गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] श्राद्धके अवसर तथा अधिकारी; श्राद्धकी संक्षिप्त विधि, महिमा और फल १७३
कह दें तो उन्हें पितृयज्ञके समान ही उस अग्निमें युक्त घृताक्त हव्यका हवन करके आहुति करनेसे शेष बचे हुए अन्नको समाहित मनसे पितरोंके भोजन-पात्रोंमें रख दे। पितरोंके भोजन-पात्रोंके रूपमें यथाशक्ति चाँदीके पात्रोंका प्रयोग करना चाहिये।
‘पृथिवी ते पात्रं०’ मन्त्रसे पात्रको अभिमन्त्रित करे। ‘इदं विष्णुः’ मन्त्रका पाठ करे और ब्राह्मणके अंगुष्ठको पितरोंके लिये परिवेशित अन्नमें प्रवेशित करे। व्याहृतियोंके सहित ‘गायत्री’ एवं ‘मधुवाता०’ मन्त्रका जप करके सुखपूर्वक भोजन करें, इस प्रकार ब्राह्मणोंसे निवेदन करे और ब्राह्मण मौन होकर भोजन करें। श्राद्धकर्ता क्रोधादिसे रहित होकर बड़े ही श्रद्धा-भावसे उन ब्राह्मणोंको बिना शीघ्रता किये उनका अभीष्ट अन्न तथा हविष्यान्न उन्हें प्रदान करे और ब्राह्मणोंकी तृप्तितक ‘पुरुषसूक्त’ तथा ‘पवमानसूक्त’ आदिका जप करता रहे। उसके बाद पुनः पहलेके समान ‘मधुवाता०’ मन्त्रका पाठ करे और शेषान्नको लेकर उन संतृप्त ब्राह्मणोंके द्वारा ‘हम तृप्त हो गये’, इस प्रकार कहनेपर उन ब्राह्मणोंकी अनुज्ञासे श्राद्धकर्ता दक्षिणाभिमुख होकर तिलसहित उस शेषान्नको ब्राह्मणोंके उच्छिष्ट पात्रोंके समीपमें ही भूमिपर जलके साथ रख दे और प्रत्येक ब्राह्मणको मुख-प्रक्षालनके लिये अलग-अलग जल प्रदान करे।
उच्छिष्टके समीपमें पितर आदिके लिये पिण्डदान करके उसी प्रकार मातामहादिके लिये भी पिण्डदान करे। उसके बाद ब्राह्मणोंको आचमन कराये। तदनन्तर ब्राह्मणोंके ‘स्वस्ति’ ऐसा कहनेपर श्राद्धकर्ता ‘अक्षय्यमस्तु’ कहकर ब्राह्मणोंके हाथमें जल प्रदानकर यथासामर्थ्य दक्षिणा दे और ‘स्वधां वाचयिष्ये’ ऐसा कहे। ‘वाच्यताम्’ के द्वारा ब्राह्मण श्राद्धकर्ताको आज्ञा प्रदान करें। उनकी अनुज्ञा प्राप्तकर श्राद्धकर्ता पितृजनोंके लिये ‘स्वधा’ इस वाक्यका प्रयोग करे। पुनः उन ब्राह्मणोंके द्वारा ‘स्वधा’ ऐसा कह देनेके पश्चात् श्राद्धकर्ता पृथ्वीपर जलसिञ्चन करे।
‘विश्वेदेवाः प्रीयन्ताम्’ यह कहकर श्राद्धकर्ता विश्वेदेवोंको जल अर्पितकर उन्हें विसर्जित करे। तदनन्तर पितरोंसे इस प्रकारकी प्रार्थना करे—
दातारो नोऽभिवर्धन्तां वेदाः संततिरेव च॥
श्रद्धा च नो मा व्यगमद् बहु देयं च नोऽस्त्विति।
(९९। २६-२७)
पितृगण! हमारे यहाँ दाताओं, वेदों और संतानोंकी वृद्धि हो, हमारी श्रद्धा कभी न घटे, देनेके लिये हमारे पास बहुत सम्पत्ति हो। तदनन्तर ‘वाजे वाजे०’ इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए श्राद्धकर्ता प्रसन्नताके साथ यथाक्रम पितरोंका विसर्जन करे। जिस अर्घ्यपात्रमें पहले संस्रव-जल रखा गया था, उस पितृपात्र (अर्घ्यपात्र)-को सीधा कर दे तथा श्राद्धकर्ता उन आमन्त्रित ब्राह्मणोंका प्रदक्षिणाके साथ अनुगमन करते हुए उन्हें विदा करे। इसके पश्चात् श्राद्धसे अवशिष्ट अन्नका भोजन करके उस रात्रिमें सपत्नीक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करे।
विवाहादिक माङ्गलिक अवसरोंपर पितरोंका नान्दीमुख श्राद्ध करना चाहिये। उनके लिये दधि, कर्कन्धू (बदरी फल)-मिश्रित यवान्नका पिण्डदान करना चाहिये।
एकोद्दिष्ट* श्राद्ध विश्वेदेवसे रहित एकान्न और एक पवित्रकसे युक्त होता है। इस श्राद्धमें आवाहन और अग्नौकरण नहीं किया जाता। इस श्राद्धका सम्पूर्ण कृत्य अपसव्य अर्थात् दक्षिण कन्धेपर यज्ञोपवीत धारण करके करना चाहिये। श्राद्धकर्ता इस श्राद्धमें निमन्त्रित ब्राह्मणोंको पवित्र भूमिपर रखे हुए आसनपर ‘उपतिष्ठताम्’ कहकर बैठनेके लिये निवेदन करे। उसी प्रकार ‘अभिरम्यताम्’ कहकर विसर्जन करे। ब्राह्मणोंको भी ‘अभिरताः स्म’ यह वचन कहना चाहिये।
सपिण्डीकरण श्राद्धमें श्राद्धकर्ता तिल एवं
*एक व्यक्ति (पिता)-के उद्देश्यसे किया जानेवाला श्राद्ध एकोद्दिष्ट है।