भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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काण्ड ] अशौच तथा आपद्वृत्ति-निरूपण १८३


उपवास करनेपर पादकृच्छ्रव्रत होता है। इसी पादकृच्छ्रव्रतको तीन बार करनेसे प्राजापत्यकृच्छ्रव्रत होता है। प्राजापत्यव्रतके अनुसार भोजन और उपवासका नियम किया जाय परंतु भोजनके रूपमें उतना ही अन्न ग्रहण किया जाय, जितना एक हाथमें आता हो। इस तरह चार दिनका उपवास करनेसे अतिकृच्छ्रव्रत हो जाता है। इक्कीस दिनतक जल या दूधमात्र लेकर अतिकृच्छ्रव्रतका पालन करनेसे वह कृच्छ्रातिकृच्छ्रव्रत होता है। बारह दिन पूर्ण उपवास करनेपर एक पराकव्रत होता है।

पहले दिन जिनसे तेल निकाल लिया गया है ऐसे तिल, दूसरे दिन माँड़, तीसरे दिन मट्ठा, चौथे दिन जल तथा पाँचवें दिन सत्तूका आहारकर छठें दिन उपवास करना सौम्यकृच्छ्रव्रत कहलाता है। इस सौम्यकृच्छ्रव्रतमें बताये गये पदार्थोंका एक दिनके स्थानपर तीन-तीन दिनतक क्रमशः पंद्रह दिनतक चलनेवाला तुलापुरुषसंज्ञक कृच्छ्रव्रत होता है अर्थात् इस व्रतमें (प्रथम) तीन रात्रियोंतक निःसृत तेलवाले तिल, (द्वितीय) तीन रात्रियोंतक माँड़, (तृतीय) तीन रात्रियोंतक मट्ठा, (चतुर्थ) तीन रात्रियोंतक जल तथा (पञ्चम) तीन रात्रियोंतक सत्तूका भोजन करके एक दिनका उपवास करना चाहिये।

शुक्लपक्षमें तिथि-वृद्धि-क्रमसे मयूरके अण्डेके समान मात्रावाले एक-एक भोजन-ग्रासका अधिक आहार करते हुए पूर्णिमा तिथिको यह क्रम समाप्त करके पुनः कृष्णपक्षमें प्रतिदिन एक-एक अन्न-ग्रासका भक्षण-क्रमसे घटाते हुए चतुर्दशी तिथिको एक ग्रास भोजन करे एवं अमावास्याको उपवास करे, यह चान्द्रायणव्रत है। चान्द्रायणका अन्य प्रकार यह है—पूरे मासमें दो सौ चालीस ग्रास मात्र हविष्यान्न ग्रहण किया जाय। इन व्रतोंमें यह आवश्यक है कि प्रातः, मध्याह्न एवं सायंकालीन स्नान करके पवित्र-संज्ञक विशेष मन्त्रोंका जप करे तथा गायत्री-मन्त्रसे पिण्डग्रासको अभिमन्त्रित कर उसे ग्रहण करे।

जिन पापोंका प्रायश्चित्त शास्त्रोंमें नहीं बताया गया है, उन पापोंसे भी शुद्धि चान्द्रायणव्रतसे हो जाती है। किसी पापके निवारणके लिये प्रायश्चित्तरूपमें नहीं, अपितु पुण्य प्राप्त करनेकी दृष्टिसे जो इस चान्द्रायणव्रतका अनुष्ठान करता है, उसको चन्द्रलोककी प्राप्ति होती है। इसी प्रकार पुण्य प्राप्त करनेके लिये ही जो कृच्छ्रव्रत करता है, वह महान् ऐश्वर्यका लाभ प्राप्त करता है। (अध्याय १०५)


अशौच तथा आपद्वृत्ति-निरूपण

**याज्ञवल्क्यजीने कहा—**हे यतियो! अब मैं मृत्युके पश्चात् होनेवाले मरणाशौचका वर्णन करता हूँ, उसका श्रवण करें।

दो वर्षसे कम आयुवाले बालककी मृत्यु होनेपर उसको मिट्टीमें गाड़ देना चाहिये।<sup></sup> उसके लिये जलाञ्जलि न दें। दो वर्षसे अधिक आयुके बालककी मृत्यु होनेपर उसे सभी बन्धुगण मिलकर श्मशानभूमिमें ले जाकर लौकिक अग्निसे 'यमसूक्त' का पाठ करते हुए चितामें जला दें। यज्ञोपवीत होनेके अनन्तर मृत्यु होनेपर सभी क्रियाएँ आहिताग्निके समान करे। मरणतिथिके सातवें दिन अथवा दसवें दिनके पहले अपने कुल एवं गोत्रमें आनेवाले परिजन<sup></sup> 'अप नः शोशुचदघम्<sup></sup>' मन्त्रसे दक्षिण दिशाकी ओर अभिमुख होकर यथासम्भव


<sup>१-ऐसे शवको गन्ध, माल्य, अनुलेपन आदिसे अलंकृत करके श्मशानसे अन्यत्र हड्डियोंके समूहसे रहित, ग्राम या नगरके बाहरकी भूमिमें गड्ढा खोदकर रखना चाहिये। (मनुस्मृति ५। ६८-६९)</sup>
<sup>२-समानगोत्र, समानपिण्ड एवं समानोदकवाले लोग।</sup>
<sup>३-ऋग्वेद १। ९७। १-८।</sup>