गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] ग्रहदशा, यात्राशकुन, छींकका फल तथा सूर्यचक्र आदिका निरूपण १०१
हे शिव ! रविवारको विशाखा, अनुराधा और ज्येष्ठाका योग, सोमवारके दिन पूर्वाषाढ, उत्तराषाढ तथा श्रवण नक्षत्रका योग, मंगलवारको धनिष्ठा, शतभिष और पूर्वाभाद्रपदका योग, बुधवारमें रेवती, अश्विनी तथा भरणीका योग, बृहस्पतिवारको रोहिणी, मृगशिरा और आर्द्राका योग, शुक्रवारमें पुष्य, अश्लेषा एवं मघाका योग, शनिवारको उत्तराफाल्गुनी, हस्त तथा चित्रा नक्षत्रका योग होनेपर औत्पातिक योग होता है। इन योगोंमें गमनादि कार्य करनेसे उत्पात, मृत्यु और रोगकी उत्पत्ति होती है।
हे रुद्र ! रविवारको मूल, सोमवारको श्रवण, मंगलवारको उत्तराभाद्रपद, बुधवारको कृत्तिका, बृहस्पतिके दिन पुनर्वसु, शुक्रवारको पूर्वाफाल्गुनी तथा शनिवारको स्वाती नक्षत्र हो तो अमृत योग होता है। ये सभी कार्योंको सिद्ध करनेवाले हैं।
विष्कम्भ योगकी पाँच घटी, शूल योगकी सात घटी, गण्ड तथा अतिगण्ड योगकी छः-छः घटी, व्याघात और वज्र योगकी नौ-नौ घटी एवं व्यतीपात, परिघ और वैधृति योग—ये मृत्युतुल्य कष्टदायी होते हैं, इनमें सभी कर्मोंका परित्याग करना चाहिये।
रविवारको हस्त, गुरुवारको पुष्य, बुधवारको अनुराधा नक्षत्र—ये शुभ होते हैं। शनिवारको रोहिणी उत्तम और सोमवारको मृगशिरा नक्षत्र शुभ है। उसी प्रकार शुक्रवारको रेवती तथा मंगलवारको अश्विनी नक्षत्र शुभ फल देता है। इस प्रकारका योग होनेपर सिद्धि योग बनता है। ये सिद्धि योग सभी प्रकारके दोषोंका विनाश करनेवाले होते हैं।
हे वृषभध्वज ! शुक्रवारको भरणी, सोमवारको चित्रा, मंगलवारको उत्तराषाढ, बुधवारको धनिष्ठा, बृहस्पतिको शतभिष, शुक्रवारको रोहिणी और शनिवारको रेवती नक्षत्र होनेपर विषयोग होता है।
पुष्य, पुनर्वसु, रेवती, चित्रा, श्रवण, धनिष्ठा, हस्त, अश्विनी, मृगशिरा एवं शतभिष नक्षत्र होनेपर जातकर्म आदि संस्कार करनेके लिये उत्तम माने गये हैं।
हे शिव ! विशाखा, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ, उत्तराभाद्रपद, मघा, आर्द्रा, भरणी, अश्लेषा और कृत्तिका नक्षत्रमें यात्रा करनेपर मृत्युका भय रहता है। (अध्याय ५९)
ग्रहदशा, यात्राशकुन, छींकका फल तथा सूर्यचक्र आदिका निरूपण
श्रीहरिने कहा—[हे शिव ! अब मैं ग्रहोंकी महादशाका वर्णन कर रहा हूँ।] सूर्यकी दशा छः वर्ष, चन्द्रकी दशा पंद्रह वर्ष, मंगलकी दशा आठ वर्ष, बुधकी दशा सत्रह वर्ष, शनिकी दशा दस वर्ष, बृहस्पतिकी दशा उन्नीस वर्ष, राहुकी दशा बारह वर्ष तथा शुक्रकी दशा इक्कीस वर्ष रहती है*।
सूर्यकी दशा दुःख देनेवाली होती है और उद्वेगको पैदा करती है तथा राजाका नाश करती है। चन्द्रकी दशा ऐश्वर्य देनेवाली, सुख पैदा करनेवाली तथा (इष्ट) मनोऽनुकूल अन्न देनेवाली होती है।
* यहाँपर ग्रहोंकी महादशाओंका जो योग्य समय तथा उनका क्रम दिया गया है, वह महर्षि पराशर आदि द्वारा निर्दिष्ट विंशोत्तरी महादशासे भिन्न है। इसमें केतुकी दशा भी नहीं दिखलायी गयी है। महर्षि पराशरके अनुसार ग्रहोंका क्रम तथा उनकी भोग्यवर्ष-संख्या इस प्रकार है—सूर्यकी महादशा छः वर्ष रहती है, चन्द्रदशा दस वर्ष रहती है। इसी प्रकार मंगल सात वर्ष, राहु अठारह वर्ष, बृहस्पति सोलह वर्ष, शनि उन्नीस वर्ष, बुध सत्रह वर्ष, केतु सात वर्ष तथा शुक्र बीस वर्षतक भोग करता है। इनका योग एक सौ बीस वर्ष होता है, जो महर्षि पराशरद्वारा मानव-आयुका परिमाण है, इसीलिये यह विंशोत्तरी महादशा कहलाती है, इसी प्रकार दूसरा अष्टोत्तरी महादशा क्रम भी है, किंतु गरुडपुराणमें निर्दिष्ट क्रम तथा दशा-वर्ष सर्वथा भिन्न है।