भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१६२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

जाकर पार्वतीके साहचर्यमें आनन्द प्राप्त करती है।

यदि पति अपनी स्त्रीका परित्याग करता है तो उस स्त्रीको भरण-पोषणके लिये अपनी सम्पत्तिका तृतीयांश दे देना चाहिये।

स्त्रियोंको अपने पतिकी आज्ञाका पालन करना चाहिये—यही उनका परम धर्म है। स्त्रियोंमें ऋतु अर्थात् रजोदर्शनके प्रथम दिनसे सोलह रात्रितक उनका ऋतुकाल होता है। अतः पुरुषको उक्त सोलह रात्रियोंकी युग्म रात्रियोंमें अपनी पत्नीके साथ पुत्र-प्राप्तिके लिये संसर्ग करना चाहिये¹। पर्वोंकी तिथियोंमें² तथा ऋतुकालकी प्रारम्भिक चार तिथियोंमें सहवास नहीं करना चाहिये। अपनी अपेक्षा क्षाम (दुर्बल) स्त्रीका सहवास पुत्र-प्राप्तिमें सहायक होता है। मघा और मूल नक्षत्रमें सहवास वर्जित है।

इन नियमोंका पालन करके ही अपनी स्त्रीसे सुन्दर, सबल, उत्तम लक्षणोंवाले नीरोग पुत्रको उत्पन्न किया जा सकता है। स्त्रियोंको इन्द्रने जो वर³ दिया है, उसे ध्यानमें रखते हुए पुरुष यथाकामी (पत्नीकी इच्छानुसार ऋतुकालकी रात्रियोंसे अतिरिक्त अनिषिद्ध रात्रियोंमें भी अपनी पत्नीके साथ सहवास करनेवाला) भी हो सकता है। पुरुषके यथाकामी होनेमें दो कारण हैं—(१) पुरुषको अपनी पत्नीमें ही रति रखनी चाहिये और (२) स्त्रियोंकी रक्षा करना पुरुषका धर्म है। पति, भ्राता, पिता, पितृव्य, सास, श्वशुर, देवर तथा अन्य बन्धु-बान्धवोंको स्त्रियोंका आभूषण-वस्त्र एवं भोजनादिके द्वारा पर्याप्त आदर करना चाहिये।

स्त्रीको घरकी सामग्री संयमित रूपमें रखनी चाहिये, कार्यकुशल होना चाहिये, प्रसन्न रहना चाहिये, मितव्ययी (अधिक खर्चीली नहीं) होना चाहिये तथा सर्वदा अपने सास-श्वशुरके चरणोंका वन्दन करना चाहिये।

जो स्त्री प्रोषितपतिका है अर्थात् जिसका पति परदेश चला गया है, उसके लिये किसी प्रकारकी क्रीड़ा (खेल-तमाशा), शरीरकी सजावट, सामाजिक उत्सवोंका दर्शन, हास-परिहास तथा दूसरेके घरमें गमन करना वर्जित है।

बाल्यावस्थामें पिता, यौवनकालमें पति, वृद्धावस्थामें पुत्र, पुत्रके अभावमें अन्य सम्बन्धियोंको नारीकी रक्षा करनी चाहिये। दिन हो अथवा रात्रि हो, कभी भी स्त्री अपने पतिके बिना एकान्तमें निवास न करे। पतिको सदैव धर्म-कार्यमें अपनी ज्येष्ठा पत्नीको ही संलग्न करना चाहिये। कनिष्ठा भार्या धर्म-कार्यके लिये उपयुक्त नहीं मानी गयी है। सदाचारिणी स्त्रीके मृत्यु होनेपर पतिको चाहिये कि वह अग्निहोत्रमें प्रयुक्त अग्निसे उसका दाह-संस्कार करे। तदनन्तर अविलम्ब अन्य स्त्रीके साथ पाणिग्रहण करके पुनः अग्निका संचयन करे। पतिहितैषिणी पत्नी इस लोकमें यश अर्जित करके अन्तमें स्वर्गलोकको प्राप्त करती है। (अध्याय ९५)


१-इन नियमोंका पालन करनेवालेको 'ब्रह्मचारी' कहा गया है।
२-पर्व-तिथि चार हैं—अष्टमी, चतुर्दशी, अमावास्या और पूर्णिमा (मनु० ४। १५६)।
३-एक बार स्त्रियोंने पुरुषकी अपेक्षा आठगुनी अपनी कामभावनासे बाध्य होकर इन्द्रदेवकी शरणमें जाकर अपने मनोभावको उनसे स्पष्ट किया। इन्द्रदेवने स्त्रियोंके भावको जानकर उन्हें वर दिया—'भवतीनां कामविहन्ता पातकी स्यात्' ('आप लोगोंकी कामभावनाका हनन करनेवाला पुरुष पातकी होगा')। इसी वरके अनुसार पत्नीकी इच्छाके अनुसार ऋतुकालसे अन्य कालकी अनिषिद्ध रात्रियोंमें भी पत्नीगमन अनुज्ञात है।