गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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दम, क्षमा, सरलता और दान सभीके लिये धर्मके साधन हैं। अपने वर्णधर्मानुसार जीविकाका आश्रयणकर कुटिल और दुष्टवृत्तिका परित्याग करना चाहिये—
प्रधानं क्षत्रियं कर्म प्रजानां परिपालनम्॥ कुसीदकृषिवाणिज्यं पशुपाल्यं विशः स्मृतम्। शूद्रस्य द्विजशुश्रूषा द्विजो यज्ञान् न हापयेत्॥ अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियसंयमः। दमः क्षमार्जवं दानं सर्वेषां धर्मसाधनम्॥ आचरेत् सदृशीं वृत्तिमजिह्मामशठां तथा। (९६। २७–३०)
जो मनुष्य तीन वर्षसे अधिक कालतकके लिये अन्नका भण्डारण करता है, वह सोमरस पान करनेकी योग्यता रखता है। जिसके पास मात्र एक वर्षभरके लिये ही अन्न रहता है, उसे मुख्यतः सोमयागकी प्राक्क्रिया<sup>१</sup> करनी चाहिये। द्विजको प्रतिवर्ष सोमयाग, पशुयाग, आग्रायणेष्टि<sup>२</sup> तथा चातुर्मास्ययाग यत्नपूर्वक करना चाहिये। यदि इन यागोंको करना प्रतिवर्ष असम्भव हो तो इन यागोंके कालमें वैश्वानरी इष्टि ही कर लेनी चाहिये।
मुख्य कल्पके सम्पादनमें असमर्थके लिये जो द्वितीय कल्प विहित है, वह हीन कल्प है। सोमयाग, आग्रायणेष्टि आदि मुख्य कल्प हैं। वैश्वानरी इष्टि हीनकल्प है। यदि मुख्यकल्पके सम्पादनयोग्य द्रव्य है तो हीनकल्पका सम्पादन नहीं करना चाहिये। जितने भी फलप्रद (काम्य) अनुष्ठान हैं, फलकी कामना रहनेपर उन्हींका सम्पादन करना होगा। उनको न कर हीनकल्पका सम्पादन करनेपर फल नहीं प्राप्त हो सकता।
ब्राह्मणको अपनी जीविकाके लिये उस अप्रतिषिद्ध अर्थकी भी इच्छा नहीं करनी चाहिये जो स्वाध्याय-विरोधी हो। ऐसे जिस-किसी भी व्यक्तिसे अर्थ पानेकी इच्छा नहीं करनी चाहिये, जिसका आचरण संदिग्ध हो। विरुद्धवृत्ति (अयाज्य याजन आदि)-से भी अर्थ-अर्जन नहीं करना चाहिये। ऐसे ही नृत्य, गीत आदि (प्रसंग)-से भी अर्थ-अर्जन नहीं करना चाहिये। जो द्विज यज्ञके लिये शूद्रसे धनकी याचना करता है, वह मृत्युके पश्चात् चाण्डाल-योनिमें जन्म लेता है। यज्ञके लिये लाये हुए अन्नको जो सम्पूर्णरूपसे यज्ञमें नहीं लगाता, वह कुक्कुर, गृध्र अथवा काकयोनिमें जन्म ग्रहण करता है।
ब्राह्मणको एक कुसूल<sup>३</sup> (कोष्ठक)-भर, एक मटका-भर, तीन दिनतकके लिये या एक दिनतकके लिये अन्न संग्रह करना चाहिये। अथवा वह शिलोञ्छवृत्तिसे अपना जीवन-निर्वाह करे। इन वृत्तियोंमें उत्तरोत्तर वृत्ति श्रेष्ठ है।
यदि वह भूखसे पीड़ित है तो उसको राजा, अपने छात्र या यज्ञ करनेवाले यजमानसे ही अन्न-धनकी याचना करनी चाहिये और दाम्भिक<sup>५</sup>, हैतुक<sup>६</sup>, पाखण्डिक<sup>७</sup> एवं बकवृत्तिवालेका<sup>८</sup> सभी लौकिक-शास्त्रीय कर्ममें सर्वथा परित्याग करना
<sup>१</sup>-प्राक्क्रिया—सोमयागके पूर्व करणीय अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, आग्रायण, चातुर्मास्य आदि।
<sup>२</sup>-नया सस्य उत्पन्न होनेपर आग्रायणेष्टिका विधान है।
<sup>३</sup>-कुसूलधान्य बारह दिनके लिये अन्न, कुम्भीधान्य छः दिनके लिये अन्न।
<sup>४</sup>-'शिलोञ्छवृत्ति' भरण-पोषणकी एक ब्राह्मण-वृत्ति (साधन) है। 'शिलवृत्ति' उसे कहते हैं, जिसमें ब्राह्मण फसल कट जानेके बाद खेतमें गिरे हुए अन्नकी वल्लरी (बाल)-को एकत्र करके अपने कुटुम्बका भरण-पोषण करता है। 'उञ्छवृत्ति' उसे कहते हैं, जिसमें अन्नकी वल्लरी छोड़कर एक-एक कणमात्र एकत्र कर उसीसे अपने कुटुम्बका भरण-पोषण करता है। 'शिल' और 'उञ्छ'—यही 'शिलोञ्छवृत्ति' है।
<sup>५</sup>-दाम्भिक—केवल किसीको प्रसन्न करनेके लिये ही धर्मानुष्ठान।
<sup>६</sup>-हैतुक—निराधार तर्कोंसे धार्मिक कृत्योंमें संशयकर्ता।
<sup>७</sup>-पाखण्डिक—वेदशास्त्रोंके विरुद्ध अनेक प्रकारके लुभावने वेशका धारक।
<sup>८</sup>-बकवृत्ति—बकके समान वर्तन (व्यवहार) करनेवाला।