भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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काण्ड ] वर्णसंकर जातियोंका प्रादुर्भाव, गृहस्थधर्म, वर्णधर्म तथा सैंतीस प्रकारके अनध्याय १६७


चाहिये। वह स्वच्छ श्वेत वस्त्र धारण करे। सिर, दाढ़ी आदिके केश एवं नखोंको यथा-विधान कटवाये रहे। भार्याके साथ भोजन नहीं करना चाहिये। एक वस्त्र धारण कर तथा खड़े होकर भोजन नहीं करना चाहिये।

कभी भी अप्रिय वचन नहीं बोलना चाहिये। यज्ञोपवीतधारी ब्राह्मणको विनीत होना चाहिये। दण्ड और कमण्डलु धारण करना चाहिये। देव आदिको अपने दाहिने करके चलना चाहिये। वह नदी, वृक्षच्छाया, भस्म, गोष्ठ, जल तथा मार्गके मध्यमें मूत्रका परित्याग न करे। अग्नि, सूर्य, गौ, चन्द्र, संध्या, जल, स्त्री और द्विजोंके सम्मुख भी मूत्रका त्याग करना वर्जित है। वह अग्नि एवं उदय तथा अस्त हो रहे सूर्यका दर्शन न करे। उसके लिये नग्न तथा मैथुनासक्त स्त्री, मूत्र और विष्ठाका दर्शन भी त्याज्य है। पश्चिम सिर करके नहीं सोना चाहिये। थूक, रक्त, विष्ठा, मूत्र और विषको जलमें छोड़ना अनुचित है। आगपर पैरोंको सेंकना तथा उसे लाँघना निषिद्ध है।

अञ्जलिद्वारा जल नहीं पीना चाहिये और निद्रा-निमग्न व्यक्तिको जगाना नहीं चाहिये। धूर्त-वञ्चकका साथ नहीं करना चाहिये। रोगी जनोंके साथ शयन नहीं करना चाहिये। धर्म-विरुद्ध कर्मोंका परित्याग कर देना चाहिये। चिताग्निका धुआँ तथा नदीमें तैरना वर्जित है। केशपर, भस्मपर, भूसीपर, प्रज्वलित अग्निके अंगारेपर और कपालपर स्थित नहीं होना चाहिये। किसीसे बछड़ेको दूध पिलाती हुई गायको बताना नहीं चाहिये और किसीके घरमें द्वारके अतिरिक्त अन्य गवाक्षादि मार्गोंसे प्रवेश नहीं करना चाहिये। लोभी तथा शास्त्र-विरुद्ध कर्म करनेवाले राजासे प्रतिग्रह नहीं लेना चाहिये।

वेद तथा धर्म-शास्त्रादिका अध्ययन करनेवालोंका उपाकर्म-संस्कार श्रवणनक्षत्रसे युक्त श्रावणी पूर्णिमाको होना चाहिये। संस्कार-विहित औषधियों-सामग्रियोंके उपलब्ध रहनेपर यह कार्य श्रावणमासकी हस्तनक्षत्रसे युक्त पञ्चमी-तिथिमें भी सम्पन्न हो सकता है। पौषमासके रोहिणीनक्षत्रमें अथवा अष्टकाके दिन ग्रामसे बाहर जलाशयके पास वेदोंका उत्सर्ग-कर्म गृह्यसूत्रके अनुसार करना चाहिये।

शिष्य, ऋत्विक्, गुरु तथा बन्धु-बान्धवोंकी मृत्यु होनेपर तीन दिनका अनध्याय उपाकर्म तथा उत्सर्ग-कर्म करनेपर होता है। ऐसे ही अपनी शाखाके श्रोत्रिय ब्राह्मणकी मृत्यु होनेपर तीन दिनका अनध्याय होता है। संध्याके समय मेघ-गर्जन होनेपर, आकाशमें उत्पातकी ध्वनि होनेपर, भूकम्प होनेपर तथा उल्कापात होनेपर अनध्याय रखना चाहिये। वेद और आरण्यकका अध्ययन पूर्ण होनेपर एक दिन एवं एक रात्रि (अहोरात्र)-का अनध्याय होता है।

अष्टमी, चतुर्दशी, अमावास्या, पूर्णिमा, चन्द्र-सूर्यग्रहण, ऋतुसंधिकी प्रतिपदमें तथा श्राद्ध-भोजन अथवा श्राद्धका प्रतिग्रह लेनेपर एक दिन और एक रात्रि (अहोरात्र)-का अनध्यायकाल मानना चाहिये*। पशु, मेढक, नेवला, कुत्ता, सर्प, बिडाल और सूअरके बीचमें आनेपर तथा शक्रध्वजके अवरोपणका दिन आनेपर एवं उत्सवका दिन होनेपर भी एक ही दिन-रात्रिका अनध्यायकाल होता है।

कुत्ता, सियार, गर्दभ, उलूक, सामवेद तथा बच्चोंके कोलाहल और पीड़ितजनोंकी दुःखभरी ध्वनि होनेपर, अपवित्र वस्तु, शव, शूद्र, अन्त्यज, श्मशान और पतित व्यक्तिका सामीप्य होनेपर तत्काल अनध्याय होता है। अपवित्र देशमें, अपवित्रावस्थामें,


* यह व्यवस्था एकोद्दिष्ट श्राद्धसे अतिरिक्त श्राद्धके लिये है। एकोद्दिष्ट श्राद्धका भोजन अथवा प्रतिग्रहमें तीन रात्रिका अनध्याय होता है।

(याज्ञवल्क्य मिताक्षरा आचाराध्याय श्लोक १४६)