गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १०० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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तिथिमें कौमारी नामवाली योगिनीका निवास नैर्ऋत्यकोणमें रहता है। योगिनीके सम्मुख रहनेपर यात्रा नहीं करनी चाहिये।
अश्विनी, अनुराधा, रेवती, मृगशिरा, मूल, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त और ज्येष्ठा नक्षत्र प्रस्थान (यात्रा)-के लिये प्रशस्त कहे गये हैं।
हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा—ये पाँच नक्षत्र तथा उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ, उत्तराभाद्रपद, अश्विनी, रोहिणी, पुष्य, धनिष्ठा और पुनर्वसु नक्षत्र नवीन वस्त्र धारण करनेके लिये श्रेष्ठ हैं।
कृत्तिका, भरणी, अश्लेषा, मघा, मूल, विशाखा तथा पूर्वाभाद्रपद, पूर्वाषाढ और पूर्वाफाल्गुनी—इन नक्षत्रोंको अधोमुखी कहा गया है। इन अधोमुखी नक्षत्रोंमें वापी, तडाग, सरोवर, कूप, भूमि, तृण आदिका खनन, देवालयके लिये नींवआदिके खननका शुभारम्भ, भूमि आदिमें गड़ी हुई धन-सम्पत्तिकी खुदाई, ज्योतिश्चक्रका गणनारम्भ और सुवर्ण, रजत, पन्ना तथा अन्य धातुओंको प्राप्त करनेके लिये भू-खदानोंमें प्रविष्ट होना आदि अन्य अधोमुखी कार्य इन अधोमुखी नक्षत्रोंमें करने चाहिये। रेवती, अश्विनी, चित्रा, स्वाती, हस्त, पुनर्वसु, अनुराधा, मृगशिरा एवं ज्येष्ठा नक्षत्र पार्श्वमुखी हैं। इन पार्श्वमुखी नक्षत्रोंमें हाथी, ऊँट, अश्व, बैल तथा भैंसेको वशमें करनेका उपाय करना चाहिये। (अर्थात् इनके नाक आदिमें छेद करके छल्ला या रस्सी डालनेका कार्य करना चाहिये।)
खेतोंमें बीज बोना, गमनागमन, चक्रयन्त्र (चरखी, चरसा, रहट आदि यन्त्र) अथवा रथ एवं नौकादिका क्रय और निर्माण उक्त पार्श्वमुखी नक्षत्रोंमें करना चाहिये और अन्य पार्श्व कार्योंको भी इन पार्श्व नक्षत्रोंमें करना चाहिये।
रोहिणी, आर्द्रा, पुष्य, धनिष्ठा, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ, उत्तराभाद्रपद, शतभिष (वारुण) तथा श्रवण—ये नौ नक्षत्र ऊर्ध्वमुखी कहे गये हैं। इन नक्षत्रोंमें राज्याभिषेक और पट्टबन्ध आदि शुभ कार्य करवाने चाहिये। ऊर्ध्वमुखी अर्थात् अभ्युदय प्रदान करनेवाले अन्य विशिष्ट कार्योंको भी इन नक्षत्रोंमें कराना प्रशस्त होता है।
चतुर्थी, षष्ठी, अष्टमी, नवमी, द्वादशी, चतुर्दशी, अमावास्या तथा पूर्णिमा तिथि अशुभ होती है। इन तिथियोंमें शुभ कार्य नहीं करने चाहिये। कृष्णपक्षकी प्रतिपदा तथा बुधवारसे युक्त द्वितीया तिथि शुभ होती है। यदि भूमिपुत्र मंगलसे युक्त तृतीया हो, शनैश्चरको चतुर्थी हो, गुरुवारको पञ्चमी पड़ रही हो, षष्ठीको मंगल या शुक्रवार हो तो वे तिथियाँ भी शुभ होती हैं। बुधवारको सप्तमी, मंगल तथा रविवारको अष्टमी, सोमवारको नवमी और गुरुवारको पड़नेवाली दशमी तिथि शुभ होती है। एकादशी तिथिमें गुरु तथा शुक्र होनेपर, बुधवारको द्वादशी तिथि पड़नेपर, शुक्र तथा मंगलवारको त्रयोदशी और शनिवारको चतुर्दशी तिथि शुभ होती है। इसी प्रकार बृहस्पतिवारको पूर्णिमा या अमावास्या तिथिका होना भी शुभ होता है।
द्वादशी तिथि रविवार, एकादशी सोमवार, दशमी मंगलवार, नवमी बुधवार, अष्टमी गुरुवार, सप्तमी शुक्रवार और षष्ठी तिथि शनिवारसे दग्ध होती है। ऐसे तिथि-दग्ध-योगमें यात्रादिका शुभारम्भ नहीं करना चाहिये। प्रतिपदा, नवमी, चतुर्दशी और अष्टमी तिथियोंमें यदि बुधवारका संयोग हो तो उस तिथिमें प्रस्थानके विचारका दूरसे ही परित्याग करना चाहिये। मेष और कर्क-संक्रान्तिकी षष्ठी, कन्या और मिथुन-संक्रान्तिकी अष्टमी, वृष तथा कुम्भ-संक्रान्तिकी चतुर्थी, मकर और तुला-संक्रान्तिकी द्वादशी, वृश्चिक और सिंह-संक्रान्तिकी दशमी तथा धनु और मीन-संक्रान्तिकी चतुर्दशी—ये दग्ध तिथियाँ हैं। इन तिथियोंमें यात्रादि नहीं करनी चाहिये। ये कष्टदायक होती हैं।