भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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काण्ड ] रुचिद्वारा की गयी पितृस्तुति तथा श्राद्धमें इस पितृस्तुतिके पाठका माहात्म्य १५१

जो इच्छुकजनोंके अभीष्टको इसी लोकमें सिद्ध कर देते हैं तथा देवत्व, इन्द्रत्व और उससे भी अधिक श्रेष्ठ पद अथवा हाथी, घोड़े, रत्न और उत्तम प्रकारके भवन प्रदान करनेमें सक्षम हैं, वे समस्त पितृजन मेरी इस प्रार्थनासे संतुष्ट हों। जो चन्द्ररश्मि, सूर्यमण्डल और स्वच्छ विमानमें सदा निवास करते हैं, वे पितृजन इस पूजामें हमारे द्वारा प्रदत्त अन्न, जल, गन्धादिके द्वारा संतुष्ट हों और शक्तिवान् बनें।

अग्निमें प्रदान की गयी हविष्यकी आहुतिसे जिन्हें संतुष्टि प्राप्त होती है, जो ब्राह्मणके शरीरमें प्रविष्ट होकर श्राद्ध-भोजन करते हैं, जो पिण्डदान देनेसे प्रसन्न होते हैं, वे सभी पितृगण हमारी इस पूजामें प्रदान किये गये अन्न-जलसे संतुष्ट हों। जो काले-काले सुन्दर तिलोंद्वारा प्रसन्न होते हैं, जो महर्षिजनोंके द्वारा श्राद्धमें उस कालमें प्राप्त शाक-पातसे आनन्दित हो उठते हैं, वे पितृजन प्रसन्न हों।

मेरे उन पूज्य पितरोंके जो अतिशय प्रिय समस्त कव्य पदार्थ हैं, उन्हें उन सभी पदार्थोंकी प्राप्ति, इस पूजामें मेरे द्वारा प्रदान किये गये पुष्प, गन्ध, जल तथा पक्वान्न-भोज्य पदार्थोंमें ही हो जाय। इस भूलोकमें प्रतिदिन जो पितृगण श्रद्धावान् जनोंके द्वारा सम्पन्न की गयी पूजाको स्वीकार करते हैं, जो प्रत्येक मासकी अन्तिम तिथि तथा अष्टकाकालमें श्रद्धालुओंके पूज्य हैं और जिन पितृजनोंकी पूजा वर्षान्त एवं अभ्युदयकालमें होती है, वे सभी मेरे पितृगण इस श्राद्धमें संतुष्टि प्राप्त करें।

कुन्द-पुष्प तथा चन्द्रके समान स्वच्छ गौर वर्णकी कान्तिको धारण करनेवाले जो पितृजन ब्राह्मणोंके पूज्य हैं, देदीप्यमान सूर्यके समान वर्णवाले जिन पितरोंका पूजन क्षत्रियजन करते हैं, स्वर्णके समान कान्तिको धारण किये हुए जो पितृगण वैश्यवर्ण और नीली कान्तिसे सुशोभित जो पितृजन शूद्रवर्णके पूजनीय हैं, वे सभी इस पूजामें मेरे द्वारा निवेदित गन्ध, पुष्प, धूप, जल एवं भोज्यादि-पदार्थ तथा अग्निमें समर्पित आहुतिसे सदाके लिये तृप्ति प्राप्त करें। मैं उन सभी पितरोंको प्रणाम करता हूँ।

श्राद्धादिमें अपनी क्षुधाको पूर्णरूपसे संतुष्ट करनेके निमित्त जो पितृगण देवताओंके पूर्व ही श्रद्धालु व्यक्तियोंके द्वारा अर्पित कव्य-पदार्थोंको ग्रहण कर लेते हैं और संतुष्ट होकर जो अपने स्वजनोंके लिये ऐश्वर्योंकी सृष्टि करते हैं, मैं इस श्राद्धमें उन सभी पितरोंको प्रणाम करता हूँ। जो देवताओंके आदिपुरुष एवं देवराज इन्द्रसे भी पूजित हैं, वे राक्षस, भूत, वेताल, असुर तथा उग्र योनिवाले (हिंसक जीव-जन्तुओं)-का विनाश करके अपनी प्रजा (संतति)-की रक्षा करें। मैं उन पितरोंको प्रणाम करता हूँ।

जो अग्निष्वात्त, बर्हिषद्, आज्यप तथा सोमप नामक पितृगण हैं, वे सभी इस श्राद्धमें मेरे द्वारा संतृप्त होकर तृप्तिको प्राप्त करें। अग्निष्वात्त पितर मेरी पूर्व दिशाकी रक्षा करें। बर्हिषद् नामक पितृगण सर्वदा मेरी दक्षिण दिशाकी अभिरक्षा करें। आज्यप पितृजन पश्चिम दिशा तथा सोमप पितृगण उत्तर दिशाकी रक्षा करें। ये समस्त पितृजन राक्षस, भूत, पिशाच एवं असुरगणोंके कारण उत्पन्न दोषोंसे नित्य सब प्रकारसे हमारी रक्षा करें।

विश्व, विश्वभुक्, आराध्य, धर्म, धन्य, शुभानन, भूतिद, भूतिकृत् और भूति नामक जो पितरोंके नौ गण हैं तथा कल्याण और कल्यद, कल्यकर्ता, कल्यतराश्रय, कल्यताहेतु एवं अनघ नामक जो पितरोंके छः गण कहे गये हैं और वर, वरेण्य, वरद, तुष्टिद, पुष्टिद, विश्वपात एवं धाता नामसे विख्यात—ये सात गण तथा पितृगणोंके पापविनाशक जो महान्, महात्मा, महित, महिमावान् और महाबल

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