गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| महिमा एवं सपिण्डीकरण-श्राद्धका स्वरूप ...... | ५६० | २६१- दुःखी गर्भस्थ जीवका विविध प्रकारका चिन्तन करना, यमयातनाग्रस्त जीवका सदा सुकृत करनेका उपदेश देना .................................... | ५९१ |
| २४८- सपिण्डीकरण-श्राद्धमें प्रेतपिण्डके मेलनका विधान, पितरोंकी प्रसन्नताका फल, पञ्चक-मरण तथा शान्तिविधान, पुत्तलिकादाह, प्रेत-श्राद्धमें त्याज्य अठारह पदार्थ, मलिनषोडशी, मध्यमषोडशी तथा उत्तमषोडशी श्राद्ध, शवयात्रा-विधान ................................................ | ५६८ | २६२- भगवान् विष्णुद्वारा गरुडको दिये गये महत्त्वपूर्ण उपदेश, मनुष्ययोनि-प्राप्तिकी दुर्लभताका वर्णन, मनुष्य-शरीर प्राप्तकर आत्मकल्याणके लिये सचेष्ट रहना, संसारकी दुःखरूपता तथा अनित्यता और ईश्वरकी नित्यताका वर्णन, कालके द्वारा सभीके विनाशका प्रतिपादन, सत्संग और विवेकज्ञानसे मोक्षकी प्राप्ति, तत्त्वज्ञानरूपी मोक्षप्राप्तिके उपाय, गरुडपुराणकी वक्तृ-श्रोतृपरम्परा तथा गरुडपुराणका माहात्म्य ................................. | ५९४ |
| २४९- तीर्थमरण एवं अनशनव्रतका माहात्म्य, आतुरावस्थाके दानका फल, धनकी एकमात्र गति दान तथा दानकी महिमा ...................... | ५७१ | <div align="center">ब्रह्मकाण्ड</div><br>२६३- भगवान् श्रीहरिकी महिमा तथा उनके सर्वेश्वरत्वका प्रतिपादन, श्रीहरिको श्रीमद्भागवत, विष्णु तथा गरुड—ये तीन पुराण विशेष प्रिय हैं, इनका निरूपण तथा गरुडपुराणका माहात्म्य ........................... | <br><br><br>६०३ |
| २५०- और्ध्वदेहिक कर्ममें उदकुम्भदानका माहात्म्य .... | ५७३ | २६४- गरुडजीको श्रीकृष्णद्वारा भगवान् विष्णुकी महिमा बताना तथा प्रलयकालके अन्तमें योगनिद्रामें शयन कर रहे उन भगवान् विष्णुको सृष्टि-हेतु अनेक प्रकारकी स्तुति करते हुए जगाना .......... | ६०४ |
| २५१- तीर्थमरणकी महिमा, अन्त समयमें भगवन्नामकी महिमा, शालग्रामशिला तथा तुलसीकी संनिधिमें मरणका फल, मुक्तिदायक तथा स्वर्गदायक प्रशस्त कर्म, इष्टापूर्तकर्म तथा अनाथ प्रेतके संस्कारका माहात्म्य .................................... | ५७४ | २६५- नारायणसे सृष्टिका प्रादुर्भाव तथा तत्त्वाभिमानी देवोंका प्राकट्य ........................................... | ६०६ |
| २५२- आशौचकी व्यवस्था ...................................... | ५७६ | २६६- देवताओंद्वारा नारायणकी स्तुति....................... | ६०८ |
| २५३- दुर्मृत्यु होनेपर सद्गतिलाभके लिये नारायण-बलिका विधान ........................................... | ५७८ | २६७- नारायणसे प्राकृत तथा वैकृत सृष्टिका विस्तार .... | ६१३ |
| २५४- वृषोत्सर्गकी संक्षिप्त विधि ............................... | ५८० | २६८- नारायणकी पूर्णताका वर्णन तथा पदार्थोंके सारासारका निर्णय ......................................... | ६१५ |
| २५५- भूमि तथा गोचर्म भूमि आदि दानोंका माहात्म्य और ब्रह्मस्वहरणका दोष ................................... | ५८१ | २६९- परमात्मा हरि तथा देवी महालक्ष्मीके विभिन्न अवतारोंका वर्णन ........................................... | ६१६ |
| २५६- शुद्धि-विधान .............................................. | ५८२ | २७०- भगवान् शेष तथा भगवान् रुद्रके विविध अवतार | ६१७ |
| २५७- दुर्मृत्यु तथा अकालमृत्युपर किये जानेवाले श्राद्धादि कर्म और सर्पदंशसे मृत्युपर विहित क्रिया-विधान ................................................ | ५८२ | २७१- श्रीकृष्णपत्नी देवी नीला (नाग्नजिती)-की कथा ... | ६१७ |
| २५८- पार्वण आदि श्राद्धोंके अधिकारी, एकसे अधिककी मृत्युपर पिण्डदान आदिकी व्यवस्था; मृत्युतिथि-मासके अज्ञात होनेपर तथा प्रवासकालमें मृत्यु होनेपर श्राद्ध आदिकी व्यवस्था; नित्य एवं दैव तथा वृद्धि आदि श्राद्धोंकी कर्तव्यताका प्रतिपादन . | ५८४ | २७२- भद्रा तथा मित्रविन्दाद्वारा श्रीकृष्णकी भार्या बननेकी कथा ................................................. | ६१९ |
| २५९- सत्कर्मकी महिमा तथा कर्मविपाकका फल ... | ५८६ | २७३- सूर्यपुत्री कालिन्दीकी कथा .............................. | ६२१ |
| २६०- यममार्गमें स्थित वैतरणी नदीका वर्णन, पाप-कर्मोंसे घोर वैतरणीमें निवास, वैतरणीसे पार होनेके लिये वैतरणी-धेनुदान, भगवान् विष्णु, गङ्गा तथा ब्राह्मणकी महिमा ........................... | ५८८ | २७४- लक्ष्मणाद्वारा भगवान् श्रीकृष्णको प्राप्त करनेकी कथा<br>२७५- सोमपुत्री जाम्बवतीकी कथा ............................ | ६२२<br>६२२ |