गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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गन्धमिश्रित जलसे चार पात्रोंको परिपूर्ण करे। उन पितृपात्रोंमेंसे एक पात्रको अर्घ्य प्रदान करनेके लिये प्रेतपात्रके रूपमें कल्पित करे। तदनन्तर श्राद्धकर्ता प्रेतपात्रमें रखे हुए अर्घ्य-जलके कुछ भागको पिता आदिके तीन पात्रोंमें मिलाकर पूर्ववत् अर्घ्यादि क्रियाका सम्पादन करे। 'ये समाना०' इन दो मन्त्रोंके द्वारा प्रेतपिण्डको तीन भागोंमें विभक्तकर पितरोंके पिण्डोंमें मिला दे। इसके अनन्तर विहित एकोद्दिष्ट श्राद्ध स्त्री (माता)-का भी करना चाहिये। जिसका सपिण्डीकरण एक वर्षसे पूर्व होता है, उसके उद्देश्यसे भी एक वर्षपर्यन्त सान्नोदक कुम्भ प्रतिदिन, प्रतिमाह यथाशक्ति ब्राह्मणको देना चाहिये। पितरोंको समर्पित पिण्डोंको गौ, अज, ब्राह्मण, अग्नि अथवा जलको अर्पित कर दे।
हविष्यान्न (तिल, व्रीहि, यव आदि)-से श्राद्ध करनेपर पितृगणोंको एक मास तथा पायससे श्राद्ध करनेपर उन्हें एक वर्षपर्यन्त संतुष्टि प्राप्त होती है।
मृत व्यक्तियोंके लिये कृष्ण चतुर्दशी तिथिमें श्राद्ध करना चाहिये। ऐसा करनेपर श्राद्धकर्ताको मृत्युके पश्चात् स्वर्ग तो प्राप्त होता ही है, जीवनकालमें भी उन (श्राद्धकर्ता)-को उत्साह, शौर्य, क्षेत्र तथा शक्तिकी प्राप्ति होती है।
जो विधिवत् अपने पितृजनोंके लिये श्राद्ध करता है, वह पुत्र, सर्वजनश्रेष्ठता, सौभाग्य, समृद्धि, प्रमुखता, माङ्गलिक दक्षता, अभीष्ट कामना-पूर्ति, वाणिज्यमें लाभ, निरोगता, यश, शोकराहित्य, परम गति, धन, विद्या, वाक्-सिद्धि, पात्र, गौ, अज, आविक (भेंड़), अश्व और दीर्घायु प्राप्तकर अन्तकालमें मोक्ष-लाभ प्राप्त करता है। कृत्तिकादिसे भरणीपर्यन्त प्रत्येक नक्षत्रमें श्राद्ध करनेवाले व्यक्तिको भी इन सभी सुखोंकी प्राप्ति होती है। सुन्दर-सुन्दर वस्त्र तथा भवन आदि सुख-साधन स्वयं ही श्राद्धकर्ताको सुलभ होते हैं अर्थात् इस प्रकारका श्राद्धकर्ता भोजन, वस्त्र तथा भवन आदिसे परिपूर्ण रहता है।
पिता-पितामहादि पितर संतुष्ट होकर श्राद्धकर्ताको नित्य आयु, संतति, धन, विद्या, राज्य, सभी प्रकारके सुख, स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करते हैं।
(अध्याय ९९)
विनायकशान्ति-स्नान
याज्ञवल्क्यजीने कहा— हे ऋषियो! अब आप सभी विनायककी अप्रसन्नतासे ग्रस्त (आविष्ट) पुरुषके लक्षणोंका श्रवण करें।
विनायकसे ग्रस्त व्यक्ति स्वप्नावस्थामें बहुत अधिक स्नान करता है। उसे स्वप्नमें मरे हुए प्राणियोंके सिरोंका दर्शन होता है। वह उद्विग्नमन रहता है। उसके सारे प्रयत्न निष्फल रहते हैं। बिना कारण उसे पीड़ा होती है। विनायककी अप्रसन्नतासे युक्त होनेपर राजा राज्यसे वञ्चित रहता है, कुमारी पतिसे वञ्चित रहती है तथा गर्भिणी स्त्री पुत्र-लाभसे वञ्चित रहती है। अतएव विनायककी शान्तिके लिये किसी पवित्र दिन एवं शुभ मुहूर्तमें उसे विधिपूर्वक स्नान कराना चाहिये। स्नानकी विधि संक्षेपमें इस प्रकार है— भद्रासनपर बिठाकर ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचनपूर्वक स्नान कराना चाहिये। पीली सरसों पीसकर उसे घृत-मिश्रित करके उबटन बनाये और उस व्यक्तिके सम्पूर्ण शरीरमें मले। फिर उसके मस्तकपर सर्वौषधिसहित सब प्रकारके सुगन्धित द्रव्यका लेप करे। सर्वौषधियुक्त चार कलशोंके जलसे स्नान कराना चाहिये। सरोवर
१-ये चार पात्र पितरोंके लिये अलग-अलग विहित हैं। इनके अतिरिक्त विश्वेदेवके दो पात्र तो होते ही हैं।
२-इस एकोदिष्टका तात्पर्य यह है कि पार्वण श्राद्धमें माताका श्राद्ध अलगसे करना चाहिये (या० मिताक्षरा, श्रा० प्र० अ० श्लोक २५४)।