसे प्रिय वचन बोलना, | है। राजसी तप निश्चय ही जन्म-मृत्यु और अस्थिरताको उद्वेगरहित, हितकारी और सत्य भाषण करना, वेद- | देनेवाला है। जिसमें दूसरेको तथा अपनेको पीड़ा हो, वह शास्त्रोंका पढ़ना—यह वाचिक तप है ॥ ३ ॥ | तामस तप कहा गया है ॥ ५-६ ॥
६२४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
[बायाँ स्तम्भ] विधियुक्त, उत्तम देश-कालमें सत्पात्रको श्रद्धापूर्वक जो दान दिया जाता है, वह सात्त्विक दान कहा गया है। उपकार या फलकी कामनासे मनुष्य जो दान करते हैं तथा ऐसा दान जो क्लेशपूर्वक अथवा भक्तिके कारण दिया जाय, वह राजसी दान कहलाता है॥७-८॥ जो देश-कालरहित, अपात्रमें अवज्ञापूर्वक दिया जाता है और जो दान अपमानपूर्वक दिया जाता है, वह तमोगुणी दान कहा गया है। हे राजन्! मन लगाकर सुनो, ज्ञान भी तीन प्रकारका है, कर्म और कर्ता भी तीन प्रकारके हैं, वह मैं प्रसंगसे कहता हूँ॥९-१०॥ जो अनेक प्रकारके प्राणियोंमें एक मुझको ही देखता है तथा नाशवान् भूतोंमें मुझ नित्यको जानता है, हे राजन्! वह सात्त्विक ज्ञान है। जो उन अनेक भूतोंसे मुझे पृथक् स्वरूपवाला और अव्यय जानते हैं, इस ज्ञानका नाम राजस है॥ ११-१२ ॥ हेतुरहित, असत्य तथा देह और मनके सुखके लिये असत् और अल्प अर्थयुक्त विषयोंमें लगना—इस ज्ञानका नाम तामस है। हे राजन्! सत्, रज, तम—इन भेदोंसे कर्म भी तीन प्रकारका है, जिसे मैं बताता हूँ; सुनो, कामना, द्वेष और दम्भसे रहित जो नित्य कर्म है और फलकी इच्छासे रहित जो कर्म किया जाता है, वह सात्त्विक कहलाता है॥ १३-१४॥ जो बहुत क्लेशपूर्वक तथा फलकी इच्छासे किया गया है और जिसको मनुष्य दम्भपूर्वक करते हैं, वह राजस कर्म कहलाता है और जो अपनी शक्तिके बाहर तथा अर्थका क्षय करनेवाला कर्म अज्ञानपूर्वक किया जाता है, वह तामस कर्म कहा गया है॥ १५-१६॥ इसी प्रकार हे राजन्! तीन प्रकारके कर्ता होते हैं, जिन्हें मैं बताता हूँ। हे राजन्! धैर्य और उत्साहयुक्त, सिद्धि-असिद्धिमें समान दृष्टिवाला, विकार और अहंकारसे रहित सात्त्विक कर्ता कहलाता है॥ १७-१८॥ जो हर्ष-शोकसहित कर्म करता है, हिंसामें प्रवृत्ति और फलकी इच्छा रखता है, जिसमें अपवित्रता और लोभ है, वह राजसी कर्ता कहा जाता है। प्रमाद और अज्ञानयुक्त, दूसरोंका नाश करनेवाला, दुष्ट, आलसी और जो कुतर्क करनेवाला है, वह तामसी कर्ता कहा
[दायाँ स्तम्भ] जाता है। हे राजन्! इसी प्रकार सुख-दुःख भी तीन प्रकारके हैं, वह तुम क्रमसे सुनो, इनके भी सात्त्विक, राजस, तामस भेद हैं, उन्हें मैं कहता हूँ॥ १९–२१ ॥ जो पहले तो विषके समान प्रतीत हो, किंतु दुःखका अन्त करनेवाला हो और परमार्थोन्मुख बुद्धिसे जिसकी कामना की जाती हो, जो अन्तमें अमृतके समान हो तथा जो अपनी बुद्धिको आनन्द देनेवाला हो, वह सात्त्विक सुख कहा गया है। विषयोंका जो सुख प्रथम तो अमृतके समान विदित हो और अन्तमें विषके समान फल दे, उसे राजसी सुख कहते हैं॥ २२-२३॥ जो तन्द्रा तथा प्रमादसे उत्पन्न हुआ हो, आलस्यसे भरा हुआ हो तथा अपनेमें सदा मोह उत्पन्न करता हो, उसका नाम तामसी सुख है। ऐसा कोई भी प्राणी नहीं है, जो इन तीनों गुणोंसे मुक्त हो॥ २४-२५॥ हे राजन्! ब्रह्म भी ओम्, तत्, सत्—इस भेदसे तीन प्रकारका है और हे राजन्! इस त्रिलोकीमें सब कुछ तीन होकर ही व्याप्त हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र— ये स्वभावसे ही भिन्न कर्म करनेवाले हैं, इनके कर्म संक्षेपसे मैं तुमसे कहता हूँ॥ २६-२७॥ बाह्य और अन्तः इन्द्रियोंको वशमें करना, सरलता, क्षमा, अनेक प्रकारके तप, पवित्रता, दोनों प्रकार (अन्वय- व्यतिरेक)-से आत्माका ज्ञान, वेद, शास्त्र, पुराण और स्मृतियोंका ज्ञान होना तथा उनके अर्थोंका अनुष्ठान करना—ये ब्राह्मणके कर्म हैं॥ २८-२९॥ दृढ़ता, शूरता, चतुरता, युद्धसे पलायन न करना, शरणागतकी रक्षा, दान, धैर्य, स्वाभाविक तेज, प्रभुता, मनकी उदारता, अच्छी नीति, लोकपालन (तथा राज्यपालन)-के पाँच कर्मोंमें अधिकार—ये क्षत्रियोंके स्वाभाविक कर्म हैं। अनेक प्रकारकी वस्तुओंका क्रय- विक्रय, पृथ्वीकर्षण अर्थात् खेती आदि करना, गायोंकी रक्षा करना—ये तीन प्रकारके वैश्यके कर्म कहे गये हैं। हे राजन्! दान, ब्राह्मणोंकी सेवा तथा सदा शिवजीकी उपासना—यह शूद्रोंका कर्म कहा गया है॥ ३०-३३॥ हे राजन्! ये सब वर्ण अपने-अपने कर्म यथावत् करते हुए और सम्पूर्ण कर्म मुझे अर्पण करते हुए मेरी कृपासे निश्चल परम स्थानको प्राप्त करते हैं॥ ३४॥
उपांगसहित विस्तारपूर्वक अनादिसिद्ध योगका वर्णन
क्री०ख०-अ०१४९] * ब्रह्माजीके द्वारा व्यासदेवकी जिज्ञासाका समाधान * ६२५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 प्रिय राजन् ! इस प्रकार तुम्हारे स्नेहसे मैंने अंग- उपांगसहित विस्तारपूर्वक अनादिसिद्ध योगका वर्णन किया, यह योग परमोत्तम है ॥ ३५ ॥ हे राजन् ! मेरे द्वारा कहे गये इस योगको धारण करो और किसीसे इसे मत कहो, तुम इसे गुप्त रखोगे तो परम उत्तम सिद्धिको प्राप्त करोगे ॥ ३६ ॥ व्यासजी बोले—इस प्रकार प्रसन्नचित्त महात्मा गणेशजीके वचन सुनकर राजा वरेण्यने उनके वचनके अनुसार आचरण किया। राज्य और कुटुम्बको त्यागकर वेगसे वे वनको चले गये और उपदेश किये गये योगमें स्थित होकर मुक्त हो गये ॥ ३७-३८ ॥ इस महागुप्त योगका जो कोई श्रद्धासे श्रवण करता है, वह भी मुक्तिको प्राप्त हो जाता है; क्योंकि वह भी योगीके समान ही होता है। जो बुद्धिमान् इस योगके तात्पर्यको भलीभाँति अधिगत करके दूसरोंको सुनाता है, वह भी योगीके समान मुक्त हो जाता है ॥ ३९-४० ॥ जो इस गीताका भलीप्रकार अभ्यासकर तथा गुरुमुखसे इसका अर्थ जानकर गणेशजीकी पूजाकर प्रतिदिन एक काल, दो काल अथवा तीनों कालोंमें पाठ करता है, वह ब्रह्मस्वरूपको प्राप्त हो जाता है और उसके दर्शनसे भी मनुष्य मुक्त हो जाता है ॥ ४१-४२ ॥ न यज्ञ, न व्रत, न दान, न अग्निहोत्र, न महाधन (प्रचुर धनव्ययसे साध्य शास्त्रीय अनुष्ठान), न सांगोपांग वेदोंके उत्तम ज्ञान और अभ्यास, न पुराणोंके श्रवण, न भलीभाँति चिन्तन किये हुए शास्त्रोंसे भी ऐसे ब्रह्मकी प्राप्ति होती है, जैसे इस गीतासे मनुष्योंको प्राप्त होती है ॥ ४३-४४ ॥ ब्रह्महत्यारा, मद्यपी, चोर, गुरुदारगामी तथा इन चारों महापाप करनेवालोंका साथ करनेवाले और स्त्रीहिंसा, गोवध आदि करनेवाले पापी भी इस गीताको पढ़नेसे पापमुक्त हो जाते हैं। जो नियमसे इसे नित्य पढ़ता है, वह निःसन्देह श्रीगणेशस्वरूप हो जाता है और जो चतुर्थीके दिन इसे भक्तिसे पढ़ता है, वह भी मुक्त हो जाता है ॥ ४५-४७ ॥ उन-उन पुण्यक्षेत्रोंमें जाकर स्नान करके गणेशजीका पूजनकर एक बार भी भक्तिपूर्वक इस गीताका पाठ करनेवाला ब्रह्मस्वरूपको प्राप्त हो जाता है ॥ ४८ ॥ भाद्रपदमासके शुक्लपक्षमें चतुर्थीके दिन भक्तिपूर्वक वाहन और आयुधसहित श्रीगणेशकी मृत्तिकाकी चतुर्भुज मूर्ति बनाकर विधिपूर्वक पूजन करके जो यत्नपूर्वक सात बार इस गणेशगीताका पाठ करता है, उसपर सन्तुष्ट होकर गणेशजी पुत्र, पौत्र, धन-धान्य, पशु, रत्नादि सम्पत्ति और उत्तम भोग उसे प्रदान करते हैं ॥ ४९-५१ ॥ विद्यार्थीको विद्या, सुखार्थीको सुख, कामार्थीको नानाविध कामोंकी प्राप्ति होती है और अन्तमें वे मुक्तिको प्राप्त होते हैं। इस प्रकार मैंने आपको समस्त [गीतोपदेश] बताया है, अब और क्या सुनना चाहते हैं? ॥ ५२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'त्रिविध वस्तुविवेकनिरूपण' नामक एक सौ अड़तालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४८ ॥
एक सौ उनचासवाँ अध्याय ब्रह्माजीके द्वारा व्यासदेवकी जिज्ञासाका समाधान, कलियुगवर्णन एवं कलियुगके अन्तमें गणपतिता अवतीर्ण होकर धर्म-संस्थापन
