गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १९० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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जीवन-निर्वाह होता है, वही उसका देश है<sup>१</sup>।
जो आज्ञापालक है, वही वास्तविक भृत्य (सेवक) है; जो बीज अंकुरित होता है, वही बीज है; जो पतिके साथ प्रिय सम्भाषण करती है, वही वास्तविक भार्या है। पिताके जीवनपर्यन्त पिताके भरण-पोषणमें जो पुत्र लगा रहता है, वही वास्तवमें पुत्र है। जो गुणवान् है, उसीका जीवन वास्तवमें सार्थक है। जो धर्ममें प्रवृत्त है, वही जीवित है; जो गुण-धर्मविहीन है, उसका जीवन निष्फल है।
जो भार्या गृहकार्यमें दक्ष है, जो प्रियवादिनी है, जिसके पति ही प्राण हैं और जो पतिपरायणा है वास्तवमें वही भार्या है<sup>२</sup>। जो नित्य स्नान करके अपने शरीरको सुगन्धित द्रव्य-पदार्थोंसे सुवासित करनेवाली है, प्रियवादिनी है, अल्पाहारी है, मितभाषिणी है, सदा सब प्रकारके मङ्गलोंसे युक्त है, जो निरन्तर धर्मपरायण है, निरन्तर पतिकी प्रिय है, सदा सुन्दर मुखवाली है तथा जो ऋतुकालमें ही पतिके सहगमनकी इच्छा रखती है, वही भार्या है।
—इन लक्षणोंसे समन्वित स्त्री समस्त सौभाग्योंकी अभिवृद्धिकारिणी होती है। जिस मनुष्यकी ऐसी भार्या है वह मनुष्य नहीं देवराज इन्द्र है।
जिस मनुष्यकी भार्या विरूप नेत्रोंवाली, पापिनी, कलहप्रिय और विवादमें बढ़-चढ़कर बोलनेवाली है, वह पतिके लिये वास्तवमें वृद्धावस्था ही है, वास्तविक वृद्धावस्था वृद्धावस्था नहीं है। जिसकी भार्या परपुरुषका आश्रय ग्रहण करनेवाली है, दूसरेके घरमें रहनेकी आकांक्षा रखती है, कुकर्ममें संलग्न है तथा निर्लज्ज है, वह (पतिके लिये) साक्षात् वृद्धावस्था-स्वरूप है।
जिस पुरुषकी भार्या गुणोंका महत्त्व समझनेवाली, पतिका अनुगमन करनेवाली और स्वल्पसे भी स्वल्प वस्तुसे संतुष्ट रहनेवाली है; पतिके लिये वही सच्ची प्रियतमा है, सामान्य प्रिया नहीं है।
दुष्ट पत्नी, दुष्ट मित्र तथा प्रत्युत्तर देनेवाला भृत्य और सर्पयुक्त घरमें निवास साक्षात् मृत्यु ही है।
मनुष्यको दुर्जनोंकी संगतिका परित्याग करके साधुजनोंकी संगति करनी चाहिये और दिन-रात्रि पुण्यका संचय करते हुए नित्य अपनी अनित्यताका स्मरण रखना चाहिये—
त्यज दुर्जनसंसर्गं भज साधुसमागमम्।
कुरु पुण्यमहोरात्रं स्मर नित्यमनित्यताम्॥ (१०८।२६)
जो स्त्री सर्पके कण्ठमें रहनेवाले विषके समान है, जो सर्पके फणोंके सदृश भयंकर है, जो रौद्ररसकी साक्षात् मूर्ति है, जो शरीरसे कृष्णवर्णकी है, जो रक्तके सदृश लाल-लाल नेत्रोंके द्वारा दूसरेके हृदयको भयभीत कर देनेवाली है, जो व्याघ्रके समान भयानक है, जो क्रोधवदना एवं प्रचण्ड अग्निकी ज्वालाकी भाँति धधकनेवाली और काकके समान जिह्वालोलुप है, अपने पतिसे प्रेम न रखनेवाली है, भ्रमितचित्तवाली तथा दूसरेके पुर (घर-नगर) आदिमें जानेवाली अर्थात् परपुरुषकी इच्छा रखनेवाली है, वह स्त्री कदापि सेव्य नहीं है।
दैववश कभी अल्प सामर्थ्यवान् व्यक्ति भी शक्तिशाली हो सकता है, कृतघ्न व्यक्ति भी कभी सुकृत कर सकता है, अग्निमें कभी शीतलता भी आ सकती है, हिममें उष्णता भी आ सकती है; किंतु वेश्यामें [पुरुषविषयक] अनुराग नहीं हो सकता।
घरके अंदर भयंकर सर्प देख लिये जानेपर, चिकित्सा होनेपर भी रोग बने ही रहनेपर, बाल्य-युवा आदि अवस्थासे युक्त यह शरीर कालसे आवृत है। यह समझनेपर भी कौन ऐसा व्यक्ति है, जो धैर्य धारण कर सकता है? (अध्याय १०८)
१-परोऽपि हितवान् बन्धुर्बन्धुरप्यहितः परः। अहितो देहजो व्याधिर्हितमारण्यमौषधम्॥
स बन्धुर्यो हिते युक्तः स पिता यस्तु पोषकः। तन्मित्रं यत्र विश्वासः स देशो यत्र जीव्यते॥ (१०८। १४-१५ )
२-सा भार्या या गृहे दक्षा सा भार्या या प्रियंवदा। सा भार्या या पतिप्राणा सा भार्या या पतिव्रता॥ (१०८। १८)