भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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काण्ड ]गृहस्थधर्म-निरूपण१६१

चौरकर्मके समान दण्डका भागी होता है। निर्दुष्ट अर्थात् सौम्य सुशीला पत्नीका परित्याग करनेपर पति दण्डनीय है, किंतु अत्यन्त दुष्ट (महापातक आदिसे दुष्ट) पत्नीका उपायान्तरके अभावमें परित्याग किया जा सकता है।

यदि कन्याका किसी वरके साथ विवाह करनेके लिये वाग्दानमात्र किया गया हो, अनन्तर विवाहके पूर्व ही वरका मरण हो गया तो कलियुगसे अन्य युगोंमें ऐसी कन्याको पुत्र प्राप्त करनेका उपाय यह है—ऐसी कन्या पुत्र चाहती है तो उसका देवर अथवा कोई सपिण्ड या कोई सगोत्र बड़ोंकी आज्ञा प्राप्त होनेपर अपने सभी अङ्गोंमें घृतलेप कर ऋतुकालमात्रमें उस कन्याके पास तबतक जा सकता है, जबतक गर्भ-धारण न हो। गर्भ-धारणके बाद यदि वह ऐसी कन्याके पास जाता है तो पतित हो जाता है। इस विधिसे इस कन्यासे उत्पन्न पुत्र जिस वरको कन्याका वाग्दान किया गया था, उसका क्षेत्रज पुत्र माना जाता है।

जो स्त्री व्यभिचारिणी है, बहुत प्रयत्न करनेपर भी व्यभिचारसे विरत नहीं हो रही है, उसको अपने गर्हित जीवनके प्रति वैराग्य उत्पन्न करनेके लिये अपने घरमें ही रखते हुए समस्त अधिकारोंसे अलग कर देना चाहिये तथा उसे मलिनदशामें ही रखकर उतना ही भोजन देना चाहिये, जितनासे उसकी प्राणरक्षामात्र हो सके। साथ ही उसके निन्दनीय कर्मके लिये उसकी भर्त्सना करनी चाहिये और भूमिपर ही उसके शयनकी व्यवस्था करनी चाहिये।

स्त्रियोंको विवाहसे पूर्व चन्द्रने शुचिता, गन्धर्वने सुन्दर मधुर वाणी एवं अग्निने सब प्रकारकी पवित्रता प्रदान की है। इसीलिये स्त्रियाँ पवित्र ही होती हैं। अतएव उनके लिये अल्प प्रायश्चित्तकी व्यवस्था है। पर इतनेसे यह नहीं समझना चाहिये कि स्त्रियोंमें दोषका संक्रमण नहीं होता है। यदि कोई स्त्री केवल मनसे पर पुरुषकी इच्छा करती है तो यह भी एक तरहका व्यभिचार ही है। ऐसे ही अन्य पुरुषसे सम्पर्क करनेका संकल्पमात्र कोई स्त्री कर लेती है तो यह भी किसी रूपमें व्यभिचार ही है। ऐसा व्यभिचार यदि प्रकाशमें नहीं आया है तो इससे उत्पन्न दोषका मार्जन उस स्त्रीके ऋतुकालमें रजोदर्शनसे हो जाता है। यदि पर पुरुष शूद्रके साथ सम्पर्क कर कोई स्त्री गर्भधारण कर लेती है तो इस पापका प्रायश्चित्त उस स्त्रीका त्याग ही है। ऐसे ही गर्भबध, पतिका वध, ब्रह्महत्या आदि महापातकसे ग्रस्त होनेपर तथा शिष्य आदिके साथ गमन करनेवाली स्त्रीका त्याग ही कर देना चाहिये।

मदिरापान करनेवाली, दीर्घ रोगिणी, द्वेष रखनेवाली, वन्ध्या, अर्थका नाश करनेवाली, अप्रियवादिनी (निष्ठुरभाषिणी), कन्याको ही उत्पन्न करनेवाली एवं पतिका अहित ही करनेवाली भार्याका परित्याग कर दूसरा विवाह किया जा सकता है। प्रथम विवाहिता (परित्यक्ता) स्त्रीका भी दान, मान, सत्कार आदिके द्वारा भरण करना चाहिये, अन्यथा उस स्त्रीके पतिको महापाप होता है। इसके अतिरिक्त यह भी ध्यान देने योग्य है कि जिस घरमें पति-पत्नीके मध्य किसी भी प्रकारका विरोध नहीं होता, उस घरमें धर्म-अर्थ और काम—इस त्रिवर्गकी अभिवृद्धि होती है। अतः प्रथम विवाहिता एवं वर्तमान भार्यामें, अस्वीकृत स्त्री भी पूर्वमें भार्या रही है। इस दृष्टिसे उससे विरोध नहीं ही करना चाहिये। उसे पूर्ण प्रसन्न रखना चाहिये। जो स्त्री पतिकी मृत्युके पश्चात् अथवा उसके जीवित रहते हुए अन्य पुरुषका आश्रय नहीं लेती, वह इस लोकमें यश प्राप्त करती है और अपने पातिव्रत्य-पुण्यके प्रभावसे परलोकमें