गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 194, कुल 634 में से
संदर्भ में पढ़ें| १८४ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
|---|
घरसे बाहर जलाशयपर जाकर जलाञ्जलि दे। इसी प्रकार मातामह तथा आचार्य-पत्नी आदिकी भी उदकक्रिया करनी चाहिये।
मित्र, विवाहित स्त्री (लड़की, बहन आदि), भागिनेय, श्वशुर और ऋत्विक्का यदि मरण हुआ है तो इनके अभ्युदयके लिये इन्हें सविधि जलाञ्जलि देनी चाहिये और वह जलाञ्जलि इनके नाम, गोत्रका उल्लेख करते हुए एक ही बार देनी चाहिये। पाखण्डी एवं पतितजनोंकी मृत्यु होनेपर उनकी उदकक्रिया नहीं होती। ब्रह्मचारी, व्रात्य तथा स्वेच्छाचारिणी स्त्रीके लिये भी उदकक्रियाका निषेध है। मद्यपी और आत्महत्या करनेवाले अशौच और उदकक्रियाके पात्र नहीं होते।
व्यक्तिके निधनपर रोना निषिद्ध है, क्योंकि जीवोंकी स्थिति अनित्य होती है। यथाशक्ति श्मशानभूमिमें दाहादिक क्रिया करके स्वजनोंको घर आना चाहिये। द्वारपर पहुँचकर वे सबसे पहले निम्बकी पत्ती चबाकर, तदनन्तर आचमन करके अग्नि, जल, गोबर और श्वेत सरसोंका स्पर्श कर पत्थरपर पैर रखकर धीरेसे घरमें प्रवेश करें। प्रेतका संस्पर्श करनेपर भी मनुष्यको घरमें प्रविष्ट होनेके पूर्व उक्त विहित-कर्म कर लेना चाहिये। सपिण्डमें आनेवाले जो लोग पुण्यप्राप्त करनेमात्रकी दृष्टिसे प्रेतका अनुगमन अर्थात् उसकी दाह-क्रिया आदिमें सम्मिलित होते हैं और वे यदि तत्काल अपनी शुद्धि चाहते हैं तो दाह-क्रिया सम्पन्न करानेके अनन्तर उन्हें स्नान एवं प्राणायाम कर लेना चाहिये।
उस दिन खरीदे हुए पदार्थोंका भोजन करके* सभी परिजनोंको अलग-अलग भूमिपर सोना चाहिये। पिण्डयज्ञके पश्चात् मृत व्यक्तिके उद्देश्यसे विहित पिण्डदानकी प्रक्रियाके अनुसार अपसव्य आदिके रूपमें तीन दिनतक पिण्डरूप अन्न पृथ्वीपर मौन धारण करते हुए दे। श्राद्धके लिये अधिकृत व्यक्ति खुले हुए आकाशके नीचे एक शिक्य आदिके मिट्टीके पात्रमें जल और दूसरे मिट्टीके पात्रमें दूध उस प्रेतात्माको समर्पित करे। श्राद्धकर्ताको अशुचि होनेपर भी श्रौत अग्नि एवं स्मार्त अग्निमें किये जानेवाले नित्यकर्म (अग्निहोत्र, दर्श पूर्णमास, स्मार्त अग्निमें विहित सायं-प्रातः होम)-का अनुष्ठान श्रुतिकी आज्ञाके अनुसार करना ही चाहिये।
यदि जन्मके पश्चात् और दाँत निकलनेके पूर्व बालककी मृत्यु हो जाती है तो उनके सम्बन्धियोंकी सद्यः शुद्धि हो जाती है। दाँत निकलनेके पश्चात् चूड़ाकरणतक एक अहोरात्रका अशौच होता है और उपनयन-संस्कारके पहले और चूड़ाकरणके बाद बालककी मृत्यु होनेपर तीन रात्रिके बाद अशौच समाप्त होता है। उपनयन-संस्कारके पश्चात् मृत्यु होनेपर दस रात्रियोंका अशौच होता है। सपिण्डोंके लिये दस रात्रिका एवं समानोदक लोगोंके लिये तीन रात्रिका अशौच होता है।
दो वर्षसे कम आयुवाले पुत्र एवं पुत्रीकी मृत्युपर माता-पिता दोनोंको दस रात्रिका अशौच होता है। यदि इस मरणाशौचके मध्य परिवारमें किसी बालकका जन्म या किसीकी मृत्यु होती है तो प्रथम अशौचके शेष दिनोंके पश्चात् ही शुद्धि हो जाती है।
सपिण्डकी मृत्यु होनेपर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रके लिये क्रमशः—दस, बारह, पंद्रह तथा तीस दिनोंका अशौच माना गया है। पाणिग्रहण-संस्कारके पूर्व और वाग्दानके पूर्व तथा चूड़ाकरणके बाद कन्याकी मृत्यु होनेपर एक अहोरात्रमें ही शुद्धि हो जाती है। या० स्मृति २४वें श्लोककी मिताक्षराके अनुसार दाँत निकलनेके पूर्व यदि
* बिना माँगे हुए अन्नमात्रका भोजन करना चाहिये।