गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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करना चाहिये, किंतु जो पाप विख्यात नहीं है, उसका प्रायश्चित्त गुप्तरूपसे करना चाहिये।
गुप्तरूपसे किये जानेवाले कुछ प्रायश्चित्त इस प्रकार समझना चाहिये—ब्रह्महत्या करनेवाला पापी तीन रात्रियोंतक उपवास रखकर विशुद्ध जल (नदी आदिके जलमें निमग्न होकर)-के मध्य अघमर्षण-मन्त्रका जप करे और दूध देनेवाली गायका दान दे तो वह शुद्ध हो जाता है। किंतु यह प्रायश्चित्त अज्ञानमें होनेवाली ब्रह्महत्याके लिये विहित है। अज्ञानमें होनेवाली ब्रह्महत्याके निमित्त यह प्रायश्चित्त भी किया जा सकता है कि ब्रह्महत्याकर्ता अहोरात्रपर्यन्त वायुपान करते हुए जलमें रहनेके बाद प्रातःकाल जलसे बाहर आकर 'लोमभ्य स्वाहा॑०' इत्यादि आठ मन्त्रोंसे पाँच-पाँच आहुतियाँ यथाविधान अग्निमें दे।
मद्यपी एवं सुवर्णकी चोरी करनेवाले पापीको जलके मध्य स्थित होकर रुद्रदेवके मन्त्रका जप करते हुए तीन दिनका उपवास और कुष्माण्डी ऋचासे घृतकी आहुतियाँ देकर आत्मशुद्धि करनी चाहिये। गुरु-पत्नीके साथ सम्पर्क करनेवाला पापी 'सहस्त्रशीर्षा०' मन्त्रका जप करके पापसे विमुक्त हो जाता है।
सौ बार प्राणायाम करनेपर मनुष्य सर्वविध पापोंसे मुक्त हो जाता है। अज्ञानवश किये गये पापकी शान्ति त्रैकालिक संध्योपासनासे हो जाती है। ब्राह्मणोंके द्वारा एकादश आवृत्ति रुद्रानुवाकोंका जप करवानेसे भी पापका शमन होता है। वेदाभ्यास करनेवाले, शान्तिपरायण और पञ्चयज्ञके अनुष्ठाताको पापका स्पर्शतक नहीं होता। वायुमात्रका भक्षण करते हुए पूरे दिन सूर्यदर्शनके साथ एवं पूरी रात्रि जलमें रहकर एक सहस्र गायत्री-मन्त्रका जप करनेसे ब्रह्महत्यासे होनेवाले पापके अतिरिक्त अन्य समस्त पापोंसे मुक्ति हो जाती है।
ब्रह्मचर्य, दया, क्षमा, भगवद्ध्यान, सत्य, निष्कपटता, अहिंसा, अस्तेय (चोरी न करना), माधुर्य और दम—ये दस यम माने गये हैं। स्नान, मौन, उपवास, यज्ञ, स्वाध्याय, इन्द्रियनिग्रह, तपस्या, अक्रोध, गुरुभक्ति और पवित्रता—ये दस नियम कहे जाते हैं।
गोदुग्ध, गोदधि, गोघृत, गोमूत्र तथा गोमयको 'पञ्चगव्य' कहते हैं। इस पञ्चगव्यका कुशोदकके साथ पान कर व्रती दूसरे दिन उपवास करे। इस तरह दो रात्रिका कृच्छ्र-सान्तपनव्रत होता है। पहले दिन गोदुग्ध, दूसरे दिन गोदधि, तीसरे दिन गोघृत, चौथे दिन गोमूत्र, पाँचवें दिन गोमय, छठें दिन कुशोदक मात्र और सातवें दिन कुछ भी न लेकर शुद्ध उपवास कर जो व्रत पूर्ण किया जाता है, वही महासान्तपन नामक व्रत कहा जाता है।
पलाश, गूलर, कमल, बिल्वपत्र इनमेंसे एक-एकको एक-एक दिन जलमें पकाकर उसी जलको क्रमशः एक-एक दिन पीकर चार दिन रहे एवं पाँचवें दिन कुशोदकमात्र पीकर जिस व्रतका पालन किया जाता है, उसको पर्णकृच्छ्रव्रत कहते हैं। तप्तकृच्छ्रव्रतमें व्रतीको पहले दिन गरम गोदुग्ध, दूसरे दिन गरम घृत, तीसरे दिन गरम जलका प्राशन चौथे दिन उपवास करना चाहिये। यह पवित्र (शुद्ध) करनेवाला महातप्तकृच्छ्रव्रत है।
पहले दिन एकभक्तव्रत (चौबीस घण्टेमें मध्याह्नमें केवल एक बार भोजन करना), दूसरे दिन नक्तव्रत अर्थात् चौबीस घण्टेमें एक बार (रात्रिमें), तीसरे दिन अयाचित (बिना याचनासे प्राप्त) अन्नका भोजन करना, चौथे दिन पूर्ण
१- 'ऋतं च सत्यं०' आदि मन्त्र अघमर्षण है।
२- या० स्मृतिमें श्लोक २४७ में इन मन्त्रोंको दिया गया है।