भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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काण्ड ] बृहस्पतिप्रोक्त नीतिसार १८९

बृहस्पतिप्रोक्त नीतिसार

सूतजीने कहा— हे ऋषियो ! अब मैं 'अर्थशास्त्र' आदिपर आश्रित नीतिसार कह रहा हूँ, जो राजाओंके साथ ही अन्य सभीके लिये भी हितकर तथा पुण्य, आयु और स्वर्गादिको प्रदान करनेवाला है।

जो मनुष्य [धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इस पुरुषार्थचतुष्टयकी] सिद्धि चाहता है, उसको सदैव सज्जनोंकी ही संगति करनी चाहिये। दुर्जनोंके साथ रहनेसे इस लोक अथवा परलोकमें हित सम्भव नहीं है—

सद्भिः सङ्गं प्रकुर्वीत सिद्धिकामः सदा नरः।
नासद्भिरिहलोकाय परलोकाय वा हितम्॥
(१०८।२)

क्षुद्रके साथ वार्तालाप और दुष्ट व्यक्तिका दर्शन नहीं करना चाहिये। शत्रुसे सेवित व्यक्तिके साथ प्रेम न करे और मित्रके साथ विरोध न करे। मूर्ख शिष्यको उपदेश देनेसे, दुष्ट स्त्रीका भरण¹-पोषण करनेसे तथा दुष्टोंका किसी कार्यमें सहयोग लेनेसे विद्वान् पुरुष भी अन्तमें दुःखी हो जाता है। मूर्ख ब्राह्मण, युद्ध-पराङ्मुख क्षत्रिय, विवेकरहित वैश्य और अक्षरसंयुक्त शूद्रका परित्याग तो दूरसे ही कर देना चाहिये। कालकी प्रबलतासे शत्रुके साथ संधि और मित्रसे विग्रह (शत्रुता) हो जाता है। अतः कार्य-कारण-भावका विचार करके ही पण्डितजन अपना समय व्यतीत करते हैं।

समय प्राणियोंका पालन करता है। समय ही उनका संहार करता है। उन सभीके सोनेपर समय (काल) जागता रहता है। अतः समय बड़ा ही दुरतिक्रम है (अर्थात् समयको जीतना बड़ा ही कष्टसाध्य है)। समयपर ही प्राणीके पराक्रमका क्षरण होता है। समय आनेपर ही प्राणी गर्भमें आता है। समयके आधारपर उसकी सृष्टि होती है और पुनः समय ही उसका संहार भी करता है। काल निश्चित ही नियमसे नित्य सूक्ष्म गतिवाला ही होता है तब भी हमारे अनुभवमें उसकी गति दो प्रकारसे होती है, जिसका अन्तिम परिणाम जगत्का संग्रह ही होता है। यह गति स्थूल एवं सूक्ष्म-रूपमें दो प्रकारकी होती है।

ऋषियो! बृहस्पतिने इन्द्रसे इस नीतिसारका वर्णन किया था, जिसके कारण सर्वज्ञ होकर इन्द्रने दैत्योंका विनाश करके देवलोकका आधिपत्य प्राप्त किया था।

ब्राह्मणकल्प राजर्षियोंको नित्य देवता एवं ब्राह्मण आदिका पूजन करना चाहिये तथा महान् पातकोंको नष्ट करनेवाले अश्वमेधयज्ञका अनुष्ठान करना चाहिये।

उत्तम प्रकृतिवाले सज्जनोंकी संगति, विद्वानोंके साथ सत्कथाका श्रवण और लोभरहित मनुष्यके साथ मैत्रीसम्बन्ध स्थापित करनेवाला पुरुष दुःखी नहीं होता²।

[दूसरेकी] निन्दा, दूसरेका धन-ग्रहण, परायी स्त्रीके साथ परिहास तथा पराये घरमें निवास कभी नहीं करना चाहिये। हितकारी अन्य व्यक्ति भी अपने बन्धु हैं और यदि बन्धु अहितकर है तो वह भी अपने लिये अन्य है। शरीरसे ही उत्पन्न हुई व्याधि अहितकर होती है, किंतु वनमें उत्पन्न हुई औषधि उस व्याधिका निराकरण करके मनुष्यका हित-साधन करती है। जो मनुष्य सदैव हितमें तत्पर रहता है, वही बन्धु है। जो भरण-पोषण करता है, वही पिता है। जिस व्यक्तिमें विश्वास रहता है, वही मित्र है और जहाँपर मनुष्यका


¹ यथाशक्ति भरण-पोषणका प्रयास करना चाहिये और यदि स्त्रीके दुष्ट स्वभाववश भरण-पोषण कदाचित् अशक्य हो रहा है या पारिवारिक-सामाजिक व्यवस्था उच्छिन्न हो रही है, तब इस व्यवस्थाको ध्यानमें रखना चाहिये।
² उत्तमैः सह साङ्गत्यं पण्डितैः सह सत्कथाम्। अलुब्धैः सह मित्रत्वं कुर्वाणो नावसीदति॥ (१०८।१२)