भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१७८ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

कर्मविपाक-निरूपण

याज्ञवल्क्यजीने कहा—पापकर्मसे उत्पन्न होनेवाली नारकीय यातनाओंको भोगनेसे उस पापकर्मका क्षय होता है। शेष बचे हुए पापोंका शमन करनेके निमित्त प्राणी पुनः विभिन्न योनियोंमें जन्म ग्रहण करता है। यथा—

ब्रह्महन्ता नरकभोगके पश्चात् श्वान, गर्दभ और ऊँट-योनिमें उत्पन्न होता है। मदिरापायी व्यक्ति मेढक और जुआँ होता है। सुवर्णका चोर कृमि-कीट तथा गुरुतल्पगामी घास-फूसादिको योनिमें जन्म लेता है। इन योनियोंमें पाप-शमन होनेके पश्चात् वे ब्रह्महत्यादिके पापी पुनः यथाक्रम क्षयरोगी, काले दाँतवाले, कुत्सित नखवाले तथा शिपिविष्टक (कुष्ठरोगी) होकर जन्म ग्रहण करते हैं अथवा ये सभी दोष उक्त प्राणियोंकी संततिमें प्रकट होते हैं।

अन्नकी चोरी करनेवाला रोगी, वचन देकर उसका पालन न करनेवाला गूँगा, धान्यका अपहरणकर्ता अधिक अङ्गोंवाला, चुगलखोर दुर्गन्धसे युक्त नाकवाला, तेलका चोर तैलपायी अर्थात् तिलचट्टा कीट, अविद्यमान दोषकी सूचना देनेवाला दुर्गन्धयुक्त मुखवाला होता है।

ब्राह्मणके धनका हरण करनेवाला तथा कन्याको खरीदनेवाला व्यक्ति वनमें राक्षस तथा बैल होता है। रत्नका अपहरणकर्ता हीनजाति और शाक-पातका चोर मयूर-योनिमें जन्म लेता है। पुष्पका चोर छछुन्दरी, धान्यापहारी मूषक, फलका चोर वानर, पशुओंका हरण करनेवाला बकरी तथा दूधहर्ता काकयोनिमें उत्पन्न होता है।

मांस, वस्त्र और नमककी चोरी करनेवाले मनुष्य यथाक्रम—गृध्र, श्वेतकुष्ठी तथा चीरी<sup></sup> की योनि प्राप्त करते हैं। उस फलको भोगकर वे तिर्यग्योनिमें उत्पन्न होते हैं।

इस प्रकार भोग भोगनेके पश्चात् ये लक्षणभ्रष्ट पतितजन दूसरे जन्ममें दरिद्र या पुरुषाधम होते हैं। तत्पश्चात् अपने सत्कर्मोंसे निष्कलुष होकर वे योगोके महान् कुलमें जन्म लेते हैं और सुलक्षणोंसे युक्त होते हुए वे धन-धान्यसे सम्पन्न हो जाते हैं। (अध्याय १०४)


प्रायश्चित्त-विधान एवं सान्तपन, कृच्छ्र, पराक तथा चान्द्रायणादि व्रतोंका विविध स्वरूप

याज्ञवल्क्यजीने पुनः कहा—हे मुनियो ! विहित कर्म न करनेसे, निन्दित (निषिद्ध) कर्मका आचरण करनेसे एवं इन्द्रिय-निग्रह न करनेके कारण मनुष्य अधोगतिको प्राप्त करता है<sup></sup>। अतएव आत्मशुद्धिके लिये प्रयत्नपूर्वक प्रायश्चित्त करना चाहिये। इस प्रकार प्रायश्चित्त-कर्म करनेसे उसकी अन्तरात्मा प्रसन्न हो जाती है और लोक भी उसके साथ प्रसन्नतापूर्वक व्यवहार करता है। प्रायश्चित्तसे पापका विनाश भी हो जाता है। प्रायश्चित्त न करनेवाले तथा पश्चात्तापसे रहित पापीजन पापके प्रभावसे महारौरव नरकसे भी महाभयंकर तामिस्र, लोहशंकु, पूतिगन्ध, हंसाभ, लोहितोद, संजीवन, नदीपथ, महानिलय, काकोल, अन्धतामिस्र तथा तापन नामक नरकमें जाते हैं।

ब्रह्महन्ता, मद्यपी, ब्राह्मणके सुवर्णका<sup></sup> चोर, गुरुपत्नीगामी तथा इनका संसर्ग करनेवाले मनुष्य अपने पापके कारण अवीचि तथा कुम्भीपाक नामक महाभयानक नरकका भोग करते हैं।

गुरु एवं वेदकी निन्दा करना ब्रह्महत्याके


<sup>१-</sup> ऊँची आवाजवाला कीटविशेष (या० मिताक्षरा, प्रायश्चित्त प्रकरण श्लोक २१५)<br> <sup>२-</sup> विहितस्याननुष्ठानान्निन्दितस्य च सेवनात्। अनिग्रहाच्चेन्द्रियाणां नरः पतनमृच्छति॥ (१०५।१)<br> <sup>३-</sup> या० मिताक्षरा प्रा०प्र० श्लोक २२७।