भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

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९८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

ऋषि, वासुकि नाग, रथकृत् ग्रामणी, हेति नामका राक्षस और तुम्बुरु गन्धर्व स्थित रहते हैं। वैशाखमासमें इस रथपर अर्यमा नामवाले आदित्य, पुलह ऋषि, रथौजा यक्ष, पुञ्जिकस्थला अप्सरा, प्रहेति राक्षस, कच्छनीर सर्प तथा नारद नामक गन्धर्व आसीन रहते हैं। ज्येष्ठमासमें सूर्यके इस रथमें मित्र नामक आदित्य, अत्रि ऋषि, तक्षक नाग, पौरुषेय राक्षस, मेनका अप्सरा, हाहा नामक गन्धर्व और रथस्वन यक्षका वास रहता है।

आषाढ़मासमें इस रथके ऊपर वरुण नामसे प्रसिद्ध आदित्य, वसिष्ठ ऋषि, रम्भा तथा सहजन्या नामक अप्सरा, हूहू गन्धर्व, रथचित्र नामक यक्ष एवं राक्षसगुरु शुक्र निवास करते हैं। श्रावणमासमें इस रथपर इन्द्र नामसे विख्यात आदित्य, विश्वावसु गन्धर्व, स्रोत नामक यक्ष, एलापत्र सर्प, अङ्गिरा ऋषि, प्रम्लोचा अप्सरा और सर्प नामक राक्षसोंका निवास रहता है। भाद्रपदमासमें विवस्वान् नामक आदित्य, उग्रसेन गन्धर्व, भृगु ऋषि, आपूरण नामक यक्ष, अनुम्लोचा नामक अप्सरा, शंखपाल नामक सर्प तथा व्याघ्र राक्षसका सूर्य-रथमें निवास रहता है।

आश्विनमासमें इस रथपर पूषा नामक आदित्य, सुरुचि नामक गन्धर्व, धाता एवं गौतम ऋषि, धनञ्जय नाग, सुषेण तथा घृताची अप्सराका वास होता है। कार्तिकमासमें पर्जन्य नामके आदित्य, विश्वावसु गन्धर्व, भरद्वाज ऋषि, ऐरावत सर्प, विश्वाची अप्सरा, सेनजित् यक्ष एवं आप नामक राक्षसका निवास उस रथपर रहता है। मार्गशीर्षमासमें अंशु नामक आदित्य, कश्यप ऋषि, तार्क्ष्य, महापद्म नाग, उर्वशी अप्सरा, चित्रसेन गन्धर्व और विद्युत् नामक राक्षस उस रथमें संचरण करते हैं।

पौषमासमें भर्ग नामके आदित्य, क्रतु ऋषि, ऊर्णायु गन्धर्व, स्फूर्ज राक्षस, कर्कोटक नाग, अरिष्टनेमि यक्ष तथा पूर्वचित्ति नामक अप्सरा सूर्यमण्डलमें निवास करते हैं। माघमासमें त्वष्टा नामक आदित्य, जमदग्नि ऋषि, कम्बल सर्प, तिलोत्तमा अप्सरा, ब्रह्मापेत राक्षस, ऋतजित् यक्ष और धृतराष्ट्र नामक गन्धर्व सूर्यमण्डलमें रहते हैं। फाल्गुनमासमें विष्णु नामक आदित्य, अश्वतर सर्प, रम्भा अप्सरा, सूर्यवर्चा गन्धर्व, सत्यजित् यक्ष, विश्वामित्र ऋषि और यज्ञापेत राक्षसका उस रथमें वास रहता है।

हे ब्रह्मन्! भगवान् विष्णुकी शक्तिसे तेजोमय बने मुनिगण सूर्यमण्डलके सामने उपस्थित रहकर उनकी स्तुति करते हैं, गन्धर्वजन यशोगान करते हैं। अप्सराएँ नृत्य करती हैं। राक्षस उस रथके पीछे-पीछे चलते हैं। सर्प उस रथको वहन करते हैं और यक्षगण उसकी बागडोर सँभालनेका कार्य करते हैं। बाल्यखिल्य नामक ऋषिगण उस रथको सब ओरसे घेरकर स्थित रहते हैं।

चन्द्रमाका रथ तीन पहियोंवाला है। उसके घोड़े कुन्द-पुष्पके समान श्वेतवर्णवाले हैं। वे रथके जुएमें बायें और दाहिने दोनों ओर जुतकर उसे खींचते हैं। उनकी संख्या दस है।

चन्द्रमाके पुत्र बुधका रथ जल तथा अग्निसे मिश्रित द्रव्यका बना हुआ है। उसमें वायुके समान वेगशाली पिशंग (भूरे) वर्णके आठ घोड़े जुते रहते हैं।

शुक्रका महान् रथ सैन्यबलसे युक्त, अनुकर्ष (रथको सुदृढ बनानेके लिये सम्पन्न रथके नीचे लगा काष्ठविशेष), ऊँचे शिखरवाला, पृथिवीपर उत्पन्न होनेवाले घोड़ोंसे संयुक्त, उपासङ्ग (तरकश) तथा ऊँची पताकासे विभूषित है।

भूमिपुत्र मंगलका महान् रथ तपाये गये स्वर्णके सदृश काञ्चन वर्णवाला है। उसमें आठ घोड़े लगे रहते हैं, जो अग्निसे प्रादुर्भूत हैं तथा पद्मरागमणिके समान अरुण वर्णके हैं।