श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 625, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०१४८ ] * तप, दान, ज्ञान आदि एवं गणेशगीताकी महिमा * ६२३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 कर्मोंका न करना, वेद, भक्त, देवता, मुनि, श्रोत्रिय, | मुझमें भक्ति होना दुर्लभ है ॥ १५ ॥ ब्राह्मण तथा स्मृति और पुराणकी निन्दा करना, पाखण्ड- | मूर्ख लोग मोहजाल तथा अपने कर्मोंसे बन्धनमें वाक्योंमें विश्वास, दुष्टों तथा मलिन पुरुषोंकी संगति | पड़ते हैं, वे मैं ही हन्ता, मैं ही कर्ता, मैं ही भोक्ता हूँ— करना ॥ ५-८ ॥ | ऐसा कहा करते हैं। मैं ही ईश्वर, मैं शासक, मैं पाखण्डसहित कर्म करना, दूसरेकी वस्तुओंको | जाननेवाला, मैं सुखी हूँ—इस प्रकारकी मति मनुष्योंको पानेकी इच्छा, अनेक कामनाओंसे युक्त होना, सदा | नरकमें ले जाती है ॥ १६-१७ ॥ झूठ बोलना, दूसरेका उत्कर्ष न सहना, दूसरेके कृत्यको | इस कारण तुम इस (तामसी प्रकृति)-को छोड़कर नष्ट करना इत्यादि बहुत सारे दूसरे भी राक्षसी प्रकृतिके | दैवी प्रकृतिका आश्रय करो और दृढ़ चित्तसे मेरी निरन्तर गुण हैं ॥ ९-१० ॥ | भक्ति करो ॥ १८ ॥ पृथ्वी और स्वर्गलोकमें ये सब गुण रहते हैं। जो | हे राजन्! वह भक्ति भी सात्त्विकी, राजसी और लोग मेरी भक्तिसे रहित हैं, वे ही राक्षसी प्रकृतिको प्राप्त | तामसी—इन भेदोंसे तीन प्रकारकी है। जिस भक्तिसे होते हैं। हे राजन्! जो इस तामसी प्रकृतिका आश्रय लेते | देवताओंका भजन किया जाता है, वह कल्याणकारिणी हैं, वे रौरव नरकको प्राप्त होते हैं और वहाँ अकथनीय | सात्त्विकी भक्ति कही गयी है। जन्म-मृत्यु देनेवाली दुःखको भोगते हैं ॥ ११-१२ ॥ | भक्ति राजसी कही गयी है, जिसमें सर्वभावसे यक्ष और हे राजन्! वे तमोगुणी लोग दैववश नरकसे | राक्षसोंकी ही पूजा होती है ॥ १९-२० ॥ निकलकर भूलोकमें हीन जातियोंमें जन्मान्ध, पंगु, कुबड़े | जो लोग वेदविधानसे रहित, क्रूरता, अहंकार तथा और दीन होकर जन्म लेते हैं ॥ १३ ॥ | दम्भसहित हैं, जो प्रेतभूतादिकोंको भजते हैं और कामुक पापाचरणवाले तथा मुझमें भक्ति न करनेवाले | कर्म करते हैं तथा दुराग्रहपूर्वक अपने शरीर और उसमें पतित होते हैं, परंतु मेरे भक्त चाहे किसी भी योनिमें जन्म | स्थित मुझे भी क्लेश पहुँचाते हैं, उनकी यह तामसी लें, नष्ट नहीं होते, उनका उद्धार हो जाता है ॥ १४ ॥ | भक्ति नरक देनेवाली है ॥ २१-२२ ॥ हे राजन्! यज्ञसे अथवा दूसरे कर्मोंसे स्वर्गकी | काम, लोभ, क्रोध, दम्भ—ये नरकके चार महाद्वार प्राप्ति होती है, जो सकाम पुरुषोंको सुलभ है, परंतु | हैं, इस कारण इनको त्यागना चाहिये ॥ २३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'योगोपदेशवर्णन' नामक एक सौ सैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४७ ॥ एक सौ अड़तालीसवाँ अध्याय तप, दान, ज्ञान, कर्म, कर्ता, सुख-दुःख, ब्रह्म एवं वर्णानुसार कर्मोंके भेद तथा गणेशगीताकी महिमा श्रीगणेशजी बोले—हे राजन्! कायिक, वाचिक | अन्तःकरणमें प्रसन्नता, शान्ति, मौन, जितेन्द्रियता, और मानसिक—इन तीन भेदोंसे तप भी तीन प्रकारका | सदा निर्मल भाव रखना—यह मानसिक तप है ॥ ४ ॥ है। ऋजुता, आर्जव, पवित्रता, ब्रह्मचर्य, अहिंसा, गुरु- | निष्काम भाव और श्रद्धासे जो तप किया जाता है, पण्डित-ब्राह्मण एवं देवताका पूजन करना तथा नित्य | वह सात्त्विक है। ऐश्वर्य और सत्कार-पूजाके निमित्त स्वधर्मका पालन करना—यह कायिक तप है ॥ १-२ ॥ | तथा दम्भसहित जो तप किया जाता है, वह राजसी तप जो मर्मस्पर्शी न हों, ऐसे प्रिय वचन बोलना, | है। राजसी तप निश्चय ही जन्म-मृत्यु और अस्थिरताको उद्वेगरहित, हितकारी और सत्य भाषण करना, वेद- | देनेवाला है। जिसमें दूसरेको तथा अपनेको पीड़ा हो, वह शास्त्रोंका पढ़ना—यह वाचिक तप है ॥ ३ ॥ | तामस तप कहा गया है ॥ ५-६ ॥