गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १६० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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है। इस विधिसे विवाहित स्त्री-पुरुषसे उत्पन्न होनेवाली संतान दोनों कुलोंके इक्कीस पीढ़ियोंको पवित्र करती है। यज्ञदीक्षित ऋत्विक् ब्राह्मणको अपनी कन्या देना 'दैवविवाह' है तथा वरसे एक जोड़ा गौ (स्त्री गौ एवं पुरुष गौ) लेकर उसको कन्या प्रदान करना 'आर्षविवाह' कहा जाता है। इस प्रथम (ब्राह्मविवाह) विधिसे विवाहित स्त्री-पुरुषसे उत्पन्न पुत्र अपनी प्रथमकी सात तथा बादकी सात—इस तरह चौदह पीढ़ियोंको पवित्र करता है। आर्षविधिके विवाहसे उत्पन्न पुत्र तीन पूर्व तथा तीन बादकी—इस तरह छः पीढ़ियोंको पवित्र करता है।
'तुम इस कन्याके साथ धर्मका आचरण करो'—यह कहकर विवाहकी इच्छा रखनेवाले वरको पिताके द्वारा जब कन्या प्रदान की जाती है, तब ऐसे विवाहको 'काय (प्राजापत्य)-विवाह' कहते हैं। इस विवाह-विधिसे उत्पन्न पुत्र अपनेसहित पूर्वकी छः तथा बादकी छः पीढ़ियों—इस तरह कुल तेरह पीढ़ियोंको पवित्र करता है। कन्याके पिता या बन्धु-बान्धव अथवा कन्याको ही यथाशक्ति धन देकर यदि कोई वर उससे विवाह करता है तो इस विवाहको 'असुरविवाह' और वर एवं कन्याके बीच पहले ही पारस्परिक सहमति हो जानेके बाद जो विवाह होता है, उसको 'गान्धर्वविवाह' कहते हैं। कन्याकी इच्छा नहीं है, तब भी बलात् युद्ध आदिके द्वारा अपहृत उस कन्याके साथ विवाह करना 'राक्षसविवाह' है। स्वाप (शयन) आदि अवस्थामें अपहरणकर उसके साथ जो विवाह किया जाता है, उसको 'पैशाचविवाह' कहते हैं।
इन उपर्युक्त आठ विवाहोंमें प्रथम चार प्रकारके विवाह अर्थात् ब्राह्म, दैव, आर्ष और प्राजापत्यविवाह ब्राह्मणवर्णके लिये उपयुक्त हैं। गान्धर्वविवाह तथा राक्षसविवाह क्षत्रियवर्णके लिये उचित है। असुरविवाह वैश्यवर्ण और अन्तिम गर्हित पैशाच नामक विवाह शूद्रवर्णके लिये (उचित) माना गया है।
समान वर्णवाले वर-कन्याके विवाहमें कन्याओंके द्वारा गृह्यसूत्रकी विधिके अनुसार वरका पाणिग्रहण अर्थात् हाथ पकड़ना चाहिये। क्षत्रियकन्या ब्राह्मणवरसे विवाह करते समय ब्राह्मणवरके दाहिने हाथमें विद्यमान शर (बाण)-के एकदेशको ग्रहण करे। वैश्यकन्या ब्राह्मण अथवा क्षत्रियवरसे विवाह करते समय वरके हाथमें विद्यमान चाबुकके एकदेशको ग्रहण करे। ऐसे ही शूद्रकन्या ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्यवरसे विवाह करते समय वरके उत्तरीय वस्त्र (ऊपर ओढ़े हुए चादर)-के किनारेको ग्रहण करे^२।
पिता, पितामह, भ्राता, सकुल्य^३ (बन्धु-बान्धव) अथवा माता कन्यादान करनेके अधिकारी हैं। पूर्वके अभावमें उत्तरोत्तर कन्यादानके अधिकारी हैं, यदि उन्माद आदि दोषसे ग्रस्त नहीं हैं। यदि कन्यादानका अधिकारी समयपर कन्यादान न करे तो कन्याके ऋतुमती हो जानेपर कन्यादानके अधिकारीको कन्याके प्रति ऋतुकालमें एक-एक भ्रूणहत्याका पाप लगता है। कन्यादानके दाताके अभावमें कन्याको स्वयं उपयुक्त वरका वरण कर लेना चाहिये।
कन्या एक बार दी जाती है, इसलिये कन्या एक बार देकर पुनः उसका अपहरण करनेवाला
^१-कन्याका पिता वरसे गौका जोड़ा मूल्यके रूपमें नहीं लेता, आवश्यकतावश धर्मकार्य (याग आदि) सम्पन्न करनेके लिये होता है। इसीलिये मनुस्मृति (३। २९)-के अनुसार जितनासे धर्मकार्य हो सके, उतना ही (एक ही गौ या गौका जोड़ा) कन्या-पिताको वरसे लेना चाहिये।
^२-दूसरे वर्णसे विवाह करनेकी यह व्यवस्था कलियुगके लिये नहीं है।
^३-सकुल्य—आठवीं पीढ़ीसे दसवीं पीढ़ीतक 'सकुल्य' कहा जाता है।