ब्रह्माजी बोले-इस प्रकारसे [देवताओं, ऋषियों तथा राजाओंसे] पूजित होकर विभु गजानन उस राजपूजित सदन (राजसदन नामक स्थान)-में भक्तोंकी कामनाओंको पूर्ण करते हुए निवास करने लगे ॥ १ ॥ मुनिने कहा-हे देव! आपने विनायकके महिमावर्णनके प्रसंगमें विभिन्न प्रकारके कथानकोंका निरूपण किया है। उन्होंने वरेण्यके भवनमें अवतीर्ण होकर विघ्नासुर अर्थात् सिन्दूरासुरका वध किया। हे चतुरानन ! गजाननकी गजमुख-प्राप्तिका आपने वर्णन किया और इसी प्रसंगमें पार्वतीजीके गर्भसे गजाननरूपसे गणपतिके आविर्भावका भी आपने निरूपण किया है। इसके कारण मैं सन्देहमें पड़ गया हूँ। आपके अतिरिक्त
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६२६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 सन्देहोंको नष्ट करनेवाला तीनों लोकोंमें दूसरा कोई | कलियुगसे सम्बन्धित कथाका वर्णन करूँगा ॥ १४ १/२ ॥ नहीं है ॥ २-४ ॥ | हे मुने! कलियुगके आ जानेपर लोग सदाचारसे ब्रह्माजी बोले—हे व्यास! विभु गजानन नानाविध | च्युत तथा असत्यभाषी हो जायेंगे। ब्राह्मण स्नान-सन्ध्या शक्तियोंसे सम्पन्न हैं, अतः उनके विषयमें सन्देह नहीं | तथा वेदाभ्यासका परित्याग कर देंगे। उनकी यजन, करना चाहिये। वे स्वेच्छावश कल्पोंके भेदसे भिन्न- | याजन तथा दानकृत्योंमें प्रवृत्ति नहीं होगी और वे दुष्ट भिन्न रूपोंमें अवतीर्ण हुआ करते हैं ॥ ५ ॥ | पुरुषोंसे अत्यन्त गर्हित दान ग्रहण करेंगे, सभी लोग कभी वे भगवान् शंकरके मुखसे, कभी उनके | दूसरेके कलंककी चर्चा करेंगे, निन्दामें तत्पर रहेंगे और क्रोधावेशसे, कभी पार्वतीजीके तेजसे, तो कभी उनके | परस्त्रियोंके साथ अनुचित व्यवहार करेंगे ॥ १५-१७ ॥ उदरसे और कभी उनके शरीरके मैल (उबटन)-से | वे लोग सब प्रकारसे कर्तव्योंका परित्याग कर देंगे अवतीर्ण हुए हैं। उनका स्वरूप कभी तो दो मुखोंवाला | और प्रत्येक स्थितिमें अवश्य ही विश्वासघात करेंगे। प्रकट हुआ और कभी पाँच एवं छः मुखोंसे युक्त | अवैध कार्योंको सफल बनानेके लिये वे मिथ्या शपथ दृष्टिगोचर होता रहा है। कभी वे दो भुजाओंसे समन्वित | ग्रहण करेंगे। हे मुनीश्वर! उस समय धरातलपर मेघ होते हैं, तो कभी [चार भुजाओं, छः भुजाओं और | कहीं भी [भलीभाँति] वर्षा नहीं करेंगे। महानदियोंके कभी] दश भुजाओं, द्वादश भुजाओं और सहस्र | तटवर्ती भूभाग भी कृषिके उपयोगमें लिये जायँगे। जो भुजाओंसे भी शोभित होते हैं। सभी आगमग्रन्थ उनके | बलवान् होगा, वह निर्बलके धनका बलात् अपहरण कर नानाविध ध्येय स्वरूपोंका निर्देश करते हैं। हे मुने! | लेगा और उससे दूसरे दो लोग मिलकर हरण करेंगे तथा [इसलिये] प्रभु गजाननके सम्बन्धमें तुम्हें विस्मय या | ऐसे ही उन दो बलवानोंसे तीन (अथवा अधिक) लोग संशय नहीं करना चाहिये ॥ ६-८ १/२ ॥ | बलपूर्वक [धन आदि] छीन लेंगे ॥ १८-२० १/२ ॥ लिंगपुराणमें शिवसे ब्रह्मा और विष्णुकी उत्पत्ति | कलियुगमें शूद्र वेदाभ्यास करेंगे और ब्राह्मण बतायी गयी है। स्कन्दपुराणमें ब्रह्माके नेत्रोंसे शिवका | शूद्रोचित कर्मोंमें प्रवृत्त हो जायँगे। क्षत्रिय वैश्योंके और प्रादुर्भाव वर्णित है। विष्णु शिवका ध्यान करते हैं और | वैश्य शूद्रोंके लिये विहित [जीविका-सम्बन्धी] कर्मोंका शिव भी विष्णुके ध्यानमें निरत रहते हैं। वे प्रभु शिव | सम्पादन करेंगे। ब्राह्मण चाण्डालतकसे दान ग्रहण पंचाक्षर मन्त्रके साथ तारक मन्त्रका उपदेश करते हैं। | करेंगे ॥ २१-२२ ॥ भगवान् शंकरने सौ करोड़ श्लोकोंमें रामचरित [का | [कलियुगके] विचारशून्य लोग धनहीन [और प्रणयन किया और उस]-को तीन भागोंमें विभक्तकर | शोकवश] हाहाकार करनेवाले होंगे। वे अपनी [एक-एक भाग स्वर्ग तथा पातालमें रखा और तीसरे | आवश्यकताओंको सामने रखकर दूसरोंसे धनकी याचना भागके सहित] तारकमन्त्र (रामनाम)-को पृथिवीलोकमें | करेंगे और [लौटानेके समय] कहेंगे कि हमने तो तुमसे स्थापित किया। यह सृष्टि कभी शिवसे, कभी विष्णुसे, | तनिक-सा भी धन नहीं लिया है। लोग रिश्वत लेकर कहीं देवीसे, कहीं सूर्यसे, कहीं गजाननसे तो कहीं | झूठी गवाही देंगे और सज्जनोंकी निन्दा तथा दुर्जनोंसे [निर्गुण निराकार] ब्रह्म [की सिसृक्षा]-से उत्पन्न | मित्रता करेंगे। द्विज व्यर्थमें ही [पशुओंको मारकर] बतायी गयी है। ये सभी परस्पर विरोधी बातें शास्त्रसम्मत | मांसका भक्षण करेंगे ॥ २३-२५ ॥ हैं। इनमें जो सन्देह करता है, वह निश्चय ही नरकगामी | [कलियुगमें] सत्पुरुषोंका उन्मूलन और दुराचारियोंका होता है ॥ ९-१३ १/२ ॥ | अभ्युदय देखा जायगा। लोग देवताओंकी अर्चनाका ब्रह्माजी बोले—हे मुने! इस प्रकार द्वापरयुगकी | त्याग करके ऐन्द्रिक अर्थात् इन्द्रजालसम्बन्धिनी (जादू- समस्त [लीला] कथा मैंने आपको बतलायी, अब मैं | टोना) विद्याओंका आश्रय लेंगे। वे भूत-प्रेत-पिशाचादिकी
क्री०ख०-अ०१४९] * ब्रह्माजीके द्वारा व्यासदेवकी जिज्ञासाका समाधान * ६२७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] उपासनामें दत्तचित्त रहेंगे। ब्राह्मण भाँति-भाँतिके वेष धारण करके अपना उदर-भरण करने लगेंगे। कुछ क्षत्रिय अपने कुलोचित आचारसे भ्रष्ट होकर भिक्षावृत्तिसे भी जीवननिर्वाह करेंगे। लोग व्रत-नियमादिका अल्पमात्र भी अनुपालन नहीं करेंगे॥ २६-२८॥ पृथ्वीपर रहनेवाले लोग वर्णसांकर्यको जन्म देनेवाले कार्योंको करने लगेंगे और पतिव्रताएँ अपने पातिव्रत्यधर्मसे च्युत हो जायेंगी। सभी [वर्णाश्रमी] लोग म्लेच्छोंके समान पराये धनका अपहरण करनेवाले, दयाशून्य, कुमार्गगामी तथा सर्वदा सत्यसे रहित व्यवहार करनेवाले हो जायेंगे॥ २९-३०॥ भूमिमें सस्य अर्थात् फसल नहीं उगेगी और वृक्ष नीरस हो जायँगे। कन्याएँ पाँच-छः वर्षकी आयुमें ही प्रसव करने लगेंगी। कलियुगमें मनुष्योंकी परमायु सोलह वर्ष होगी अर्थात् उनकी अधिकतम सोलह वर्ष ही जीनेकी अवधि होगी। तीर्थ और देवालय अपने दिव्य स्वरूपको अन्तर्हित कर लेंगे॥ ३१-३२॥ जब इस प्रकार पाप बढ़ने लगेगा और धर्म क्षीण होता जायगा, तो देवगण [यज्ञ-यागादिके अभावमें] भूखों मरने लगेंगे। तब स्वाहाकार, स्वधाकार, वषट्कारादि [के माध्यमसे जो हविष्य देवता प्राप्त करते थे, उस]- के अभावके कारण भयाकुल हुए देवगण अनामय गजाननदेवकी शरणमें जायँगे॥ ३३-३४॥ वे सभी विघ्नोंका नाश करनेवाले उन देवेश्वर गजाननका भाँति-भाँतिसे स्तवन और अभिवन्दन करेंगे तथा प्रार्थना करेंगे। देवताओंकी ऐसी प्रार्थनाका पूर्णतः विचार करनेके उपरान्त भगवान् गजानन अवतार ग्रहण करेंगे। उस समय उनके सूपके जैसे कान होंगे और वे धूम्रवर्ण नामसे विख्यात होंगे॥ ३५-३६॥ क्रोधसे मानो जलते हुए भगवान् गजानन तब हाथमें खड्ग लेकर नीलवर्ण अश्वपर आरूढ़ होंगे और अपनी इच्छाके अनुरूप अनेक रूपोंवाली सेनाका निर्माण करेंगे। वे बिना प्रयत्न किये [अपने संकल्पबलसे] बड़े- बड़े अस्त्र-शस्त्रोंको प्रकट करेंगे और सेनाके सहयोग तथा अपने तेजसे उन महाम्लेच्छोंका वध करेंगे। उस
[दायाँ स्तम्भ] समय गजाननदेव उन सारे लोगोंका वध करेंगे, जो म्लेच्छोंके जैसा आचरण कर रहे होंगे॥ ३७-३८ १/२॥ वे देवेश्वर [वनों और] कन्दराओंमें छिपे तथा वनके कन्द-मूल, फल खाकर जीवन-निर्वाह करनेवाले ब्राह्मणोंको बुलवायेंगे और उन्हें समादृत करके भूमिदान करेंगे तथा समस्त जनताको सत्कर्मनिरत एवं सज्जन बनायेंगे अर्थात् लोगोंको अनुशासितकर नैतिक जीवन जीनेकी शिक्षा देंगे॥ ३९-४०॥ तब (उनके ऐसा करनेपर) सम्पूर्ण विश्व धर्ममर्यादामें आबद्ध हो जायगा और सत्ययुगका प्रारम्भ होगा। गजाननदेव इस प्रकार धूम्रवर्णावतारके द्वारा धर्ममर्यादाकी स्थापना करनेके अनन्तर अन्तर्धान हो जायँगे॥ ४१॥ हे अनघ व्यासजी! इस प्रकार मैंने महात्मा विघ्नेश्वरके चारों युगोंमें होनेवाले नाम तथा रूप तुमको बतलाये और उनके चित्र-विचित्र लीलाकृत्योंका भी सम्पूर्ण रूपसे वर्णन किया, जिनका केवल श्रवण करनेसे भी सभी प्राणी मोक्ष प्राप्त करते हैं॥ ४२-४३॥ गजाननदेवके स्वरूप अन्तहीन हैं, अतः [उनका समग्रतया] वर्णन कर पाना मेरी शक्तिके बाहर है। जिनकी महिमाका वर्णन करनेमें चारों वेद कुण्ठित हो जाते हैं, वहाँ मेरी अथवा मेरे जैसे किसी अन्य व्यक्तिकी तो बात ही क्या है? [हे व्यासजी!] अब आप अनुष्ठानके लिये प्रस्थान कीजिये और मैं भी अपने [सृष्टि-] प्रपंचको सम्हालता हूँ॥ ४४-४५॥ भृगुजी बोले—हे सोमकान्त! ब्रह्माजीके मुखसे सभी पापोंका नाश करनेवाली कथाका श्रवण करके व्यासजी बड़े प्रसन्न हुए और उनसे कहने लगे॥ ४६॥ मुनि बोले—इस परम अद्भुत आख्यानको सुनकर मैं तृप्त नहीं हो पा रहा हूँ। आपका मुझपर बड़ा अनुग्रह हुआ है, मैं धन्य हो गया हूँ; क्योंकि गणपतिचरित्र- मूलक इस कथानकके माध्यमसे आपने मेरे सभी सन्देह दूर कर दिये। इसे बारम्बार सुनकर भी मुझे वैसे ही तृप्ति नहीं मिल रही है, जैसे अमृत कितना ही पिया जाय, तृप्ति नहीं होती॥ ४७-४८॥ इस आख्यानके श्रवणमात्रसे जन्म-जन्मान्तरमें अर्जित
