श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 626, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें६२४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
[बायाँ स्तम्भ] विधियुक्त, उत्तम देश-कालमें सत्पात्रको श्रद्धापूर्वक जो दान दिया जाता है, वह सात्त्विक दान कहा गया है। उपकार या फलकी कामनासे मनुष्य जो दान करते हैं तथा ऐसा दान जो क्लेशपूर्वक अथवा भक्तिके कारण दिया जाय, वह राजसी दान कहलाता है॥७-८॥ जो देश-कालरहित, अपात्रमें अवज्ञापूर्वक दिया जाता है और जो दान अपमानपूर्वक दिया जाता है, वह तमोगुणी दान कहा गया है। हे राजन्! मन लगाकर सुनो, ज्ञान भी तीन प्रकारका है, कर्म और कर्ता भी तीन प्रकारके हैं, वह मैं प्रसंगसे कहता हूँ॥९-१०॥ जो अनेक प्रकारके प्राणियोंमें एक मुझको ही देखता है तथा नाशवान् भूतोंमें मुझ नित्यको जानता है, हे राजन्! वह सात्त्विक ज्ञान है। जो उन अनेक भूतोंसे मुझे पृथक् स्वरूपवाला और अव्यय जानते हैं, इस ज्ञानका नाम राजस है॥ ११-१२ ॥ हेतुरहित, असत्य तथा देह और मनके सुखके लिये असत् और अल्प अर्थयुक्त विषयोंमें लगना—इस ज्ञानका नाम तामस है। हे राजन्! सत्, रज, तम—इन भेदोंसे कर्म भी तीन प्रकारका है, जिसे मैं बताता हूँ; सुनो, कामना, द्वेष और दम्भसे रहित जो नित्य कर्म है और फलकी इच्छासे रहित जो कर्म किया जाता है, वह सात्त्विक कहलाता है॥ १३-१४॥ जो बहुत क्लेशपूर्वक तथा फलकी इच्छासे किया गया है और जिसको मनुष्य दम्भपूर्वक करते हैं, वह राजस कर्म कहलाता है और जो अपनी शक्तिके बाहर तथा अर्थका क्षय करनेवाला कर्म अज्ञानपूर्वक किया जाता है, वह तामस कर्म कहा गया है॥ १५-१६॥ इसी प्रकार हे राजन्! तीन प्रकारके कर्ता होते हैं, जिन्हें मैं बताता हूँ। हे राजन्! धैर्य और उत्साहयुक्त, सिद्धि-असिद्धिमें समान दृष्टिवाला, विकार और अहंकारसे रहित सात्त्विक कर्ता कहलाता है॥ १७-१८॥ जो हर्ष-शोकसहित कर्म करता है, हिंसामें प्रवृत्ति और फलकी इच्छा रखता है, जिसमें अपवित्रता और लोभ है, वह राजसी कर्ता कहा जाता है। प्रमाद और अज्ञानयुक्त, दूसरोंका नाश करनेवाला, दुष्ट, आलसी और जो कुतर्क करनेवाला है, वह तामसी कर्ता कहा
[दायाँ स्तम्भ] जाता है। हे राजन्! इसी प्रकार सुख-दुःख भी तीन प्रकारके हैं, वह तुम क्रमसे सुनो, इनके भी सात्त्विक, राजस, तामस भेद हैं, उन्हें मैं कहता हूँ॥ १९–२१ ॥ जो पहले तो विषके समान प्रतीत हो, किंतु दुःखका अन्त करनेवाला हो और परमार्थोन्मुख बुद्धिसे जिसकी कामना की जाती हो, जो अन्तमें अमृतके समान हो तथा जो अपनी बुद्धिको आनन्द देनेवाला हो, वह सात्त्विक सुख कहा गया है। विषयोंका जो सुख प्रथम तो अमृतके समान विदित हो और अन्तमें विषके समान फल दे, उसे राजसी सुख कहते हैं॥ २२-२३॥ जो तन्द्रा तथा प्रमादसे उत्पन्न हुआ हो, आलस्यसे भरा हुआ हो तथा अपनेमें सदा मोह उत्पन्न करता हो, उसका नाम तामसी सुख है। ऐसा कोई भी प्राणी नहीं है, जो इन तीनों गुणोंसे मुक्त हो॥ २४-२५॥ हे राजन्! ब्रह्म भी ओम्, तत्, सत्—इस भेदसे तीन प्रकारका है और हे राजन्! इस त्रिलोकीमें सब कुछ तीन होकर ही व्याप्त हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र— ये स्वभावसे ही भिन्न कर्म करनेवाले हैं, इनके कर्म संक्षेपसे मैं तुमसे कहता हूँ॥ २६-२७॥ बाह्य और अन्तः इन्द्रियोंको वशमें करना, सरलता, क्षमा, अनेक प्रकारके तप, पवित्रता, दोनों प्रकार (अन्वय- व्यतिरेक)-से आत्माका ज्ञान, वेद, शास्त्र, पुराण और स्मृतियोंका ज्ञान होना तथा उनके अर्थोंका अनुष्ठान करना—ये ब्राह्मणके कर्म हैं॥ २८-२९॥ दृढ़ता, शूरता, चतुरता, युद्धसे पलायन न करना, शरणागतकी रक्षा, दान, धैर्य, स्वाभाविक तेज, प्रभुता, मनकी उदारता, अच्छी नीति, लोकपालन (तथा राज्यपालन)-के पाँच कर्मोंमें अधिकार—ये क्षत्रियोंके स्वाभाविक कर्म हैं। अनेक प्रकारकी वस्तुओंका क्रय- विक्रय, पृथ्वीकर्षण अर्थात् खेती आदि करना, गायोंकी रक्षा करना—ये तीन प्रकारके वैश्यके कर्म कहे गये हैं। हे राजन्! दान, ब्राह्मणोंकी सेवा तथा सदा शिवजीकी उपासना—यह शूद्रोंका कर्म कहा गया है॥ ३०-३३॥ हे राजन्! ये सब वर्ण अपने-अपने कर्म यथावत् करते हुए और सम्पूर्ण कर्म मुझे अर्पण करते हुए मेरी कृपासे निश्चल परम स्थानको प्राप्त करते हैं॥ ३४॥