गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] भुवनकोश-वर्णनमें सूर्य तथा चन्द्र आदि नौ ग्रहोंके रथोंका विवरण ९७
स्वादिष्ट जलवाले समुद्रके सामने उससे द्विगुण जनजीवनसे रहित स्वर्णमयी भूमिवाली जगत्की स्थिति दिखायी देती है। वहाँपर दस हजार योजनमें फैला हुआ लोकालोक नामक पर्वत है। वह अन्धकारसे आच्छादित है और वह अन्धकार भी अण्डकटाहसे आवृत है।
श्रीहरिने कहा—हे वृषभध्वज ! इस भूमिकी ऊँचाई सत्तर हजार योजन है। इसमें दस-दस सहस्र योजनकी दूरीपर एक-एक पाताललोक स्थित हैं, जिन्हें अतल, वितल, नितल, गभस्तिमान्, महातल, सुतल तथा पाताल कहा जाता है।
इन लोकोंकी भूमि कृष्ण, शुक्ल, अरुण, पीत, शर्करा-सदृश, शैलमयी तथा स्वर्णमयी है। वहाँपर दैत्य तथा नागोंका निवास है। हे रुद्र! दारुण पुष्करद्वीपमें जो नरक स्थित हैं, उनके विषयमें आप सुनें। वहाँ रौरव, सूकर, रोध, ताल, विशसन, महाज्वाल, तप्तकुम्भ, लवण, विमोहित, रुधिर, वैतरणी, कृमिश, कृमिभोजन, असिपत्रवन, कृष्ण, नानाभक्ष (लालाभक्ष), दारुण, पूयवह, पाप, वह्निज्वाल, अधःशिरा, संदंश, कृष्णसूत्र, तमस्, अवीचि, श्वभोजन, अप्रतिष्ठ तथा उष्णवीचि नामक नरक हैं। उनमें विष देनेवाले, शस्त्रसे हत्या करनेवाले तथा अग्निसे जलाकर मारनेवाले पापीजन अपने-अपने पापका फलभोग करते हैं।
हे रुद्र! यथाक्रम उनके ऊपर अन्य लोकोंकी स्थिति है। उन लोकोंको क्रमशः—जल, अग्नि, वायु तथा आकाश घेरे हुए है। इस प्रकार अवस्थित ब्रह्माण्ड प्रधान तत्त्वसे आवेष्टित है। वह ब्रह्माण्ड अन्य ब्रह्माण्डोंकी अपेक्षा दस गुना अधिक है। इसे परिव्याप्तकर स्वयं नारायण अवस्थित रहते हैं।
(अध्याय ५६-५७)
भुवनकोश-वर्णनमें सूर्य तथा चन्द्र आदि नौ ग्रहोंके रथोंका विवरण
श्रीहरिने कहा—हे वृषभध्वज ! अब मैं सूर्यादि ग्रहोंकी स्थिति एवं उनके परिमाणसे सम्बन्धित विषयका वर्णन कर रहा हूँ।
सूर्यदेवके रथका विस्तार नौ हजार योजन है। उसका ईषादण्ड अर्थात् जुआ तथा रथके बीचका जो भाग है, वह उस रथ-विस्तारका दुगुना है। उसकी धुरी एक करोड़ सत्तावन लाख योजन लम्बी है तथा उसमें चक्र लगा हुआ है। उस चक्रकी (पूर्वाह्न, मध्याह्न तथा अपराह्नरूप) तीन नाभियाँ हैं, (परिवत्सरादिक) पाँच अरे हैं, (वसन्तादि षड्ऋतुरूपी) छः नेमियाँ हैं तथा अक्षयस्वरूपवाले संवत्सरसे युक्त उस चक्रमें सम्पूर्ण कालचक्र सन्निहित है। सूर्यके रथकी दूसरी धुरी चालीस हजार योजन लम्बी है।
हे वृषभध्वज! रथके जो पहियोंके अक्ष हैं, वे साढ़े पाँच हजार योजन लम्बे हैं। रथके कहे गये प्रधान दोनों अक्षोंके परिमाणके समान जुएके दोनों अर्द्धोंकी लम्बाई है। सबसे छोटा अक्ष जुएके अर्द्धभाग-परिमाणवाला है, जो रथके ध्रुवाधारपर अवस्थित है। रथके दूसरे अक्षमें चक्र लगा हुआ है, जो मानसोत्तर पर्वतपर स्थित है।
गायत्री, बृहती, उष्णिक्, जगती, त्रिष्टुप्, अनुष्टुप् तथा पंक्ति नामक—ये सात छन्द ही सूर्यके सात घोड़े कहे गये हैं।
चैत्रमासमें सूर्यके इस रथपर धाता नामक आदित्य, क्रतुस्थला नामक अप्सरा, पुलस्त्य