६२८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
पाप भी नष्ट हो जाते हैं तथा सभी अभिलाषाएँ पूर्ण हो | वनकी ओर चल पड़े। जहाँपर कन्द, फलादि सुलभ थे, जाती हैं। इस पुराणको सुननेका अवसर मनुष्योंको | निर्मल जल था। जहाँ वायुकी प्रबलता नहीं थी और न पूर्वकृत पुण्योंके कारण ही मिलता है। सर्वसिद्धिप्रद यह | अग्नि अथवा घामका ही भय था। ऐसे [उत्तम तपः] पुराण दुर्जनको सुनानेयोग्य नहीं है॥ ४९-५०॥ | स्थानपर आसनस्थ होकर एकाग्र चित्तसे व्यासजी भृगुजी बोले—इस प्रकार कहकर व्यासजीने | [गणपतिके] एकाक्षर मन्त्र (गं)-का जप करने लगे। स्वयम्भू ब्रह्माजीको प्रणाम किया और उनकी परिक्रमा | जब तपस्या करते-करते व्यासमुनिके बारह वर्ष बीत गये, करके तपस्याहेतु आज्ञा प्राप्त की, तत्पश्चात् वे उत्तम | तब भगवान् गजानन उनके समक्ष प्रकट हुए॥ ५१-५३॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'मुनिविसर्जन' नामक एक सौ उनचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १४९॥
एक सौ पचासवाँ अध्याय
व्यासमुनिको गणपतिदेवका साक्षात्कार और उनसे वरकी प्राप्ति
सोमकान्तने कहा— हे भृगुजी! उन महात्मा व्यासजीके समक्ष गजाननदेव किस रूपमें प्रादुर्भूत हुए, वह सब बतलाइये, क्योंकि उस (के श्रवण)-से पापनाश होता है॥ १॥
भृगुजी बोले— हे भूमिप! जिस प्रकार गजाननदेव व्यासजीके समक्ष प्रादुर्भूत हुए थे, वह सब वृत्तान्त मैं बता रहा हूँ, उसका तुम आदरपूर्वक श्रवण करो। [जिस समय वे प्रकट हुए, उस समय] गजाननदेवने रक्तवर्णकी पुष्पमाला, रक्तवस्त्र तथा रक्तगन्धानुलेपन धारण कर रखा था। सिन्दूरके लेपनके कारण उनका मस्तक अरुणाभ था। कमलके समान नेत्रोंवाले गणपति अनेक सूर्योंके समान प्रतिभासित हो रहे थे। वे [कानोंमें] दिव्य कुण्डल, [बाहुयुगलमें] बाजूबन्द, [मस्तकपर] मुकुट, [हाथोंमें कंकण] तथा [यज्ञोपवीतके रूपमें] शेषनागको धारणकर शोभित हो रहे थे॥ २-४॥
मुनिने जब गणपतिके ऐसे रूपको देखा तो आँखें मूँद लीं, वे भयभीत होकर काँप उठे और मन्त्रका चिन्तन करते हुए मूच्छित हो गये। [जब उनकी मूर्च्छा दूर हुई] तब गजाननने कहा—'हे मुनिसत्तम! भयभीत मत होइये। हे मुने! जिसका आप अहर्निश चिन्तन करते हैं और जो ब्रह्मा आदि देवताओंके लिये भी अगम्य है, वह मैं तुमको वर प्रदान करनेके लिये तुम्हारे समीप आया हूँ'॥ ५-६ १/२॥
भृगुजी बोले— इस प्रकारकी मधुरवाणी सुनकर मुनिश्रेष्ठ व्यासजी बड़े प्रसन्न हुए। गजाननदेवके चरणोंमें अपना मस्तक रखकर वे बारम्बार कहने लगे कि मैं धन्य हूँ, मेरे माता-पिता धन्य हैं, मेरी तपस्या धन्य है, यह पृथिवी धन्य है और [तपोवनके ये] वृक्ष धन्य हैं; क्योंकि सर्वरूप, गुणातीत, समस्त प्रपंचके आश्रय, चिदानन्दघन, अनन्त और सभी कारणोंके परमकारण [आप गजानन]-का मैंने साक्षात्कार किया है। वरप्रद गजाननका इस प्रकार स्तवन करके वे उनसे प्रार्थना करने लगे॥ ७-९॥
मुनि बोले— हे देवेश! मेरी समस्त भ्रमबुद्धिको दूर करके आप मुझे अपने प्रति स्थिर भक्तिभाव प्रदान कीजिये। मैं जिस प्रकार अठारह महापुराणोंके प्रणयनमें समर्थ हो सकूँ और आपका भी गुणगान करनेमें सक्षम हो सकूँ, वैसा [कृपापूर्ण] विधान कीजिये। हे अनघ! यदि आप प्रसन्न हैं तो मेरे हृदयमें निवास कीजिये॥ १०-११ १/२॥
गजानन बोले— वत्स! तुमने जो प्रार्थना की है, वह सब आज ही पूर्ण हो जायगी। व्यास नामवाले मुनिवर! आप सबके मान्य, सभी पवित्रोंको भी पवित्र करनेवाले, अपरोक्षज्ञान (अद्वैतबोध)-से सम्पन्न तथा गुरुओंके भी गुरु होंगे। आप प्रसिद्धि, सद्गुण, कीर्ति तथा श्रीके विषयमें नारायणके तुल्य होंगे। हे मुनीश्वर!
ब्रह्माजीके मुखसे मेरा माहात्म्य सुन लिया है, जिसके
क्री०ख०-अ०१५१ ] * गणेशपुराणके श्रवणसे राजाकी रोगनिवृत्ति * ६२९ आप अठारह पुराणों तथा उतने ही उपपुराणोंके प्रणेता बनेंगे। आपने पूर्वकालमें दम्भवश मेरा स्मरण-पूजन नहीं किया था, यही कारण है कि आपकी वाणी आश्चर्यजनक रीतिसे स्तम्भित हो गयी। हे अनघ! अब आपने ब्रह्माजीके मुखसे मेरा माहात्म्य सुन लिया है, जिसके कारण इस समय आपका समस्त [दम्भजनित] पाप विलीन हो चुका है। अब मैं तुम्हारे अन्तःकरणमें [निर्मल बोधके रूपमें] प्रविष्ट हो रहा हूँ॥ १२-१६१/२ ॥ भृगुजी बोले-ऐसा कहकर वे विभु व्यासमुनिके अन्तःकरणमें प्रविष्ट हो गये। [गणपतिके प्रवेश करते ही] मुनिवर व्यासजीने करोड़ों सूर्योंके जैसा अतुलनीय तेज प्राप्त कर लिया। वह [गणपतिका] तेज सभी दिशाओंको उद्भासित करने लगा। तदुपरान्त व्यासजीने गजाननकी एक विशाल मूर्ति बनवायी और उसे देवप्रासाद (देवमन्दिर)-में स्थापित कर दिया तथा उसका विविध उपचारोंसे पृथक्-पृथक् (उपचारोंके क्रमभेदसे) पूजन किया॥ १७-१९॥ यह सिद्धिक्षेत्र सभी लोगोंके नेत्रोंको पवित्र करनेवाला, शुभावह तथा मन्त्रानुष्ठानमें तत्पर जनोंको अनेकविध सिद्धियाँ देनेवाला होगा- ऐसा कहकर तथा उन गणपतिदेवसे अनुज्ञा प्राप्तकर नारायणस्वरूप व्यासदेवने [वहाँसे प्रस्थान किया और अपने आश्रममें आकर] ब्रह्माजीके मुखसे सुने गये उस गणेशपुराणका महर्षि वैशम्पायनको श्रवण कराया। इसके अनन्तर वह पुराण भूतलपर विख्यात हुआ॥ २०-२११/२ ॥ हे नृप! उसी पुराणको समग्ररूपमें आज मैंने तुम्हें सुनाया है। हे नृपसत्तम! इसके सदृश पवित्र करनेवाला कोई अन्य साधन तीनों लोकोंमें नहीं है। यह सभी लोगोंको परमानन्दकी प्राप्ति करानेवाला है॥ २२-२३ ॥ हे सोमकान्त! तुम्हें इस पुराणका प्रवचन कभी दुष्टोंसे नहीं करना चाहिये और विनयशील भक्तोंको प्रयत्नपूर्वक अवश्य ही सुनाना चाहिये। मैं तो इसका निरन्तर स्मरण और पारायण किया करता हूँ। हे राजसत्तम! तुमपर करुणा होनेके कारण मैंने इसे सुनाया है। तुमको गजाननदेवका निरन्तर ध्यान, स्मरण तथा [उनके मन्त्रका] जप करते रहना चाहिये॥ २४-२५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'व्यासानुग्रह-सिद्धिक्षेत्रवर्णन' नामक एक सौ पचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १५०॥ एक सौ इक्यावनवाँ अध्याय गणेशपुराणके श्रवणसे राजाकी रोगनिवृत्ति और गणपतिके द्वारा प्रेषित विमानपर आरूढ़ होकर परमधामगमन सूतजी बोले-राजा सोमकान्त मुनीश्वर भृगुसे इस प्रकार नित्यप्रति कथाश्रवण करते और कथाश्रवणके पुण्यकी भावना करके सूखे आम्रके मूलमें जल डाल देते। जब ऐसा करते हुए उनको एक वर्ष व्यतीत हो गया, तब वह आम्रवृक्ष पुराणश्रवणजनित पुण्यके प्रभावसे [नूतन] पल्लव, मंजरी और फलोंके कारण अतीव कान्तिमय तथा शोभासम्पन्न हो गया॥ १-२॥ वे सोमकान्त कुष्ठ व्याधिसे मुक्त और दिव्य कान्तिसम्पन्न हो गये। उनका शरीर व्रणरहित हो गया, शरीरसे निकलनेवाली दुर्गन्ध समाप्त हो गयी और उत्तम गन्ध आने लगी। राजा सोमकान्तको दसों दिशाओंमें फैलती हुई उत्तम गन्धसे युक्त, दिव्यदेह, कोटि-कोटि चन्द्रमाओंके सदृश आह्लादक, सूर्यतुल्य तेजस्वी और विषादशून्य देखकर लोग विस्मयमें पड़ गये कि अरे! यह तो वैसा अर्थात् गलित कुष्ठके कारण विकृत शरीरवाला था, फिर यह गणेशपुराणकी दोषहारिणी महिमाके प्रभावसे कैसे ऐसा अर्थात् नीरोग और सुदर्शन हो गया है?॥ ३-५॥ भृगुजी बोले-हे नृपशार्दूल! यह उपलब्धि तो तुम्हें पुराणश्रवणके कारण ही हुई है। अब तुम जाओ, जब वर्षभरकी लम्बी अवधिसे उत्कण्ठित अपने पुत्र, मन्त्रिगण और प्रजाजनोंको देखोगे तो
