गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] * संन्यास-धर्म-निरूपण * १७७
गृह-अग्निके साथ वनमें जाय। शान्त एवं क्षमावान् रहकर वह अहर्निश देवोपासनामें निमग्न रहे। वह बिना जोती हुई भूमिसे उत्पन्न अन्नके द्वारा अग्निदेव, पितरों, देवताओं, अतिथियों तथा भृत्योंको तृप्त (संतुष्ट) करे। आत्मज्ञानमें तत्पर रहनेवाला वह वानप्रस्थी दाढ़ी, जटा तथा लोमराशिको धारण करे, इन्द्रियोंका दमन करे, त्रिकाल स्नान करे एवं अपनेको प्रतिग्रह अर्थात् दान-ग्रहणसे दूर रखे।
ऐसे व्यक्तिको स्वाध्यायवान्, भगवद्ध्यानपरायण तथा सभी लोगोंके हितसाधनमें लगे रहना चाहिये। उसको जीवनयापनके लिये सीमित अर्थ-संग्रह करना चाहिये।
उसके पास जो कुछ शेष सामग्री हो, उसका आश्विन-मासमें परित्यागकर वह व्रतादिके द्वारा ही समय व्यतीत करे। यदि शक्ति हो तो एक मास या एक पक्षका व्रतकर मास या पक्षके अन्तमें ही भोजन करे। ऐसे व्रती अपने दाँतोंको ही उलूखल मानकर उन्हींसे अन्नको तुषसे विहीनकर अपनी प्राण-रक्षाके लिये उपयोगमें लाते हैं।
वानप्रस्थीको चान्द्रायणव्रत करना चाहिये, भूमिपर सोना चाहिये और वह अपने सभी धार्मिक कृत्योंका सम्पादन यथासम्भव फलसे करे (अन्नसे नहीं)। वह ग्रीष्म-ऋतुमें पञ्चाग्निके^१ मध्य स्थित रहे, वर्षा-ऋतुमें स्थण्डिल (खुले चबूतरे)-पर शयन करे तथा हेमन्त-ऋतुमें आर्द्रवस्त्रोंको धारण करके योगाभ्यासके द्वारा अपने दिन व्यतीत करे।
जो काँटोंसे उसे पीड़ा पहुँचाये उसके प्रति भी क्रोध न करे और जो अङ्गोंमें चन्दनका अनुलेपन करे उसपर भी प्रसन्न न हो, उन दोनोंके प्रति वह समान भाव रखे। वानप्रस्थियोंमें दुःख और सुख भोगनेकी एक समान ही क्षमता होनी आवश्यक है। (अध्याय १०२)
संन्यास-धर्म-निरूपण
याज्ञवल्क्यजीने पुनः कहा—हे सज्जनवृन्द! अब मैं भिक्षु-धर्म (संन्यास-धर्म)-का वर्णन करूँगा। आप सब उसका ज्ञान प्राप्त करें।
गृहस्थाश्रम एवं वानप्रस्थाश्रममें विहित सभी श्रौत इष्टियोंको सम्पन्नकर सर्व वेद-सम्बन्धी दक्षिणा जिस इष्टिमें विहित है, उस प्राजापत्य इष्टिको भी सम्पन्न करके अन्तमें वेद-विहित विधानसे समस्त श्रौताग्नियोंको अपनेमें आरोपित करके संन्यास ग्रहण किया जा सकता है। संन्यासीको चाहिये कि वह सभी प्राणियोंका हितैषी हो, शान्त हो, त्रिदण्डी हो, (संन्यासीके लिये बाँसके बने तीन दण्ड धारण करनेका विधान है।) वह कमण्डलु धारण करे। सभी प्रकारके सुख-साधनयुक्त भवनोंका परित्यागकर भिक्षार्थी होकर ग्रामका आश्रय ग्रहण करे। प्रमादरहित होकर भिक्षाटन करे और सायंकाल ग्राममें न दिखलायी पड़े। जो ग्राम भिक्षुकोंसे^२ रहित हो, वहाँपर वह लोभशून्य होकर प्राणधारणमात्रके लिये भिक्षा माँगे।
यम-नियमका पालन करते हुए योग-सिद्ध होकर संन्यासीको एकदण्डी^३ अथवा परमहंस^४ बनना चाहिये। इस प्रकार रहता हुआ संन्यासी शरीरका परित्यागकर इसी लोकमें अमरत्व प्राप्त कर लेता है। दान देनेवाला, अतिथिका आदर करनेवाला, ब्रह्मज्ञ, यथाविधि श्राद्ध करनेवाला गृहस्थ भी मुक्ति प्राप्त कर लेता है। (अध्याय १०३)
१-चार दिशाओंमें चार अग्नि और ऊपर सूर्य।
२-व्यवसायकी दृष्टिसे अनेक प्रकारके पाखण्डके साथ भिक्षा माँगनेवाले यहाँ 'भिक्षुक' शब्दसे अभिप्रेत हैं।
३-बाँसके बने हुए तीन दण्डोंके विकल्पमें बाँसके एक दण्डके धारणका भी विधान है। अतः संन्यासी बाँसके एक दण्डको भी धारण कर सकता है। ऐसे संन्यासीको 'एकदण्डी' कहते हैं।
४-परमहंस उस अवधूतको कहते हैं, जो अपने शरीरकी ममतासे सर्वथा विनिर्मुक्त हो। ये यथेच्छ सवस्त्र-निर्वस्त्र आदि किसी भी रूपमें रह सकते हैं। इसके लिये कोई बन्धन नहीं होता।