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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

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पृष्ठ 627

क्री०ख०-अ०१४९] * ब्रह्माजीके द्वारा व्यासदेवकी जिज्ञासाका समाधान * ६२५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 प्रिय राजन् ! इस प्रकार तुम्हारे स्नेहसे मैंने अंग- उपांगसहित विस्तारपूर्वक अनादिसिद्ध योगका वर्णन किया, यह योग परमोत्तम है ॥ ३५ ॥ हे राजन् ! मेरे द्वारा कहे गये इस योगको धारण करो और किसीसे इसे मत कहो, तुम इसे गुप्त रखोगे तो परम उत्तम सिद्धिको प्राप्त करोगे ॥ ३६ ॥ व्यासजी बोले—इस प्रकार प्रसन्नचित्त महात्मा गणेशजीके वचन सुनकर राजा वरेण्यने उनके वचनके अनुसार आचरण किया। राज्य और कुटुम्बको त्यागकर वेगसे वे वनको चले गये और उपदेश किये गये योगमें स्थित होकर मुक्त हो गये ॥ ३७-३८ ॥ इस महागुप्त योगका जो कोई श्रद्धासे श्रवण करता है, वह भी मुक्तिको प्राप्त हो जाता है; क्योंकि वह भी योगीके समान ही होता है। जो बुद्धिमान् इस योगके तात्पर्यको भलीभाँति अधिगत करके दूसरोंको सुनाता है, वह भी योगीके समान मुक्त हो जाता है ॥ ३९-४० ॥ जो इस गीताका भलीप्रकार अभ्यासकर तथा गुरुमुखसे इसका अर्थ जानकर गणेशजीकी पूजाकर प्रतिदिन एक काल, दो काल अथवा तीनों कालोंमें पाठ करता है, वह ब्रह्मस्वरूपको प्राप्त हो जाता है और उसके दर्शनसे भी मनुष्य मुक्त हो जाता है ॥ ४१-४२ ॥ न यज्ञ, न व्रत, न दान, न अग्निहोत्र, न महाधन (प्रचुर धनव्ययसे साध्य शास्त्रीय अनुष्ठान), न सांगोपांग वेदोंके उत्तम ज्ञान और अभ्यास, न पुराणोंके श्रवण, न भलीभाँति चिन्तन किये हुए शास्त्रोंसे भी ऐसे ब्रह्मकी प्राप्ति होती है, जैसे इस गीतासे मनुष्योंको प्राप्त होती है ॥ ४३-४४ ॥ ब्रह्महत्यारा, मद्यपी, चोर, गुरुदारगामी तथा इन चारों महापाप करनेवालोंका साथ करनेवाले और स्त्रीहिंसा, गोवध आदि करनेवाले पापी भी इस गीताको पढ़नेसे पापमुक्त हो जाते हैं। जो नियमसे इसे नित्य पढ़ता है, वह निःसन्देह श्रीगणेशस्वरूप हो जाता है और जो चतुर्थीके दिन इसे भक्तिसे पढ़ता है, वह भी मुक्त हो जाता है ॥ ४५-४७ ॥ उन-उन पुण्यक्षेत्रोंमें जाकर स्नान करके गणेशजीका पूजनकर एक बार भी भक्तिपूर्वक इस गीताका पाठ करनेवाला ब्रह्मस्वरूपको प्राप्त हो जाता है ॥ ४८ ॥ भाद्रपदमासके शुक्लपक्षमें चतुर्थीके दिन भक्तिपूर्वक वाहन और आयुधसहित श्रीगणेशकी मृत्तिकाकी चतुर्भुज मूर्ति बनाकर विधिपूर्वक पूजन करके जो यत्नपूर्वक सात बार इस गणेशगीताका पाठ करता है, उसपर सन्तुष्ट होकर गणेशजी पुत्र, पौत्र, धन-धान्य, पशु, रत्नादि सम्पत्ति और उत्तम भोग उसे प्रदान करते हैं ॥ ४९-५१ ॥ विद्यार्थीको विद्या, सुखार्थीको सुख, कामार्थीको नानाविध कामोंकी प्राप्ति होती है और अन्तमें वे मुक्तिको प्राप्त होते हैं। इस प्रकार मैंने आपको समस्त [गीतोपदेश] बताया है, अब और क्या सुनना चाहते हैं? ॥ ५२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'त्रिविध वस्तुविवेकनिरूपण' नामक एक सौ अड़तालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४८ ॥

एक सौ उनचासवाँ अध्याय ब्रह्माजीके द्वारा व्यासदेवकी जिज्ञासाका समाधान, कलियुगवर्णन एवं कलियुगके अन्तमें गणपतिता अवतीर्ण होकर धर्म-संस्थापन

ब्रह्माजी बोले-इस प्रकारसे [देवताओं, ऋषियों तथा राजाओंसे] पूजित होकर विभु गजानन उस राजपूजित सदन (राजसदन नामक स्थान)-में भक्तोंकी कामनाओंको पूर्ण करते हुए निवास करने लगे ॥ १ ॥ मुनिने कहा-हे देव! आपने विनायकके महिमावर्णनके प्रसंगमें विभिन्न प्रकारके कथानकोंका निरूपण किया है। उन्होंने वरेण्यके भवनमें अवतीर्ण होकर विघ्नासुर अर्थात् सिन्दूरासुरका वध किया। हे चतुरानन ! गजाननकी गजमुख-प्राप्तिका आपने वर्णन किया और इसी प्रसंगमें पार्वतीजीके गर्भसे गजाननरूपसे गणपतिके आविर्भावका भी आपने निरूपण किया है। इसके कारण मैं सन्देहमें पड़ गया हूँ। आपके अतिरिक्त