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६३० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ कॉलम]
बड़ी प्रसन्नता होगी ॥ ६१/२ ॥ सूतजी बोले—महर्षि भृगुकी ऐसी बातें सुनकर राजा सोमकान्त उनके चरणोंमें गिर पड़े और मानो आनन्दसागरमें डूबे हुए-से वे कहने लगे ॥ ७१/२ ॥ राजा बोले—हे मुने! मैंने आज आपके तपकी अद्भुत महिमाका दर्शन किया और पुराणश्रवणके महत्त्वका भी अनुभव किया, जिसके कारण कुष्ठसे गलती देहवाला मैं पतित व्यक्ति भी दिव्य शरीरवाला हो गया। हे मुनिसत्तम! इस [दिव्य] देहका निर्माण करनेवाले [सच्चे] माता-पिता तो आप ही हैं। [आपकी कथाका प्रभाव कुछ ऐसा है कि] रसहीन आम्रवृक्ष भी फल- पुष्पादिसे युक्त हो गया। इसलिये मैं आपको छोड़कर जाना ही नहीं चाहता, अब मुझे पुत्र (आदि बन्धु- बान्धवों) तथा प्रजाजनोंसे क्या प्रयोजन है? राजाके इस कथनको सुनकर महर्षि भृगु पुनः कहने लगे ॥ ८-११ ॥ भृगुजी बोले—हे जनेश्वर! जन्मान्तरीय पुण्योंके प्रभावसे तुमने मेरे द्वारा वर्णित इस श्लाघनीय पुराणका श्रवण किया, जिसके कारण तुम्हारा पाप नष्ट हो गया। [वास्तवमें] इस गणेशपुराणकी महिमाका वर्णन कर ही कौन सकता है? अब तुम अपने नगरको प्रस्थान करो और मेरा स्मरण करते रहना ॥ १२-१३ ॥ जब वे लोग इस प्रकार संवाद कर रहे थे, तभी उन्होंने एक विशाल विमान देखा, जो करोड़ों सूर्योंके समान तेजोमय था ॥ १४ ॥ भृगुजी बोले—हे नृप! तुम्हारे लिये ही यह अद्भुत विमान आया है। अब तुम इसपर आरूढ़ हो जाओ और गणपतिका सान्निध्य पानेके लिये प्रस्थान करो। हे राजन्! जिस विमानको मुनीश्वर साधनानुष्ठानादिके द्वारा भी नहीं प्राप्त कर पाते, उसे तुमने पुराणश्रवणके कारण हुए गणपतिके अनुग्रहसे पा लिया है ॥ १५-१६ ॥ जब वे लोग इस प्रकार वार्तालाप कर रहे थे, तभी विमान क्षणभरमें भूतलपर आ पहुँचा। उसमें विनायकके गण विद्यमान थे। चार भुजाओंसे युक्त वे गण मुकुट, बाजूबन्द, हार आदि आभूषणोंसे अलंकृत थे। उन्होंने दिव्य चन्दनानुलेपन तथा दिव्याम्बर धारण किया था।
[दायाँ कॉलम]
उनके हाथोंमें कमल तथा परशु शोभायमान थे। [उस विमानमें गणोंके साथ] नृत्य करती हुई किन्नरकन्याएँ थीं और मृदंग, ताल (एक विशिष्ट वाद्य) तथा करताल बजाते हुए किन्नर थे, जो गायन कर रहे थे। यह देखकर राजा सोमकान्त पुनः कहने लगे ॥ १७-१९ ॥ राजा बोले—हे मुनीश्वर! हे ब्रह्मन्! मैंने यद्यपि विमानोंकी चर्चा तो अनेक बार सुनी थी, किन्तु उसे प्रत्यक्ष देख पानेका सौभाग्य तो आज आपके तपोबलके कारण ही मुझे मिला है। आपकी महिमाका वर्णन बारम्बार बहुत-से मुखोंसे होता रहा है, जिसे मैं अपने कानोंसे सुनता आया हूँ, किंतु आपसे पुराणश्रवण करके मैंने उसका आज स्वयं अनुभव भी कर लिया है ॥ २०-२१ ॥ जब राजा इस प्रकार कह रहे थे, तभी वे दूत विमानसे उतरे और प्रणाम करके राजा सोमकान्तसे कहने लगे कि हे शुद्धात्मन्! तुमने पुराणश्रवणादिसे जो पुण्य अर्जित किया है, उसके कारण परात्पर गजाननदेवने तुम्हारा स्मरण किया है। उन्हींकी आज्ञासे हम दूत लोग पवित्र कीर्तिवाले तुमको ले जानेके लिये विमान लेकर आये हैं। अब तुम उस उत्तमोत्तम गणपतिलोकके लिये प्रस्थान करो। उन गजाननका दर्शन करके तुम जन्म- मरणसे मुक्त हो जाओगे और वहाँ गणपतिदेवके समीप जाकर उनके अनुग्रहसे तुम आत्यन्तिक सुख प्राप्त करोगे ॥ २२-२५ ॥ दूतोंकी वे बातें सुनकर राजाको देहका भान न रहा और सारा शरीर रोमांचित हो गया। वे गद्गद वाणीमें बोले—'हे निष्पाप दूतो! चराचर विश्वकी सृष्टि करनेवाले, निर्गुण, गुणोंको [सृष्टिहेतु] क्षुब्ध करनेवाले, विश्वके प्रधान कारण, दीनरक्षक, परात्पर उन गजाननदेवने कृपापूर्वक मेरा स्मरण किया है। ब्रह्मा आदि देवगण तथा सनक आदि परमर्षिगण ध्यानावस्थित होकर भी जिनका स्वरूपसाक्षात्कार नहीं कर पाते और जो अनन्त गुणोंसे परिपूर्ण हैं, उन्होंने मेरे लिये यह उत्तम विमान भेजा है ॥ २६-२८१/२ ॥ जो परम मायावी, नानाविध अवतार धारण करनेवाले तथा अनेकानेक रूपोंवाले हैं, उन गजाननदेवने मेरा
क्री०ख०-अ०१५२] * अमात्योंका राजसभामें जाकर हेमकण्ठको राजाके आगमनकी सूचना देना * ६३१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
किसलिये स्मरण किया, यह बात आश्चर्यजनक है?' ॥ २९१/२ ॥ राजाने इस प्रकार [दूतोंसे] कहकर महर्षि भृगुको नमस्कार किया और उनसे कहा—[हे मुनीश्वर!] आपके अनुग्रहके कारण और आपकी आज्ञासे अब मैं गजाननके विमानपर आरूढ़ होकर दूतोंके साथ प्रस्थान कर रहा हूँ, आप [कभी] मेरा विस्मरण नहीं कीजियेगा ॥ ३०-३१ ॥ सूतजी बोले-राजाके कथनको सुनकर सम्भ्रमविह्वल महर्षि भृगुके नेत्र आनन्दाश्रुपूरित हो गये, उनका शरीर रोमांचित हो उठा। भृगुजीने राजाको कण्ठसे लगा लिया और कहने लगे- 'हे नृपते! मैं बड़ा ही भाग्यहीन ब्राह्मण हूँ। तुमने उत्तम पुण्यफल प्राप्त किया है। गणेशलोकमें पहुँचकर मुझको कभी भूल मत जाना' ॥ ३२-३३ ॥ इस प्रकार [अपने-अपने मनोभावोंको एक-दूसरेसे] कहकर राजा सोमकान्त और महर्षि भृगु एक-दूसरेका हाथ पकड़े हुए [आश्रमसे] बाहर निकले। [तदुपरान्त] परमप्रसन्न राजाने उन मुनिवर भृगुको नमस्कार किया और दूतोंके कथनके कारण उतावले-से होकर उस विमानमें आरूढ़ हो गये। [राजाकी पत्नी] सुधर्मा तथा [राजाके अनुगामी] दोनों अमात्य भी उस उत्तम विमानपर आरूढ़ हुए। इसके बाद वे दूत भी विमानमें आरूढ़ हो गये। [विमानमें बज रहे] वाद्योंके घोषने दिग्दिगन्तको व्याप्त कर लिया। विमानकी शोभाको देखकर राजा सोमकान्त आनन्दमग्न हो गये ॥ ३४-३६ ॥ राजा सोचने लगे कि यह अवसर मुझे जन्मान्तरीय पुण्यके ही कारण प्राप्त हुआ है। इसके अनन्तर महर्षि भृगुके देखते-देखते विमान आकाशमें उड़ चला ॥ ३७ ॥ इस पार्थिव शरीरसे सर्वोत्कृष्ट पदकी प्राप्तिको देखकर राजा अत्यन्त विस्मित हुए और दूतोंको प्रणाम करके उस परम-धामकी ओर चल पड़े ॥ ३८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'सोमकान्तको विमानप्राप्तिका वर्णन' नामक एक सौ इक्यावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५१ ॥
एक सौ बावनवाँ अध्याय अमात्योंका राजसभामें जाकर हेमकण्ठको राजाके आगमनकी सूचना देना और उसी प्रसंगमें राजा सोमकान्तके ऊपर हुए गणपति-अनुग्रह आदिका वर्णन करना
सूतजी बोले-[विमानमें बैठे हुए] राजा सोमकान्तने ऊपरसे ही अपनी राजधानी देवपुरका अवलोकन किया और वहाँके मुख्यद्वार, अट्टालिका आदिकी स्वर्णिम कान्तिको देखकर बड़े प्रसन्न हुए ॥ १ ॥ तदुपरान्त [महारानी] सुधर्माने रमणीय सभाभवनको देखकर अपने पुत्रका स्मरण किया और स्नेहके कारण गद्गद वाणीसे कहने लगीं- 'मेरा पुत्र हेमकण्ठ भद्रासन-पर बैठा होगा और आज वर्षभरकी अवधि पूर्ण होनेसे वह हम माता-पिताकी प्रतीक्षा कर रहा होगा। हे स्वामिन्! हे कृपानिधे! आपको [वहाँ जाकर] उसे अवश्य ही दर्शन देना चाहिये।' तब पत्नीकी ऐसी बातको सुनकर राजा चिन्तित हो उठे ॥ २-४ ॥ राजा बोले-मेरा पुत्र हेमकण्ठ पता नहीं इस समय जीवित होगा या मर चुका होगा। मैंने उससे कहा था कि वर्षभरके बाद तुम मुझे देख सकोगे। मैंने कभी असत्य भाषण नहीं किया, किन्तु इस असत्यसे बचकर अब कैसे निकलूँ? इस समय न तो मैं [पुत्रके पास] जा पा रहा हूँ और न ही परमपद (गणपतिधाम)-को त्यागनेमें ही सक्षम हो पा रहा हूँ। ये दोनों बातें अर्थात् परमधामगमन और पुत्रसे भेंट-परस्पर विरोधी हैं, अतः इन दोनोंका साथ-साथ पूर्ण होना कठिन है-ऐसा [कहते हुए] राजा फूट-फूटकर रोने लगे ॥ ५-६१/२ ॥ उन दोनों (राजा-रानी)-को शोकाकुल देखकर दूत उन नृपश्रेष्ठसे कहने लगे- [राजन्!] आप दोनोंका
