गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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श्राद्धकी सम्पत्ति माने जाते हैं, अर्थात् इन्हें भोजन कराने या दान देनेसे अक्षय फलकी प्राप्ति होती है। ऐसे ही भानजा, श्राद्ध-योग्य ब्राह्मणोंके लक्षणोंसे विशिष्ट ऋत्विक्, यजुर्वेदके एकदेश-विशेषके अध्ययनके अङ्ग व्रतके आचरणके साथ उस एकदेशके अध्येता, दौहित्र, शिष्य तथा अन्य सम्बन्धी—बन्धु-बान्धव एवं कर्मनिष्ठ, तपोनिष्ठ पञ्चाग्नि¹-विद्याके अध्येता, ब्रह्मचारी, मातृ-पितृभक्त एवं ज्ञाननिष्ठ ब्राह्मण श्राद्धकी सम्पत्ति (श्राद्धमें भोजनीय एवं दान देने योग्य) हैं।
जो रोगी (महारोगसे युक्त), अङ्गहीन, अधिकाङ्ग, काण, पौनर्भव² (विधवाके पुनर्विवाहके अनन्तर उत्पन्न पुत्र), अवकीर्णी³ आदि⁴ आचारभ्रष्ट तथा अवैष्णव हैं, वे श्राद्धके योग्य नहीं हैं।
श्राद्धके एक दिन पूर्व ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करना चाहिये। निमन्त्रित ब्राह्मणोंको उस दिन संयम रखना चाहिये। श्राद्ध-दिवसके पूर्वाह्नकालमें उपस्थित उन ब्राह्मणोंको आचमन कराकर आसनोंपर बैठा दे। विश्वेदेव अथवा आभ्युदयिक श्राद्धके लिये दो ब्राह्मण तथा पितृपात्रके स्थानपर यथाशक्ति ब्राह्मणको बैठाना चाहिये अथवा इनमें दो ब्राह्मणोंको विश्वेदेवपात्रके आसनपर पूर्वाभिमुख तथा तीन ब्राह्मणोंको पितृपात्रके आसनपर उत्तराभिमुख अथवा दोनों (देव-पितर)-के लिये एक-एक ब्राह्मण आसनपर बैठाना चाहिये। इसी प्रकार मातामहादिके श्राद्धमें व्यवस्था करनी चाहिये और मातामह-श्राद्धमें विश्वेदेव-सम्बन्धी कृत्य अलग-अलग या एक साथ किया जा सकता है।
इसके बाद ब्राह्मणोंको हस्त-प्रक्षालनके लिये जल (हस्तार्घ्य) और आसनके लिये कुश प्रदानकर उन्हींकी अनुज्ञासे 'विश्वे देवास०' इस मन्त्रसे विश्वेदेवका आवाहन करके भोजन-पात्रमें यव विकीर्ण करे। तदनन्तर पवित्रकयुक्त अर्घ्यपात्रमें 'शं नो देवी०' इस मन्त्रसे उसमें जल तथा 'यवोऽसि०' मन्त्रद्वारा यव डालकर 'या दिव्या०' मन्त्रसे ब्राह्मणके हाथमें अर्घ्योदक प्रदानकर गन्ध, दीपक, माला, हार आदि आभूषण तथा वस्त्र दान करे।
तत्पश्चात् अपसव्य होकर पितरोंको अप्रदक्षिण (वाम)-क्रमसे स्थान (कुशरूपी आसन) प्रदान करे और (आसनके लिये मोटकरूप) द्विगुणित कुश देकर 'उशन्तस्त्वा०' मन्त्रसे उन पितरोंका आवाहन करे। उसके बाद पितृ-स्थानपर विराजमान ब्राह्मणकी आज्ञा लेकर 'आयन्तु नः पितरः०' इस मन्त्रका जप करे।
पितृकार्यमें यवके स्थानपर तिलोंका प्रयोग करना चाहिये और तिलके साथ उन पितृगणोंको पूर्ववत् अर्घ्यादि प्रदान करे। उन अर्घ्यों (अर्घ्यपात्रों)-के संस्रव (ब्राह्मणके हाथमें दिये गये अर्घ्योदकका नीचे गिरा हुआ जल)-को पितृपात्रमें रखकर और दक्षिणाग्र कुशस्तम्बको भूमिपर रखकर उसके ऊपर 'पितृभ्यः स्थानमसि०' इस मन्त्रके द्वारा उक्त अर्घ्यपात्र (पितरोंके वामभागमें) भूमिपर उलटकर रख दे। उसके बाद घृत-सम्मिश्रित अन्नको अग्निमें प्रदान करनेके लिये आचार्यसे श्राद्धकर्ता अग्नौकरणकी आज्ञा प्राप्त करे। जब आचार्य 'ऐसा ही करो' यह
१-पञ्चाग्नि—सभ्य, आवसथ्य, आहवनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि—ये पाँच अग्नियाँ हैं।
२-पौनर्भव—पुनर्भूसे उत्पन्न। पुनर्भू उस स्त्रीको कहते हैं, जो विवाहके पहले किसी दूसरे पुरुषसे विवाहित हो चुकी है अथवा किसी दूसरे पुरुषके संसर्गसे दूषित हो चुकी है।
३-अवकीर्णी—ब्रह्मचर्याश्रममें रहते हुए जिसका वीर्य स्खलित हो गया है।
४-आदिसे कुण्ड, गोलक, कुनखी एवं काले दाँतवाले ब्राह्मण समझे जाने चाहिये। पति जीवित रहते हुए दूसरे पुरुषसे उत्पन्न कुण्ड एवं पतिके निधनके बाद दूसरे पुरुषसे उत्पन्न गोलक होता है।