भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१८८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

होते हैं। अतः ये दोनों पुत्र अपने पिताके लिये पिण्डदान कर सकते हैं।

परिवेत्ता<sup></sup> एवं परिवित्ति (बड़े भाईद्वारा अपने विवाहकी अस्वीकृति देनेवाला)-को अपनी शुद्धिके लिये कृच्छ्रव्रत करना चाहिये। इसी प्रकार कन्याको भी कृच्छ्रव्रत करना चाहिये। ऐसी कन्याके दान देनेवालेको अतिकृच्छ्रव्रत तथा विवाह-विधि सम्पन्न करानेवालेको चान्द्रायणव्रत करना चाहिये।

यदि बड़ा भाई कुबड़ा, बौना, नपुंसक, हकलाने-वाला, मूर्ख, जन्मान्ध, बहरा तथा गूँगा हो तो छोटे भाईके द्वारा विवाह कर लेनेमें कोई दोष नहीं होता।

जिसे वाग्दानमात्र किया गया है ऐसा भावी पति यदि परदेश चला जाय, मर जाय, संन्यास-धर्मका अवलम्बन कर ले, नपुंसक हो अथवा पतित हो गया हो तो इन पाँच आपदाओंमें वाग्दत्ता कन्या दूसरे पतिका वरण कर सकती है। अपने पतिके साथ सतीधर्मके अनुसार अग्निमें प्रवेश करनेवाली स्त्री शरीरमें स्थित रोमोंकी संख्याके बराबर वर्षोंतक स्वर्गमें निवास करती है।

कुत्ता आदिके काटनेपर मनुष्यको गायत्री-मन्त्रके जपसे शुद्धि करनी चाहिये। जिसे स्वयं गायत्री-जपका अधिकार नहीं है, उसे ब्राह्मणद्वारा गायत्री-जप कराना चाहिये। चाण्डाल आदिके द्वारा मारा गया अग्निहोत्री ब्राह्मण लौकिक अग्निसे जलाने योग्य होता है। [उस अग्निसे जलाये गये] ब्राह्मणकी अस्थियोंको दूधमें प्रक्षालित करके पुनः विधिवत् मन्त्रपूर्वक अपने अग्निहोत्रशालाकी अग्निसे प्रदग्ध करना चाहिये। यदि मृत्यु प्रवासकालमें होती है तो परिजनको अपने घरपर उस मृत व्यक्तिका कुशसे शरीर बनाकर पुनः अग्निदाह करना चाहिये।

कृष्णमृगचर्मपर छः सौ पलाशपत्रोंको (मृतककी आकृतिके समान) बिछाकर अथवा कुशमय शरीरका निर्माण करके शिश्न-भागपर शमी तथा वृषण-भागपर अरणिके काष्ठको स्थापित करे। उसके दायें हाथके स्थानपर कुण्ड (स्थाली) और बायें हाथके स्थानपर उपभृत [यज्ञियपात्र], पार्श्वभागमें उलूखल तथा पीठकी ओर मूसल रखे। तत्पश्चात् उस शवके वक्षःस्थलपर [सोमरस तैयार करनेके लिये प्रयोगमें आनेवाले] पत्थरको रखकर उसके मुखभागमें घृत-तण्डुल और तिल डालना चाहिये। कानके पास प्रोक्षणीपात्र और नेत्रोंके संनिकट आज्यस्थाली रखे। कान, नेत्र, मुख तथा नासिका-भागमें स्वर्ण-खण्ड रखनेका विधान है। इस प्रकार अग्निहोत्रके समस्त उपकरणोंके सहित उस अग्निहोत्रीका शवदाह करनेसे वह (मृत अग्निहोत्री) ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है। 'असौ स्वर्गाय लोकाय स्वाहा' इस मन्त्रसे घृतकी एक आहुति देनी चाहिये।

हंस, सारस, क्रौँच, चक्रवाक, कुक्कुट, मयूर और मेषका वध करनेवाला मनुष्य एक दिन तथा एक रात्रिके उपवासके पश्चात् पापसे शुद्ध हो जाता है। अन्य सभी पक्षियोंका वध करनेपर एक अहोरात्रमें शुद्धि होती है।

सभी प्रकारके चतुष्पद पशुओंका वध करनेपर जो पाप मनुष्यको लगता है, उसका अवमोचन खड़े होकर एक अहोरात्र उपवास कर [गायत्री] मन्त्रका जप करनेसे होता है।

शूद्रका वध करनेपर कृच्छ्रव्रत, वैश्यकी हत्या करनेपर अतिकृच्छ्रव्रत, क्षत्रियका वध करनेपर बाईस चान्द्रायणव्रत एवं ब्राह्मणकी हत्या करनेपर तीस चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। (अध्याय १०७)


१-ज्येष्ठ भ्राताके अविवाहित रहते हुए अपना विवाह कर लेनेवाला छोटा भाई 'परिवेत्ता' कहा जाता है और परिवेत्ताका अविवाहित बड़ा भाई 'परिवित्त' कहा जाता है।