६३२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- रोदन सुनकर हमको बड़ी दया आ रही है। हम लोग अभी क्षणभरमें यहीं विमानको उतार देते हैं, आप अपने पुत्रको देखकर शीघ्रतासे चले आइये। आप लोगों (की समस्या)-का समाधान करके हमें भी अत्यन्त सन्तुष्टि होगी॥ ७-८१/२॥ तदुपरान्त दूतोंने देवपुरके उत्तरी भूभागमें विमानको उतार दिया। गणेशपुराणश्रवणरूप पुण्यके कारण आये उस विमानने अपनी प्रभासे नगरको आच्छादित कर लिया तथा वाद्यध्वनियोंसे उसे गुँजा दिया॥ ९-१०॥ तदुपरान्त [राजाके अमात्य] सुबल और ज्ञानगम्यने राजा तथा दूतोंको नमस्कार किया और [उनसे अनुमति लेकर] उस हेमकण्ठको समस्त वृत्तान्त बतलानेके लिये वहाँ जा पहुँचे॥ ११॥ उन्होंने क्षणभरमें भद्रासनपर विराजमान हेमकण्ठको देखा, जो अमात्यों, नागरिकों एवं सन्नद्ध [अस्त्र- शस्त्रादिसे संयुक्त] महाबली वीरशिरोमणियोंसे घिरा हुआ उत्तम नृत्यका अवलोकन कर रहा था॥ १२१/२॥ तभी हेमकण्ठके मन्त्रियोंकी दृष्टि [सहसा] सुबल और ज्ञानगम्यपर पड़ी। [मन्त्रियोंके संकेतपर] सभी वीर और मन्त्रिगंणसहित हेमकण्ठ उठ खड़ा हुआ। वे सब लोग ज्ञानगम्य और सुबलका आलिंगन करनेके लिये संभ्रमपूर्वक वहाँ जा पहुँचे॥ १३-१४॥ जब उन सभीकी आपसी भेंट-मुलाकात हो गयी, तब परमहर्षित राजपुत्र हेमकण्ठ उनके पास गया और रोमांचित होता हुआ उनसे कहने लगा-'मन्त्रियो ! मेरे माता-पिता सकुशल हैं या नहीं। उन दोनोंको छोड़कर आपलोग अकेले ही यहाँ कैसे चले आये ?' ऐसा कहकर हेमकण्ठने उन दोनोंको उत्तम आसनपर बैठाया और वस्त्र, चन्दन, आभूषण, फल, ताम्बूल, सुवर्ण आदिसे पूजन किया ॥ १५-१७॥ [पूजनके उपरान्त वह पुनः कहने लगा कि] उन दोनों (माता-पिता)-के न होनेके कारण मेरे प्राण सर्वदा कण्ठमें ही अटके रहते हैं। मैं रातों-दिन उन्हींके बारेमें सोचा करता हूँ, उनके अतिरिक्त और कोई बात मेरे मनमें आती ही नहीं है। मेरे पिताश्रीने मुझसे पहले ऐसा कहा था कि एक बार दर्शन देने अवश्य आऊँगा, अतः वे अपनी उस बातको मिथ्या कैसे होने देंगे ?॥ १८-१९॥ वे दोनों (मन्त्री) बोले-हे नृप ! व्यर्थमें चिन्ता मत करो, तुम्हारे माता-पिता सकुशल हैं। उन दोनोंके पुण्यप्रभावको तीनों लोकोंमें कौन जान सकता है ? ॥ २० ॥ जब आपसे अनुमति लेकर हम चारों लोग (दो मन्त्री, राजा और रानी) नगरसे निकले तो सुकुमार होनेके कारण आपके पिताको अत्यन्त कष्टका अनुभव होने लगा। उनके कमलतुल्य चरण रक्तरंजित हो गये। वे क्षुधासे अत्यधिक पीड़ित रहने लगे, उन महाराजको कन्द, मूल, फलादिसे सन्तुष्टि नहीं होती थी ॥ २१-२२ ॥ आपकी माताकी भी वैसी ही दशा हो गयी। वे दोनों उस समय [सुखपूर्वक] एक डग भी नहीं चल पाते थे। हम सभी बहुत समयतक भटकते रहे, तब हमें एक विशाल और मनोरम सरोवर दिखायी पड़ा। [वहाँका परिसर] वृक्षों तथा लताओंके कारण [अत्यन्त] शीतल था। अतः महाराज वहीं विश्राम करने लगे और रानी सुधर्मा थकी होनेपर भी उनके पैर दबाती रहीं ॥ २३-२४ ॥ [इधर जब] हम लोग कन्द-मूल आदि लेनेके लिये निकले हुए थे, इसी बीचमें वहाँपर मुनीश्वर च्यवन जल लेनेके लिये आये और उन्होंने दोनों (महाराज एवं महारानी)-को देखा। मुनीश्वरने [बातचीतके द्वारा] उन दोनोंकें हार्दिक अभिप्रायको जाना और अपने आश्रमकी ओर चले गये। तबतक बहुत-से कन्द-मूल-फलादिको लेकर हमलोग भी लौट आये ॥ २५-२६ ॥ [इसके उपरान्त च्यवनमुनिके पिता महर्षि भृगुकी आज्ञासे] हम सभी लोग उनके आश्रममें गये, जहाँ मुनिने हमारा प्रचुर सत्कार किया। [उन लोगोंने] हमें षड्रसयुक्त भोजन कराया, जिससे हमें अत्यधिक विश्राम मिला। इसके उपरान्त महर्षि भृगु और महाराज सोमकान्त परस्पर बातचीत करने लगे। तब महाराजने अपना समस्त वृत्तान्त उन मुनिवरको सुना दिया ॥ २७-२८ ॥ तदुपरान्त मुनिवर ध्यानके द्वारा [जान करके] उनका पूर्वजन्म बतलाने लगे और करुणावश होकर [पूर्वजन्मके] पाप तथा उसकी शान्तिका उपाय भी उन्होंने बतलाया। हे नृप ! राजाके [पूर्वजन्मके] पापको सुनकर हम लोग भयभीत हो उठे और महाराज
क्री०ख०-अ०१५२ ]* अमात्योंका राजसभामें जाकर हेमकण्ठको राजाके आगमनकी सूचना देना * ६३३ सत्यताके विषयमें] सन्देह करने लगे। वे उसपर सन्देहपूर्वक विचार कर ही रहे थे कि तभी उनके शरीरसे श्वेत वर्णके पक्षी निकले और वे राजाको नोचने लगे। उनके चंचुप्रहारसे महाराज व्याकुल होकर गिर पड़े तथा 'रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये'-इस प्रकार मुनिसे प्रार्थना करने लगे। राजाकी प्रार्थनाको सुनकर मुनिने कृपापूर्वक उनकी ओर देखा। मुनिके अवलोकनमात्रसे क्षणभरमें वे पक्षी अन्तर्धान हो गये॥ २९-३२॥ तदुपरान्त महाराज अंजलि बाँधकर मुनिके समक्ष बैठ गये और कृपानिधि भृगुमुनिने राजाके महापापको जान लेनेके उपरान्त उनको भक्तिभावसे एक वर्षपर्यन्त गणेशपुराणका श्रवण कराया ॥ ३३१/२॥ मुनिने सर्वप्रथम गणपतिके एक सौ आठ नामोंसे अभिमन्त्रित जल राजाके ऊपर छिड़ककर अपनी तपस्याके प्रभावसे राजाके शरीरसे एक ऐसे भयानक पुरुषको बाहर निकाला, जिसके केश आकाशतक लम्बे थे, जिह्वा लटक रही थी और जो भूखसे अत्यन्त पीड़ित था॥ ३४-३५॥ उसने भृगुमुनिसे भोजनकी याचना की, तो मुनिने कहा कि यह जो सामने सूखा हुआ विशाल आम्रवृक्ष है, तुम उसीका भक्षण करो। तब जैसे ही उस पुरुषने आम्रवृक्षका स्पर्श किया, वैसे ही वह क्षणभरमें भस्म हो गया। उसके बाद [जब धीवररूपधारी पापपुरुषने पुनः भोजन माँगा तो] मुनिने धीवरसे कहा कि इसे (भस्मको) ही खाओ। तब वह पुरुष मुनिके भयके कारण उसी भस्ममें विलीन हो गया ॥ ३६-३७॥ इसके बाद मुनिने राजासे कहा- हे भूमिपाल ! पुराणश्रवणके इस महान् पुण्यको [जलरूप प्रतीकके माध्यमसे] तुम वृक्षकी भस्ममें तबतक प्रतिदिन डालते रहो, जबतक कि भस्मके स्थानपर पहलेके जैसा दूसरा आम्रवृक्ष उत्पन्न न हो जाय। हे राजेन्द्र! ऐसा होते ही तुम दिव्य शरीरवाले हो जाओगे॥ ३८-३९॥ दोनों मन्त्रियोंने कहा- हे नृप! [मुनिने जैसा कहा था,] महाराजने वैसा ही किया। वे प्रतिदिन स्नान करके बहुत देरतक कथाश्रवण करते और इसके बाद भक्तिपूर्वक वह पुण्यफल उस भस्ममें डाल देते। जब ऐसा करते-करते एक वर्ष बीत गया और गणेशपुराणकी कथा भी पूर्ण हो गयी, तो वहाँ पहलेकी भाँति फूलों- फलोंसे लदा हुआ एक वृक्ष उत्पन्न हो गया तथा महाराज भी दिव्य कान्तिसे समन्वित और सूर्य-चन्द्रमाके समान तेजोमय हो गये॥ ४०-४११/२॥ [इस प्रकारके दिव्य नैरोग्यलाभके कारण कृतज्ञतावश] जबतक महाराज मुनिका स्तवन करते अर्थात् उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करते, तबतक एक विमान वहाँपर आया। उसमें नृत्य-गान हो रहा था और वह वाद्योंकी ध्वनिसे गूँज रहा था। गणेशजीके दूतोंसे युक्त वह विमान आश्रमके निकट आ पहुँचा। हे नाथ! उस विमानकी शोभाका अवलोकन करके हम दोनोंके नेत्र सफल हो गये॥ ४२-४३१/२ ॥ आपके पिताके पुण्योंकी अधिकताके कारण गजाननदेवकी आज्ञासे उन दूतोंने आपके पिता महाराज सोमकान्तको विमानमें बैठा लिया और महाराजके संकेतसे दूतोंने हमलोगोंको भी प्रसन्नतापूर्वक विमानमें बैठाया। महारानी सुधर्मा भी भृगुमुनिसे आज्ञा प्राप्तकर विमानमें आरूढ़ हो गयीं ॥ ४४-४५॥ [गणपतिधामको जाते समय मार्गमें] जैसे ही देवपुर दिखायी पड़ा, [आपके माता-पिताको] वैसे ही आपका स्मरण हो आया। हे नृप! इसीलिये नगरके उत्तरी भूभागमें विमानको उतारा गया है। आपके माता-पिता आपको देखना चाहते हैं, इसीलिये हमलोग आपको बतानेके लिये यहाँ आये हैं। उनके दर्शनार्थ आप शीघ्र चलिये, अन्यथा वे लोग चले जायँगे ॥ ४६-४७॥ उन (मन्त्रियों)-की ऐसी बातें पूर्णरूपसे सुनकर राजाको रोमांच हो आया, वह रोने लगा और अपने माता-पिताको देखनेकी उत्कण्ठाके कारण मन्त्रियोंको आगे करके त्वरापूर्वक वह दौड़ने लगा। नागरिकों और सेवकोंसे घिरा, आँसू बहाता हुआ तथा गिरते हुए आभूषणोंवाला वह हेमकण्ठ गणेशजीके दूतोंसे युक्त विमानके समीप क्षणभरमें जा पहुँचा ॥ ४८-४९॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'हेमकण्ठदर्शन' नामक एक सौ बावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १५२॥
एक सौ तिरपनवाँ अध्याय
६३४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 एक सौ तिरपनवाँ अध्याय राजा सोमकान्तका विमानसे उतरकर पुत्र तथा नागरिकोंसे मिलना और उन सभीके साथ गणपतिलोकको जाना
