गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 169, कुल 634 में से
संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] गृहस्थधर्म-निरूपण [ १५९
मधु एवं घृतसे प्रतिदिन तृप्त करता है। जो द्विज प्रतिदिन यजुर्वेद, सामवेद अथवा अथर्ववेदका अध्ययन करता है, वह घृत एवं अमृतसे पितरों तथा देवताओंको प्रतिदिन तृप्त करता है। ऐसे ही जो द्विज प्रतिदिन वाकोवाक्य<sup>१</sup>, पुराण, नाराशंसी<sup>२</sup>, गाथिका<sup>३</sup>, इतिहास<sup>४</sup> तथा विद्याका<sup>५</sup> अध्ययन करता है, वह पितरों एवं देवताओंको मांस (फल), दूध और ओदन (भात)-से प्रतिदिन तृप्त करता है। संतृप्त ये देवता और पितृजन भी इस स्वाध्यायशील द्विजको समस्त अभीष्ट शुभ फलोंसे संतुष्ट करते हैं। द्विज जिस-जिस यज्ञके प्रतिपादक वेद-भागका अध्ययन करता है, उस-उस यज्ञके फलको प्राप्त करता है। इसके अतिरिक्त भूमिदान, तपस्या और स्वाध्यायके फलका भी भागी होता है।
नैष्ठिक ब्रह्मचारीको अपने आचार्यके सांनिध्यमें रहना चाहिये। आचार्यके अभावमें आचार्यपुत्र और उसके अभावमें आचार्य-पत्नी तथा उसके भी अभावमें वैश्वानर-अग्निके आश्रयमें (अपनेद्वारा उपास्य अग्निकी शरणमें) रहना चाहिये। इस प्रकार अपने देहको क्षीण करता हुआ जितेन्द्रिय द्विज ब्रह्मचारी ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है। उसका पुनः जन्म नहीं होता। (अध्याय ९४)
गृहस्थधर्म-निरूपण
याज्ञवल्क्यजीने कहा—हे यतव्रत मुनियो! आप सभी अब गृहस्थाश्रमके धर्मोंका वर्णन सुनें।
(विद्याध्ययनकी समाप्तिके पश्चात्) गुरुको दक्षिणा प्रदान करके उन्हींकी अनुज्ञासे स्नानकर शिष्यको ब्रह्मचर्यव्रतकी समाप्ति करनी चाहिये। तदनन्तर वह सुलक्षणा, अत्यन्त सुन्दर मनोरमा, असपिण्डा, अवस्थामें छोटी, अरोगा, भ्रातृमती, भिन्न प्रवर एवं गोत्रवाली कन्यासे विवाह करे।
सभी असपिण्डा कन्याको विवाहयोग्य बताया गया है। इससे यह स्पष्ट हो रहा है कि सपिण्डा कन्यासे विवाह नहीं करना चाहिये। महर्षि याज्ञवल्क्यने यहाँ सपिण्डाके बारेमें यह बताया है—मातासे लेकर उनके पिता, पितामह आदिकी गणनामें पाँचवीं परम्परात्तक तथा पितासे लेकर उनके पिता, पितामह आदिकी गणनामें सातवीं परम्परात्तक सपिण्ड्य समझना चाहिये। इसके मध्यमें आनेवाली कन्या सपिण्ड्य तथा इसके मध्यमें न आनेवाली कन्या असपिण्डा होगी। इसके अनुसार विवाहके लिये असपिण्डा कन्याका चयन होना चाहिये। ऐसे ही उसी कन्यासे विवाह उचित है, जिसका मातृकुल तथा पितृकुलमें पाँच-पाँच परम्परात्तक सदाचार, अध्ययन एवं पुत्र-पौत्रादिकी समृद्धिकी दृष्टिसे विख्यात हो। ऐसे ही कन्याके लिये समानवर्णमें उत्पन्न श्रोत्रिय एवं विद्वान् पुरुष श्रेष्ठ होता है। अन्य विद्वानोंने जो यह कहा है कि द्विजातियोंके लिये शूद्रकुलमें उत्पन्न हुई कन्या भी ग्रहण करने योग्य होती है, यह मेरा अभिमत नहीं है, क्योंकि उस कन्यामें उससे विवाह करनेवाला उसका पति ही स्वयं उत्पन्न होता है<sup>६</sup>। तीनों वर्ण तीन, दो, एक इस क्रमसे वर्णोंमें विवाह कर सकते हैं। शूद्र-वर्णको अपने ही वर्णसे कन्या प्राप्त करनी चाहिये।
अपने घरपर वरको बुलाकर उसे यथाशक्ति अलंकृत अपनी कन्या प्रदान करना 'ब्राह्मविवाह'
<sup>१</sup>-वाकोवाक्य—प्रश्नोत्तररूप वेद-वाक्य। <sup>२</sup>-नाराशंसी—रुद्रदैवत्य मन्त्र। <sup>३</sup>-गाथिका—यज्ञ-सम्बन्धी इन्द्र आदिकी गाथाएँ। <sup>४</sup>-इतिहास—महाभारत आदि। <sup>५</sup>-विद्या—वारुणी आदि विभिन्न विद्याएँ। <sup>६</sup>-'आत्मा वै जायते पुत्रः' के अनुसार पिता ही पुत्रके रूपमें जन्म लेता है।