भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१५०संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

रहते हैं और जो श्राद्धके अवसरपर देवताओंसे, स्वधाद्वारा तृप्त किये जाते हैं, मैं उन पितृगणोंको नमस्कार करता हूँ। स्वर्गमें भी अवस्थित महर्षिगण भुक्ति और मुक्तिकी कामनासे मानसिक श्राद्धके द्वारा जिनको भक्तिपूर्वक तृप्त करते हैं, उन पितरोंको मैं प्रणाम करता हूँ।

स्वर्गमें सिद्धजन श्राद्धके सुअवसरोंपर सभी दिव्य उत्तम उपहारोंके द्वारा जिन पितरोंको भलीभाँति संतुष्ट करते हैं, उन पितरोंको मेरा नमन है। गुह्यकजन स्वर्गमें आत्यन्तिकी श्रेष्ठ ऋद्धिकी कामनासे भक्तिपूर्वक तन्मयभावसे जिन पितरोंका पूजन करते हैं, उनको मैं नमस्कार करता हूँ। पृथिवीपर मनुष्योंके द्वारा श्राद्धोंमें सदैव जिनकी पूजा होती है, जो श्रद्धापूर्वक स्वजनोंसे पूजित होकर अभीष्ट लोक प्रदान करते हैं, मैं उन पितृगणोंको प्रणाम करता हूँ। इस पृथिवीपर ब्राह्मणजन वाञ्छित अभीष्ट लाभके लिये प्राजापत्यलोक प्रदान करनेवाले जिन पितरोंकी सदैव पूजा करते हैं, मैं उन सभीको नमन करता हूँ।

तपके द्वारा निर्धूतकल्मष, संयत आहार करनेवाले अरण्यवासी मुनियोंके द्वारा वनमें उत्पन्न पदार्थोंके माध्यमसे किये गये श्राद्धद्वारा जिन पितरोंको तृप्ति प्रदान की जाती है, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ। नैष्ठिक धर्मचारी, जितेन्द्रिय एवं समाधिस्थ ब्राह्मणोंके द्वारा जो विधिवत् नित्य संतृप्त किये जाते हैं, उन पितरोंको मैं प्रणाम करता हूँ। क्षत्रियगण इस लोक तथा स्वर्गलोकका फल प्रदान करनेवाले जिन पितृगणोंको श्राद्धमें प्रदत्त कव्य-पदार्थोंसे संतुष्ट करते हैं, उन सभी पितरोंको मेरा नमन है। स्वकर्मनिरत वैश्यगण पृथ्वीपर सदा जल, पुष्प, धूप तथा अन्नादिके द्वारा जिनकी अर्चना करते हैं, उन पितरोंको मैं नमस्कार करता हूँ। शूद्रगण इस भूत़लपर भक्तिपूर्वक श्राद्धमें जिन समस्त लोकको संतृप्त करते हैं, मैं ऐसे सुकालिन् नामसे विख्यात पितरोंको प्रणाम करता हूँ।

पाताललोकमें रहनेवाले असुरगण अपने दम्भ एवं अहंकारका परित्यागकर श्राद्धमें जिन अमृतपान करनेवाले पितरोंको तृप्ति प्रदान करते हैं, मैं उन सभी पितृजनोंको नमन करता हूँ। रसातलमें अवस्थित नागगण अपनी मनोवाञ्छित कामनाओंको पूर्ण करनेकी अभिलाषाओंसे प्रेरित होकर विधिपूर्वक श्राद्धमें प्रदत्त भोग-पदार्थोंके द्वारा जिन पितृगणोंकी पूजा करते हैं, मैं उन पितरोंको नमस्कार करता हूँ। रसातलमें स्थित सर्पगण भी विधिवत् मन्त्रोच्चारके साथ प्रदान किये गये भोग-पदार्थोंसे समन्वित श्राद्धके द्वारा जिन पितृगणोंकी अर्चना करते हैं, मैं उन सभीको प्रणाम करता हूँ। जो देवलोक, अन्तरिक्ष एवं पृथिवीलोकमें प्रत्यक्षरूपसे निवास करते हैं, देवताओं तथा दैत्योंके भी जो पूज्य हैं, ऐसे उन पितृजनोंको मैं नमन करता हूँ। वे मेरे द्वारा निवेदित वस्तुओंको प्राप्त करें।

जो परमार्थ अर्थात् दूसरेका हित करनेके लिये पितृयोनिमें रहकर भी अमूर्तरूपसे विमानमें विद्यमान रहते हैं, श्रेष्ठ योगीजन कष्टोंमें मुक्ति प्रदान करनेवाले जिन पितृजनोंकी पूजा अपने निर्मल मनसे करते हैं, मैं उन पितरोंको नमस्कार करता हूँ। जो स्वर्गमें मूर्तिमान् होकर निवास करते हैं एवं स्वधाभोजी हैं, जो सभी अभिलषित जनोंको उनकी इच्छित कामनाओंका फल प्रदान करनेमें समर्थ हैं और जो निष्काम-जनोंकी मुक्तिके कारण हैं, मैं उन पितरोंको प्रणाम करता हूँ।


सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्त्तिधरांस्तथा। नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम्॥
अग्निरूपांस्तथैवान्यान्नमस्यामि पितॄनहम्। अग्निसोममयं विश्वं यत एतदशेषतः॥
ये च तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्निमूर्तयः। जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिणः॥
तेभ्योऽखिलेभ्यो योगिभ्यः पितृभ्यो यतमानसः। नमो नमो नमस्तेऽस्तु प्रसीदन्तु स्वधाभुजः॥
मार्कण्डेय उवाच
एवं स्तुतास्ततस्तेन तेजसो मुनिसत्तमाः। निष्क्रममुस्ते पितरो भासयन्तो दिशो दश॥
निवेदनं च यत्तेन पुष्पगन्धानुलेपनम्। तद्भूषितानथ स तान् ददृशे पुरतः स्थितान्॥
प्रणिपत्य रुचिर्भक्त्या पुनरेव कृताञ्जलिः। नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यमित्याह पृथगादृतः॥ (८९।१३-६३)