सूतजी बोले—राजाके वे चारों अमात्य महाराज सोमकान्तके सामने उपस्थित हुए और [वहाँ विद्यमान] सभी लोगोंको प्रणामकर कहने लगे—हे नृप! आपका पुत्र आया हुआ है। समस्त वीरों और नागरिकोंसे वह वैसे ही घिरा है, जैसे इन्द्र देवताओंसे घिरे रहते हैं। उसने हर्ष तथा विषाद दोनों ही भावोंसे विमानको देखा है॥ १-२॥
इस प्रकार जबतक अमात्योंने सोमकान्तसे निवेदन किया, तबतक वह हेमकण्ठ भी बालक, स्त्री, वृद्ध तथा सेवकादिसे घिरा हुआ त्वरापूर्वक वहाँ आ पहुँचा। विमानकी शोभाका अवलोकनकर वे सभी (नगरवासी आदि) आनन्दविह्वल हो गये। वहाँपर महाराज सोमकान्त अपनी सुन्दरी पत्नी और गणपतिके दूतोंके साथ बैठे थे। उस (विमान)-के मध्यभागमें अवस्थित सोमकान्तको देखकर उन्होंने (हेमकण्ठ आदिने) पृथ्वीपर मस्तक रखकर प्रणाम किया। तब यानसे उतरकर सोमकान्तने प्रीतिपूर्वक पुत्रका आलिंगन किया॥ ३-५॥
वे दोनों (पिता-पुत्र) प्रसन्नताके आँसू बहाते हुए रोमांचित हो रहे थे और क्षणभरके लिये तो उन्हें शरीरका भानतक न रहा। वे आपसमें कुछ बोल भी नहीं पा रहे थे॥ ६॥
वर्षभर बाद मिले पुत्रसे पिता सोमकान्त स्नेहपूर्वक कहने लगे कि [वत्स!] मेरे वंशको विभूषित करनेवाले तुझ सत्पुत्रका ही मैं नित्य चिन्तन करता था। लोगोंके बहुत-से पुत्र हैं, किंतु उनमें मैं तुम्हारे जैसा एक भी पुत्र नहीं देख पाता। इसी बीचमें स्नेहमयी रानी सुधर्मा दौड़ती हुई पुत्रके निकट आ पहुँचीं। रानीने वात्सल्यपूर्वक पुत्रका आलिंगन किया। उस समय माता और पुत्रकी आँखोंसे आँसू झर रहे थे। माताने पुत्रसे कहा—बालक! लम्बे समयके बाद तुमको देख सकी हूँ॥ ७-९॥
मेरा मन तुम्हारे लिये उत्कण्ठित रहता था, इसलिये मुझे तनिक भी सुखका अनुभव नहीं होता था। इस समय तुम्हारा मुख देखकर मेरा मन आह्लादित हो गया है। [देखो!] तुम्हारे वियोगके कारण मैं कितना अधिक दुर्बल हो गयी हूँ॥ १०१/२॥
इसके उपरान्त नगरवासियों तथा नामधारक अर्थात् सेनाध्यक्ष, कोषाध्यक्ष आदि विभिन्न पदोंपर अधिष्ठित राजकीय कर्मचारियोंने राजाका आलिंगन किया। उस समय उनमें कुछ लोग राजाकी परिक्रमा कर रहे थे, कुछ लोग चरणस्पर्श करने लगे और कुछ उनका दर्शन करके ही नगरकी ओर लौट गये॥ ११-१२॥
इसके उपरान्त राजाने उन सभीसे कहा कि भृगु मुनिने कृपा करके जो मुझे पापनाशक गणेशपुराण सुनाया है, उससे मैं पापहीन तथा दिव्य देहवाला हो गया और अब विमानके द्वारा [गणपतिधामको] जा रहा हूँ। [मैं आप सबको देखना चाहता था और गणेशजीकी कृपासे] मैंने सबको देख भी लिया, अब मैं विमानपर आरूढ़ होकर जा रहा हूँ॥ १३-१४॥
हे पुत्र! मैंने स्वेच्छानुसार राज्य तथा सम्पत्तियोंका उपभोग किया। कृपालु गणपतिने मेरे निमित्त भूतलपर विमान भेजा। अब मैं [कृतकृत्य होकर] भृगुमुनिके अनुग्रहसे परमधामको जा रहा हूँ॥ १५१/२॥
जब उन लोगोंने सोमकान्तके द्वारा कही गयी ये बातें सुनीं तो वे सभी उच्चस्वरसे रोने लगे और कुछ लोग तो [शोकवश] भूमिपर गिर पड़े। तदुपरान्त [नगरके] प्रमुख व्यापारी एवं गणमान्यजन दयानिधि राजा सोमकान्तसे कहने लगे—'हे जगतीपाल! हमलोगोंके बिना आप उस परमधामको क्यों जा रहे हैं? हे नृप! [यदि आप ऐसा करेंगे तो] हम सभी लोग प्राण त्यागकर आपके पीछे-पीछे चले आयेंगे। ऐसी दशामें हमारी हत्याका पाप आपके सिरपर आयेगा। हमारे पास वैसा पुण्य तो है नहीं कि हम गणेश्वरका दर्शन कर
क्री०ख०-अ०१५३ ] * राजा सोमकान्तका विमानसे उतरकर पुत्र तथा नागरिकोंसे मिलना * ६३५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 सकें, किंतु आप यदि कृपा करें तो हमलोग भी गणपति- देवके उत्तम लोकको प्राप्त कर सकेंगे। इस संसारमें तो तनिक भी सुख नहीं है, अपितु व्यर्थमें ही यहाँ आयुका नाश होता रहता है। इसके अतिरिक्त, हम लोगोंसे कोई साधना-उपासना भी तो नहीं हो सकती, जो गणपतिधामकी प्राप्तिका साधन बन सके' ॥ १६-२०१/२ ॥ इसके बाद हेमकण्ठ भी अपने पिता राजा सोमकान्तसे आदरपूर्वक कहने लगा—हे तात! अपने बालकको छोड़कर गजाननके दर्शनार्थ आप किसलिये जा रहे हैं ? मेरा राज्यसे क्या प्रयोजन हो सकता है, मैंने तो केवल आपकी आज्ञासे वर्षपर्यन्त समग्र राज्यका परिपालन किया। अब मेरी भी राज्य करनेकी इच्छा नहीं है। राजन् ! अब मेरी भी आपको शपथ है, इसलिये आपको मुझे भी साथ ले चलना चाहिये ॥ २१-२३ ॥ सोमकान्तने कहा—हे जनो (नगरवासियो एवं बन्धु-बान्धवो) ! आप सभी लोगोंकी इच्छा गजाननदेवके चरणारविन्दोंको देखनेकी है, किंतु मैं तो स्वयं ही पराधीन हूँ, तब मैं कैसे आपकी इच्छापूर्ति कर सकता हूँ ? आप लोगोंके स्नेहके कारण और विशेषरूपसे पुत्रके प्रति वात्सल्यवश चिन्तित था, इसीलिये ऊपर-ऊपर जा रहे विमानको [आग्रहपूर्वक] उतारकर मैं देखनेके लिये चला आया ॥ २४-२५ ॥ सूतजी बोले—तदुपरान्त (राजाकी बातें सुननेके बाद) नगरनिवासी शोकाकुल हो गये और [स्वयं राजा] सोमकान्त तथा उनका पुत्र हेमकण्ठ—ये दोनों रोने लगे, तब देवदूतों (के मन)-में दया आ गयी। वे राजा सोमकान्तसे कहने लगे—'हे राजन् ! आप धन्य हैं; क्योंकि आपकी प्रजा आपके लिये वैसे ही प्राण न्योछावर कर चुकी है, जैसे कि आपने अपने-आपको जगदीश्वर गजाननको समर्पित किया है। अतः हम गजाननके समीप सबको लेकर शीघ्र ही चलेंगे' ॥ २६-२७१/२ ॥ राजाने कहा—यदि सारे नगरको [गणपतिधाम] ले जाया जा रहा है, तो निश्चय ही मेरी कीर्ति भूतलपर स्थिर रहेगी, ऐसा न होनेपर [कीर्ति भी] नहीं रहेगी ॥ २८१/२ ॥ सूतजी बोले—ऐसा कहनेके बाद राजाने गणेशपुराणके श्रवणका जो पुण्यफल था, उसे दूतोंकी आज्ञासे [धाम जानेके इच्छुक] लोगोंके हाथोंमें जलके रूपमें छोड़ दिया। जैसे ही [पुण्यफलका प्रतीकरूप] जल उनके हाथोंमें गिरा, वैसे ही वे लोग पापोंसे रहित तथा पुण्यशाली हो गये ॥ २९-३० ॥ तदुपरान्त स्त्री-पुरुष, बालक-वृद्ध सभी लोग उस उत्तम विमानपर आरूढ़ हुए और वे गणपतिदूत ऊपर (आकाश-) मार्गसे चल पड़े। उस समय कुछ ऐसे पापात्मा भी थे, जिन्होंने हाथमें जल नहीं लिया। वे पुनः नगरको लौट गये और जो लोग वहाँ बचे थे, उनसे सारा समाचार कह सुनाया। तब उन [बचे हुए] लोगोंने ऊपर आकाशमें जाते हुए विमानका बहुत [उत्कण्ठावश] अवलोकन किया ॥ ३१-३२१/२ ॥ इसके उपरान्त [गये हुए लोगोंके] धनको पाकर सन्तुष्ट हुए वे शेष नागरिक परस्पर वार्तालाप करने लगे और प्रसन्न चित्तसे नानाविध क्रियाकलापोंमें निरत हो गये। [विमानमें आरूढ़ कुछ लोग] भागना चाह रहे थे, उन्हें गणपतिदूतोंने दण्डसे ताड़ित करते हुए पकड़ लिया और बलपूर्वक विमानके भीतर बैठा दिया। यह बड़े कौतुककी बात थी ! जो लोग भाँति-भाँतिके बहाने बनाकर निकल पड़े थे, उन्हें भी दूतोंने वैसे ही बैठा दिया ॥ ३३-३५ ॥ विमानके मध्यभागमें राजा सोमकान्त, पत्नी सुधर्मा और पुत्र हेमकण्ठ आदि विराजमान हुए, उनके चारों ओर अमात्यगण तथा [यथास्थान] सुखपूर्वक नागरिक बैठे। वे लोग 'मयूरेश ! तुम्हारी जय हो, मयूरेश ! तुम्हारी जय हो' इस प्रकारका जयघोष कर रहे थे। वहाँ अप्सराएँ नाच रही थीं, देववाद्य बज रहे थे और इसके कारण दिशामण्डल प्रतिध्वनित हो रहा था ॥ ३६-३७१/२ ॥ अतिशय वेगपूर्वक वे सभी गणपतिके मंगलमय धाममें जा पहुँचे और वहाँकी सुन्दरताको निहारते
