गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] प्रायश्चित्त-विधान एवं सान्तपन, कृच्छ्र, पराक तथा चान्द्रायणादि व्रतोंका विविध स्वरूप १७९
समान हैं। निषिद्ध पदार्थका भक्षण, कुटिलतापूर्वक आचरण और रजस्वला स्त्रीका अधरपान मदिरापान नामक महापातकके सदृश माना जाता है। अश्व तथा रत्नादिका अपहरण, सुवर्ण-चोरीके महापापकी भाँति होता है। मित्रकी पत्नी, अपनी अपेक्षा उत्तम जातिकी कन्या, चाण्डाली और बहन तथा पुत्रवधूके साथ सहवास करना गुरुपत्नी-गमनके समान महापाप स्वीकार किया गया है। इसी प्रकार माता-पिताकी बहन, मामी, विमाता, आचार्यपुत्री, आचार्यपत्नी तथा पुत्रीके साथ रमण करनेवाला व्यक्ति भी गुरुपत्नीगामीके समान ही महापातकी होता है।
ऐसा महापापी मनुष्य लिंग-छेदनके पश्चात् वध करनेके योग्य होता है। इस प्रकारके पापमें यदि स्त्री सकाम होकर संश्लिष्ट होती है तो उसके लिये भी इसी प्रकारका प्रायश्चित्त-विधान कहा गया है।
गोहत्या, व्रात्यता (समयपर यज्ञोपवीत-संस्कार न होना अर्थात् सावित्रीच्युत होना), चोरी (ब्राह्मणका सुवर्ण अथवा सुवर्ण-सदृश अन्य द्रव्यका हरण करना), ऋण न लौटाना तथा देव, ऋषि एवं पितृ-ऋणसे मुक्त होना, अधिकारी होते हुए भी अग्न्याधान न करना, विक्री न करने योग्य लवण आदिका विक्रय करना, परिवेदन<sup>१</sup>, रुपये लेकर अध्ययन करानेवालेसे अध्ययन करना, रुपये लेकर अध्यापन करना, परस्त्रीके<sup>२</sup> साथ सहवास, परिवित्त्यै<sup>३</sup>, प्रतिषिद्ध सूदसे जीविकायापन, नमकका उत्पादन, स्त्रीवध, शूद्रवध, अधेक्षित वैश्य तथा क्षत्रियका वध करना और निन्दित धनसे जीविका चलाना, नास्तिकता, व्रतका लोप, सुत-विक्रय, माता-पिता तथा मित्रका परित्याग, तालाब-उद्यानका विक्रय, कन्याको दूषित करना, बड़े भाईकी उपेक्षा करके अग्न्याधान तथा विवाह करनेवालेको यजन कराना तथा ऐसे व्यक्तिको कन्यादान करना, गुरुसे अतिरिक्तके साथ कुटिलता करना, व्रतका लोप, केवल अपने लिये भोजन बनानेवाला, मद्यपान करनेवाली स्त्रीका सम्पर्क, स्वाध्याय, अग्नि, पुत्र तथा बन्धुका परित्याग, असत्-शास्त्रका अध्ययन, भार्या एवं अपना विक्रय—ये सभी निन्दित कर्म उपपातक कहे गये हैं। हे मुनियो ! आप अब इनके प्रायश्चित्तका ज्ञान प्राप्त करें—
ब्रह्महत्या करनेपर पापी व्यक्ति शिरःकपाल (खर्पर-खोपड़ी)-को हाथमें लेकर तथा दूसरा एक शिरःकपाल ध्वजके समान दण्डमें लगाकर चले और भिक्षामात्रसे जीविका-निर्वाह करता हुआ अपने पापकर्मका उद्घोष करते हुए बारह वर्षतक अल्प भोजन कर आत्मशुद्धि करे अथवा जानते हुए इच्छापूर्वक ब्रह्महत्या करनेपर ‘लोमभ्यः स्वाहा’ इत्यादि मन्त्रके अनुसार लोमसे शरीरके अवयवोंके प्रतिनिधिस्वरूप यथाविहित विभिन्न द्रव्योंकी आहुति देकर अन्तमें अपने शरीरका भी प्रायश्चित्त-विधानमें निर्दिष्ट विधानके अनुसार अग्निमें प्रक्षेप करे। अपने प्राणोंका त्याग करके ब्राह्मणकी रक्षा करनेसे भी ब्रह्महत्याकी शुद्धि हो जाती है।
अत्यधिक कष्ट देनेवाले दुःसह बहुकालव्यापी रोग या अन्य किसी प्रकारके भयरूप आतंकसे ग्रस्त ब्राह्मणको अथवा मार्गमें पड़ी हुई ऐसी ही गायको निरोग या निरान्तक करके भी ब्रह्महत्याके पापसे मुक्ति पायी जा सकती है। यदि कदाचित् प्रमादवश ऐसे ब्राह्मणकी हत्या किसीके द्वारा होती है, जो ब्राह्मणके लिये अपेक्षित गुणोंसे युक्त नहीं है
१-सहोदर ज्येष्ठ भाईके अविवाहित रहते हुए छोटा भाई यदि विवाह एवं अग्निहोत्र ग्रहण करता है तो वही परिवेदन नामक पाप है।
२-गुरु एवं गुरुके समान श्रेष्ठजनोंके अतिरिक्त स्त्री।
३-छोटे भाईके विवाह कर लेनेपर ज्येष्ठके द्वारा विवाह न करनेपर होनेवाला दोष पारिवित्य कहलाता है।