गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] नीतिसार-निरूपण १९३
लोग यथोचित विभागके साथ अपने काममें ले लेते हैं; परंतु प्राणोंको संकटमें डालकर धनार्जनके लिये परिश्रम करनेवाला व्यक्ति धनके लोभमें जिन पापोंको करता है, वे पाप ही उसकी धरोहर बनकर उसकी नरक-यातनाके अथवा कुत्सित योनिके कारण बनते हैं।
संचित किया हुआ तथा बार-बार विचार करके सुरक्षित रखा हुआ, कदर्य (कृपण)-का धन चूहेके द्वारा एकत्रित किये गये धनके तुल्य है। ऐसा धन दुःख देनेके लिये ही होता है। उपार्जनकर्ताको उससे कोई भी सुख प्राप्त नहीं होता। ऐसा व्यक्ति मात्र धनार्जनका कष्ट ही भोगता है।
ऐसे ही व्यक्ति जन्मान्तरमें दरिद्र होनेके कारण नग्न होकर अनेक प्रकारके व्यसनसे त्रस्त हो रूखे स्वभाववाले हो जाते हैं तथा हाथमें खप्पर लेकर घर-घर भीख माँगते हैं और यह लोगोंको बताते हैं कि दान न देनेवालेको ऐसा ही फल मिलता है। ऐसे भिक्षुक कुछ दीजिये, कुछ दीजिये—ऐसी बार-बार याचना करते हुए संसारको यह शिक्षा प्रदान करते हैं कि दान न देनेवाले मनुष्यकी यही दशा होती है। आपकी भी मेरी-जैसी दुर्दशा न हो, इसलिये आपको दान देना चाहिये*।
कृपण अपने द्वारा संचित धन यज्ञोंमें नहीं लगा पाता है और अपने द्वारा माँगकर इकट्ठा किये धनको गुणवानोंको भी नहीं देता है। इस प्रकारका कृपणके द्वारा सुरक्षित धन चोर और राजाके काममें ही आता है। कृपणका धन देवता, ब्राह्मण, बन्धु तथा आत्महितके लिये नहीं होता, वह तो अग्नि, चोर अथवा राजाके लिये होता है। अत्यन्त कष्टसे अर्जित किया गया धन, धर्मका अतिक्रमण करके अर्जित किया गया धन अथवा शत्रुको साष्टाङ्ग प्रणाम करके और उसकी अधीनता स्वीकार करके प्राप्त किया गया धन—इस प्रकारका धन तुझे कभी प्राप्त न हो।
विद्याका अभ्यास न करनेसे वह विनष्ट हो जाती है। शक्ति रहते हुए फटे-पुराने, मैले-कुचैले वस्त्रोंको धारण करनेवाली स्त्रियाँ सौभाग्यकी रक्षा नहीं कर पातीं, सुपाच्य भोजनसे रोग नष्ट हो जाता है और चातुर्यपूर्ण नीतिसे शत्रु़का विनाश हो जाता है।
चोरका वध ही उसका दण्ड है। दुष्ट मित्रके लिये समुचित दण्ड उसके साथ अल्प वार्तालाप करना है। स्त्रियोंका दण्ड उनसे पृथक् शय्यापर शयन करना तथा ब्राह्मणके लिये दण्ड निमन्त्रण न देना है।
दुर्जन, शिल्पकार, दास तथा दुष्ट एवं ढोलक आदि वाद्य और स्त्री आदि सम्यक् अनुशासनसे ही मृदु-स्वभावको प्राप्त करते हैं। ये सत्कारमात्रसे मृदु स्वभाववाले नहीं हो पाते।
कार्यमें संलग्न करनेसे भृत्य, दुःख होनेपर बन्धु-बान्धव, विपत्तिकालमें मित्र तथा ऐश्वर्यके नष्ट होनेपर स्त्रीके स्वभावकी परीक्षा करनी चाहिये—
जानीयात् प्रेषणे भृत्यान् बान्धवान् व्यसनागमे।
मित्रमापदि काले च भार्यां च विभवक्षये॥
(१०९।३२)
पुरुषोंकी अपेक्षा स्त्रियोंका आहार दुगुना, बुद्धि चौगुनी, कार्यकी क्षमता छःगुनी और कामवासना आठगुनी अधिक मानी गयी है। स्वप्नसे निद्राको नहीं जीता जा सकता, कामवासनासे स्त्रीपर विजय नहीं प्राप्त की जा सकती, ईंधनसे अग्निको तृप्त नहीं किया जा सकता तथा मद्यसे प्यास नहीं बुझायी जा सकती। मांसयुक्त स्निग्ध भोजन, नाना प्रकारकी मदिराओंका पान, सुगन्धित द्रव पदार्थोंका
* शिक्षयन्ति च याचन्ते देहीति कृपणा जनाः। अवस्थेयमदानस्यः मा भूदेवं भवानपि ॥ (१०९।२५)