६३६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- हुए विस्मयपूर्वक कहने लगे—'अहो! इन (महाराज सोमकान्त)-का महान् पुण्य है, जिसके कारण हम गजाननदेवका साक्षात्कार कर सके।' [गणपति- धाममें गये हुए] उन सभी लोगोंने सामीप्यमुक्ति प्राप्त की और राजाको [गणपतिका] सायुज्य प्राप्त हुआ॥ ३८-३९१/२॥ सूतजी बोले-हे विप्रो! इस प्रकारसे मैंने गणेशपुराणकी कथा आप लोगोंको सुनायी, जो श्रवण की जानेपर सभी लोगोंके पापोंका ध्वंस कर देती है। हे विप्रो! अब उसे सुनो, जो राजाने [विमानमें] देवदूतोंसे पूछा था। मैं उस समस्त कथानकका आप लोगोंसे वर्णन करता हूँ॥ ४०-४१॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'सोमकान्तको देवपदकी प्राप्तिका वर्णन' नामक एक सौ तिरपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १५३॥ एक सौ चौवनवाँ अध्याय राजाके पूछनेपर गणपतिदूतोंका काशीमें स्थित विनायकोंके आवरणोंका क्रमिक वर्णन ऋषिगण बोले-हे अनघ! विमानमें बैठे हुए राजा सोमकान्तने [दूतोंसे] क्या पूछा था, उसे हम सभी सुनना चाहते हैं, अतः वह सब हमें पूर्णरूपसे बतलाइये॥ १॥ सूतजी बोले-हे अनघ ऋषियो! आकाशमार्गसे जाते हुए महामना नरेशने दूतोंसे महात्मा गणेशके वाराणसीमें स्थित परिवारों (आवरणों)-के नामोंको जानना चाहा था। उनका आप लोग श्रवण कीजिये॥ २१/२॥ राजाने कहा-हे दूतो! स्मरणमात्रसे समस्त सिद्धियोंको देनेवाले और विश्वेशके परिवारदेवताओंमें परिगणित गणपतिविग्रहोंके बारेमें आपलोग कृपापूर्वक मुझको सम्पूर्ण रूपसे बतलाइये॥ ३१/२॥ दूत बोले-हे राजन्! समस्त भयोंको दूर करनेवाले और विश्वेश्वरके परिवारदेवताओंके रूपमें परिगणित गणपतिविग्रहोंके विषयमें हम बता रहे हैं; आप श्रवण कीजिये॥ ४१/२॥ [वाराणसीको आवृतकर स्थित गणपतिके सात आवरणोंमें अन्यतम] प्रथम आवरणके अन्तर्गत दुर्ग- विनायक, अर्कविनायक, भीमचण्डीविनायक, देहली- विनायक, उद्दण्डविनायक, पाशपाणिविनायक, खर्व- विनायक तथा सिद्धिप्रद सिद्धिविनायक—ये आठ विनायक हैं॥ ५-६१/२॥ द्वितीय आवरणमें लम्बोदर विनायक, कूट- दन्तविनायक, शूलटंकविनायक, चौथे कूष्माण्डविनायक, पाँचवें मुण्डविनायक, विकटद्विजविनायक, राजपुत्र- विनायक तथा अन्तिम प्रणवविनायक—ये आठ विनायक स्थित हैं॥ ७-८१/२॥ तृतीय आवरणमें वक्रतुण्डविनायक, एकदन्तविनायक, त्रिमुखविनायक, पंचमुखविनायक, हेरम्बविनायक, विघ्नराजविनायक, वरदविनायक तथा मोदकप्रिय विनायक—ये आठ विनायक स्थित हैं॥ ९-१०१/२॥ चतुर्थ आवरणमें अभयप्रद विनायक, सिंहतुण्ड- विनायक, कूर्णिताक्षविनायक, क्षिप्रप्रसादविनायक, चिन्तामणिविनायक, दन्तहस्तविनायक, प्रचण्डविनायक तथा उद्दण्डमुण्ड-विनायक—ये आठ विनायक स्थित जानने चाहिये॥ ११-१३॥ पंचम आवरणमें स्थूलदन्तविनायक, कलिप्रिय- विनायक, चतुर्दन्तविनायक, द्वितुण्डविनायक, ज्येष्ठ- विनायक, गजविनायक, कालविनायक तथा मार्गेश- विनायक (नागेश या नागविनायक)—ये आठ विनायक जानने चाहिये॥ १४-१५॥ षष्ठ आवरणमें मणिकर्णिविनायक, आशाविनायक, सृष्टिविनायक, यक्षविनायक, गजकर्णविनायक, चित्रघण्ट- विनायक, सुमंगलविनायक तथा मित्रविनायक—ये आठ विनायक स्थित हैं॥ १६१/२॥ सप्तम आवरणमें मोदविनायक, प्रमोदविनायक, सुमुखविनायक, दुर्मुखविनायक, गणपविनायक, ज्ञान- विनायक, द्वारविनायक तथा आठवें मोक्षप्रद अविमुक्त-
क्री०ख०-अ०१५५] * गणेशपुराणीय माहात्म्य-निरूपणके प्रसंगमें विविध इतिहास * ६३७ विनायक—ये आठ विनायक स्थित हैं ॥ १७-१८१/२ ॥ इन [आवरणस्थ विनायकों]-के अतिरिक्त भी भगीरथविनायक, हरिश्चन्द्रविनायक, कपर्दीविनायक तथा बिन्दुविनायक आदि अन्य विनायक स्थित हैं। इन सभी विनायकोंका नित्यप्रति स्मरण सभी कामनाओंको फलीभूत करनेवाला है ॥ १९-२० ॥ जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर शुद्ध चित्तसे इनके नामोंका पाठ करता है, उसके किसी भी कार्यमें विघ्न (उपद्रवादि) बाधा नहीं पहुँचाते हैं। हे राजेन्द्र ! भक्तिमान् मनुष्यको चाहिये कि वह विनायकोंके एक-एक नामका उच्चारण करके दूर्वांकुर, तिल, अक्षत तथा शमीपत्रोंसे इनकी पूजा करे ॥ २१-२२ ॥ ऐसा करनेवाला मनुष्य असाध्य कार्योंको भी सिद्ध कर लेगा, उसे सर्वत्र विजय मिलेगी और वह आयुष्य, पुष्टि, धन तथा आरोग्य प्राप्त करेगा ॥ २३ ॥ हे नृप ! जो तुमने पूछा था, वह सब हमने बता दिया है, ऐसा कहकर वे दूत मौन हो गये और प्रसन्नतापूर्वक अपने (गणपतिके) धामको चले गये ॥ २४ ॥ सूतजी बोले—हे विप्रो ! यह जो विश्वेश्वरके आवरणोंके बारेमें आप लोगोंने पूछा था, वह मैंने बता दिया है। अब मैं गणेशपुराणकी फलश्रुतिका वर्णन करूँगा ॥ २५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'छप्पन विनायकोंका वर्णन' नामक एक सौ चौवनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५४ ॥ एक सौ पचपनवाँ अध्याय गणेशपुराणीय माहात्म्य-निरूपणके प्रसंगमें विविध इतिहास एवं ग्रन्थकी फलश्रुति सूतजी बोले—हे द्विजो ! इस पुराणका एक बार भी श्रवण करनेसे जन्म-मरणरूप बन्धनसे मुक्ति मिल जाती है। यदि इसे अनेक बार सुना जाय तो उस फलको बता पानेमें शेषनाग अथवा ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं हैं। सूर्यग्रहण तथा चन्द्रग्रहणके अवसरपर कुरुक्षेत्रतीर्थमें ब्राह्मणोंको भक्तिभावसे सहस्र भार सुवर्ण देकर मनुष्य जिस पुण्यफलको प्राप्त करता है, वही पुण्यफल उस भक्तिसम्पन्न मनुष्यको इस पुराणके श्रवणसे प्राप्त हो जाता है ॥ १-३ ॥ ब्रह्माजीने सांगोपांग रीतिसे अनुष्ठित और [प्रचुर] दक्षिणावाले समस्त यज्ञ-यागादिके पुण्यफलकी पुराणश्रवणके पुण्यफलसे तुलना की, जिसमें गणेशपुराणके श्रवणका जो पुण्यफल था, वह यज्ञफलकी अपेक्षा अधिक गौरवपूर्ण सिद्ध हुआ। [जब सांगोपांग अनुष्ठान किये गये यज्ञोंके पुण्यफलकी ऐसी दशा है, तो] वहाँपर सभी प्रकारके दान-व्रत आदि पुण्यकर्मोंके फलकी गणनाकी बात ही क्या हो सकती है ! ॥ ४-५ ॥ करोड़ों कन्यादान तथा हजारों गोदान करनेका जो पुण्यफल है, उससे कोटिगुणित अधिक पुण्यफल इस पुराणके श्रवणसे प्राप्त होता है। अंगोंसहित चारों वेदोंके स्वाध्याय-आवर्तनादिका, निरन्तर शास्त्रोंके निरूपण- चिन्तनादिमें तत्पर रहनेका और सत्पुरुषोंकी सेवाका जो पुण्यफल है, उससे करोड़ गुना अधिक पुण्यफल इस पुराणको सुननेसे मिल जाता है ॥ ६-७१/२ ॥ महाभारत तथा समस्त पुराणोंके श्रवणका जो फल होता है, उससे करोड़गुना अधिक पुण्यफल गणेशपुराणके श्रवणसे मिलता है। जिसके भवनमें लिखकर गणेशपुराण स्थापित किया जाता है, वहाँपर राक्षस, भूत, प्रेत, पूतना आदि बालग्रह तथा अन्य ग्रह कभी भी पीड़ा नहीं पहुँचाते। उस घरकी गणेशजी सर्वदा रक्षा करते रहते हैं ॥ ८-१०१/२ ॥ जो मनुष्य एकाग्र चित्तसे इस पुराणका श्रवण अथवा पूजन करता है, उसके दर्शनसे तो पतित जन भी पवित्र हो जाते हैं और वह ब्रह्मा आदि देवताओं तथा मुनिजनोंका भी आदरणीय हो जाता है ॥ ११-१२ ॥ वह क्रुद्ध हो जाय तो पूरे विश्वको भस्म कर सकता है और सन्तुष्ट हो जाय तो इन्द्रपद प्रदान करनेमें समर्थ है। इस पुराणका नित्यप्रति श्रवण करनेसे
६३८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
क्री०ख०-अ०१५५] * गणेशपुराणीय माहात्म्य-निरूपणके प्रसंगमें विविध इतिहास * ६३९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] हे मुनियो! अब एक अन्य प्राचीन इतिहासका श्रवण कीजिये। इक्ष्वाकुवंशमें संवरण नामके एक परम धार्मिक राजा हुए थे। वे यज्ञकर्ता, दाता, पवित्र, लोकरक्षक, स्वाध्यायनिरत, शत्रुहन्ता तथा प्रजापालनमें तत्पर थे। वे सभी धर्मोंका प्रतिपादन करनेमें समर्थ, प्रजाकी आयका छठा भाग ही ग्रहण करनेवाले, लोकपूजित और [सबको] परमप्रिय थे। उनकी ख्याति तीनों लोकोंमें फैली थी॥ ३३-३५ १/२॥ महाराज संवरण सन्तानहीन थे, इसलिये उन्होंने पुत्रेष्टि नामक यागका आरम्भ किया। संवरणने यद्यपि दक्षिणा एवं अन्नदानसे समन्वित पुत्रेष्टिका सांगोपांग सम्पादन किया था, तथापि उन्हें सन्तानप्राप्ति नहीं हुई, तब उन्होंने हरिवंशपुराणका श्रवण किया और ब्राह्मणोंकी पूजा करनेके बाद कथावाचकको भी वस्त्र, धेनु, सुवर्ण, रत्न, मूल, फल आदिके द्वारा सन्तुष्ट किया॥ ३६-३८॥ इतना करनेपर भी उन्हें पुत्रप्राप्ति न हो सकी। [इसके कुछ दिन बाद] दैवयोगसे उनके भवनमें मूकमुनिका आगमन हुआ, जो कि गणेशपुराणके मर्मज्ञके रूपमें प्रसिद्ध थे॥ ३९॥ राजा संवरणने प्रार्थना करके उनको अपने यहाँ रोक लिया और बड़ी प्रसन्नताके साथ उनके मुखसे गणेशपुराणका श्रवण किया। पुराणश्रवणके बाद राजाने उन द्विजश्रेष्ठ मूकको रत्न, मुक्ताफल, वस्त्र तथा स्वर्णांलंकारादि समर्पित करके प्रसन्न किया। इसके [कुछ काल] बाद राजाको पुत्रकी प्राप्ति हुई और वे गणेशजीकी भक्तिमें तत्पर हो गये। उन्होंने अनेक सुखोंको भोगनेके पश्चात् गणपतिदेवके परमधामको प्राप्त किया॥ ४०-४२॥ राजा संवरणकी एक वन्ध्या बहन थी, वह तीस वर्षकी तरुण-अवस्थाको प्राप्त करके भी रजोधर्मसे रहित थी। उसने जब सुना कि 'यथोचित समय आनेपर राजाको सन्तानप्राप्ति हुई है और वह सन्ततिलाभ गणेशपुराणके श्रवणका परिणाम है' तो उसने मूक
[दायाँ स्तम्भ] मुनिको बुलाया और उनके मुखसे मंगलमय गणेशपुराणका श्रवण किया। गणेशजीकी भक्तिमें निरत उस महिलाने भी परम शूर पुत्रको प्राप्त किया। इसके अतिरिक्त और भी बहुत-से पुत्र-पौत्रोंको प्राप्तकर तथा मनोहर भोगोंको भोगनेके पश्चात् उसका देहावसान हुआ और उसने गणपतिके परमधामको पा लिया॥ ४३-४५ १/२॥ प्राचीनकालकी बात है। राजा सगरके पुत्रोंमें एक पुत्र पंगु था। उसने विनयपूर्वक भक्तिभावसे बारह वर्षोंतक महर्षि लोमशसे इस पवित्र पुराणका श्रवण किया तथा बड़ी भक्तिसे लोमशजीको [नानाविध] द्रव्य समर्पित करके सन्तुष्ट किया। इससे उसके चरण स्वस्थ हो गये और उसने विजय, पुष्टि तथा दीर्घायुष्यके साथ- साथ अन्तमें गणपतिदेवके उस परमधामको भी प्राप्त कर लिया॥ ४६-४८॥ अठारह पुराणोंका श्रवण करनेसे जो पुण्यफल प्राप्त होता है, वही पुण्यफल एकमात्र गणेशपुराणको सुननेसे भी मिल जाता है। हे विप्रो! काकवन्ध्या नारी इसका श्रवण करके बहुत-से पुत्रोंको प्राप्त करती है और जिस स्त्रीका बार-बार गर्भपात होता है, वह स्थिर गर्भवाली हो जाती है॥ ४९-५०॥ हे मुनिवरो! इसका श्रवण करके गूँगा व्यक्ति बृहस्पतिके सदृश भाषणकुशल हो जाता है और वेदाभ्यासी श्रेष्ठ ब्राह्मण निस्सन्देह सर्वमान्य और सर्वज्ञ बन जाता है॥ ५१॥ गणेशपुराणका [सतत] स्मरण-चिन्तन करते रहनेसे शूद्र वैश्यत्व, वैश्य क्षत्रियत्व तथा क्षत्रिय ब्राह्मणत्वरूप वर्णोत्कर्षको प्राप्त कर लेता है॥ ५२॥ इस पुराणके एक अध्यायका भी श्रवण करनेसे कुमारी कन्या गुणवान्, कुलीन, समृद्ध और सदाचारी पतिको प्राप्त कर लेती है और जन्मान्ध मनुष्य पुराणके श्रवणसे देखनेकी शक्ति पा लेता है। जो मनुष्य समस्त तीर्थोंमें स्नान करता है और सब प्रकारके दान देता है, उसे जिस फलकी प्राप्ति होती है, वही फल इस पुराणको भक्तिभावसे सुननेवाला पा लेता है॥ ५३-५४ १/२॥
६४० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 जो मनुष्य अनेक वर्षोंतक ग्रीष्म-ऋतुमें पंचाग्नि- | जाता है ॥ ६१ १/२ ॥ साधन (चारों ओर अग्नि और ऊपर सूर्यके आतपका | मथुरापुरी, हरिद्वार, बदरिकाश्रम, सेतुबन्धतीर्थ, कुरुक्षेत्र सेवन करते हुए तपश्चरण), हेमन्त-ऋतुमें जलवासन | और श्रीशैलक्षेत्र—इनमें [तपस्या करनेका] जो फल (कण्ठ या नाभिपर्यन्त जलमें स्थित रहना) और वर्षा- | होता है, उससे कोटिगुना अधिक फल मनुष्योंको सर्वदा ऋतुमें आकाशवास (खुले आकाशके नीचे रहकर | [इस पुराणके श्रवणसे] मिल जाता है ॥ ६२-६३ ॥ वृष्टिका सहन) करता है, उसको मिलनेवाला फल | वैसे ही गोमतीनदीके संगममें जो मनुष्य भक्तिपूर्वक गणेशपुराणके पाँच अध्यायोंको सुननेमात्रसे मिल जाता | स्नान करता है, उससे मिलनेवाले पुण्यफलसे कोटिगुना है। जो मनुष्य भक्तिभावसे सर्वदा (यावज्जीवन) अग्निहोत्रका | अधिक फल इस पुराणका श्रवण करनेसे वह प्राप्त कर अनुष्ठान करता है, उसे प्राप्त होनेवाला फल इस पुराणका | लेता है ॥ ६४ ॥ श्रवण करनेमात्रसे मिल जाता है ॥ ५५-५७ ॥ | जो भक्तिमान् मनुष्य इस गणेशपुराणका श्रवण हे द्विजो ! जो मनुष्य दस हजार वर्षोंतक अपने | करता है, उसे न [भगवान् शंकरके] त्रिशूलसे, न पैरके एक अंगूठेके सहारे खड़ा रहकर तपस्या करता है, | [देवराज इन्द्रके] वज्रसे और न चक्रधर भगवान् उसको जैसा फल मिलता है, वैसा ही पुण्यफल इस | नारायणके सुदर्शन चक्रसे ही भय रह जाता है ॥ ६५ ॥ पुराणके दस अध्यायोंको भक्तिभावसे सुननेमात्रसे निश्चय | हे मुनीश्वरो ! मैंने आपलोगोंके समक्ष इस पुराणका ही प्राप्त हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ५८ १/२ ॥ | विस्तारपूर्वक समग्र वर्णन किया है। इसके सम्पूर्ण जो मनुष्य यावज्जीवन इस लोकमें नित्यप्रति | माहात्म्यको तो ब्रह्मा, कार्तिकेय अथवा शेषनाग भी गणेशपुराणका श्रवण करता है, वह चक्रवर्ती सम्राट् होता | करोड़ों वर्षोंमें बतलानेमें समर्थ नहीं हो सकते ॥ ६६ ॥ है। जो मनुष्य जन्मसे लेकर मृत्युपर्यन्त काशीवास करता | आप लोगोंने जो पूछा है, वह सभी पापोंका है, उसे [काशीवाससे] मिलनेवाला पुण्यफल गणेशपुराणके | नाशक, सभी अभीष्टोंको देनेवाला, भोग-मोक्षप्रद तथा श्रवणसे प्राप्त हो जाता है ॥ ५९-६० १/२ ॥ | पुण्योंकी वृद्धि करनेवाला है। नानाविध लीलाएँ करनेवाले जो मनुष्य एक हजार माघमासोंतक प्रयागमें | परमेश्वर गणपतिका यह पुराण वक्ता और श्रोताको स्नान करता है, उससे मिलनेवाला जो पुण्यफल है, वही | निष्पाप बनानेवाला है। [इसे मैं आप लोगोंको सुना चुका फल उसको गणेशपुराणका श्रवण करनेसे प्राप्त हो | हूँ], अब आप और क्या सुनना चाहते हैं? ॥ ६७-६८॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'फलश्रुतिनिरूपण' नामक एक सौ पचपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण क्रीडाखण्ड पूर्ण हुआ ॥ ॥ गणेशपुराण सम्पूर्ण ॥
अङ्क ] * नम्र निवेदन एवं क्षमा-प्रार्थना * ६४१ नम्र निवेदन एवं क्षमा-प्रार्थना
एक या अधिक महापुराण उपलब्ध ही हैं। गणेशजीपर भी २१००० श्लोकीय गणेश-भागवतके विषयमें सुना जाता है, परंतु दुर्भाग्यवश अबतक उसकी कोई प्रति मिल नहीं सकी है। अन्यान्य महापुराणोंके अन्तर्गत भी गणपति- केन्द्रित खण्ड कहे जाते हैं, यथा- ब्रह्मवैवर्तपुराणका गणपतिखण्ड, वामनपुराणकी सहस्रश्लोकी गाणेश्वरी- संहिता इत्यादि। इनमेंसे केवल गणपतिखण्ड ही प्राप्त है। इस परिप्रेक्ष्यमें गाणपत्य-सम्प्रदाय एवं अन्य गणेशभक्तोंमें गणेशपुराणका महत्त्व सर्वोपरि है। सभी एक मतसे गणेशोपपुराणको महापुराणके समान महत्त्व एवं आदर देते हैं। इसके प्रमाण भी धर्मशास्त्रमें यत्र-तत्र ससम्मान उद्धृत किये जाते रहे हैं। गणेशजीपर मुद्गलपुराण नामक एक अन्य उपपुराण भी प्राप्त है, परंतु गणेशपुराणकी प्रसिद्धि अपेक्षाकृत अधिक है।
गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम् । उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम्॥
गणेशपुराणमें ११००० से अधिक श्लोक हैं, जो दो खण्डोंमें विभाजित हैं—प्रथम उपासनाखण्ड तथा दूसरा क्रीड़ाखण्ड। उल्लेखनीय है कि कुछ महापुराण भी परिमाणमें प्रायः गणेशपुराणके बराबर ही हैं। सुप्रसिद्ध गणेशगीता भी इसी 'गणेशपुराण' के क्रीड़ाखण्डके अन्तर्गत समाहित है।
'जो हाथीके समान मुखवाले हैं, भूतगणादिसे सदा सेवित रहते हैं, कैथ तथा जामुन फल जिनके लिये प्रिय भोज्य हैं, पार्वतीके पुत्र हैं तथा जो प्राणियोंके शोकका विनाश करनेवाले हैं, उन विघ्नेश्वरके चरणकमलोंमें नमस्कार करता हूँ।'
आर्ष वाङ्मयमें वेदका सर्वोपरि स्थान है, परंतु वेदोंमें उन्हींका अधिकार है, जिनका उपनयन हुआ हो। इस दृष्टिसे स्त्री, अनुपनीत व्यक्ति तथा अन्य वर्णोंके कल्याणहेतु पुराण-साहित्यका आश्रयण सर्वथा निरापद एवं कल्याणकारी है। वस्तुतः पुराणोंमें सर्वसामान्य एवं विद्वान्—सभीके लिये वेदोक्त ज्ञानका ही उपबृंहण सरल-सुबोध भाषा- शैलीमें किया गया है। स्मार्त-परम्परामें पंचदेवोपासनाके अन्तर्गत—गणेश, शिव, शक्ति, विष्णु एवं सूर्यकी गणना होती है। भगवान्के अन्यान्य स्वरूप एवं अवतार आदि इन्हींके अन्तर्गत आ जाते हैं। इनमेंसे प्रत्येकपर केन्द्रित
'गणेशपुराण' के आदिवक्ता पितामह ब्रह्माजी हैं, जिसे उन्होंने सर्वप्रथम महर्षि व्यासको सुनाया। भगवान् व्याससे इसे महर्षि भृगुने प्राप्त किया, तदनन्तर भृगुमुनिने कृपापूर्वक इसे सौराष्ट्रदेशके सोमकान्त नामक एक धर्मपरायण राजाको प्रदान किया, जिसके प्रभावसे वे धर्मात्मा नरेश दुर्भाग्यवश प्राप्त हुए गलितकुष्ठरूपी महान् क्लेशसे सर्वथा मुक्त होकर निर्मल एवं आनन्दित हो गये थे। वस्तुतः गणेशपुराणकी कथा अत्यन्त दिव्य एवं पुरुषार्थचतुष्टयकी सिद्धि प्रदान करनेमें सर्वथा समर्थ है। इन्हीं सब दृष्टियोंसे इस पुराणके विशेषाङ्कके रूपमें प्रकाशनकी योजना बनी थी। भगवान् गणेशकी कृपासे यह आप महानुभावोंके समक्ष प्रस्तुत है। प्रारम्भमें यह योजना थी कि इस पुराणको मूल