भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१९४संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

विलेपन, सुन्दर वस्त्र और सुवासित माल्याभरण— ये स्त्रियोंकी कामवासनाकी अभिवृद्धि करते हैं। जैसे लकड़ियोंके अधिक-से-अधिक ढेरको प्राप्त करके भी अग्नि संतुष्ट नहीं होती; नदीसमूहके मिलनेपर भी समुद्र तृष्णारहित होकर संतृप्त नहीं होता; यमराज सभी प्राणियोंका संहार करके भी आत्मसंतुष्टि प्राप्त करनेमें असमर्थ हैं; ऐसे ही नारी असंख्य पुरुषोंके साथ सम्पर्क करके भी संतृप्त नहीं होती।

शिष्ट व्यक्ति (सुशील), अभीष्ट-सिद्धि, प्रियवचन, सुख, पुत्र, जीवन और देवगुरुसे प्राप्त आशीर्वचनसे मनुष्यकी इच्छाएँ परिपूर्ण नहीं होतीं, इनके लिये अभिलाषा बढ़ती ही रहती है। धनके संग्रहसे राजा, नदियोंकी जलराशिसे समुद्र, सम्भाषणसे विद्वान् एवं राजदर्शनसे प्रजाके नेत्र संतुष्ट नहीं हो पाते।

अपने विहित कर्म तथा धर्माचरणका पालन करते हुए जीविकोपार्जनमें तत्पर, सदैव शास्त्र-चिन्तनमें रत तथा अपनी स्त्रीमें अनुरक्त, जितेन्द्रिय और अतिथिसेवामें निरत श्रेष्ठ पुरुषोंको तो घरमें भी मोक्ष प्राप्त हो जाता हैं।

जिस सत्कर्मनिरत पुरुषके पास मनोऽनुकूल, सुन्दर वस्त्राभूषणसे अलंकृत स्त्री है, यदि वह व्यक्ति उसके साथ अपने भवनकी अटारीपर सुखपूर्वक निवास करता है तो उसके लिये यहींपर स्वर्गका सुख है।

जो स्त्रियाँ स्वभावसे ही धर्म-विरुद्ध आचरण करनेवाली एवं पतिके प्रतिकूल व्यवहार रखनेवाली हैं, वे स्त्रियाँ न धन आदिके दान, न सम्मान, न सरल व्यवहार, न सेवाभाव, न शस्त्र-भय और न शास्त्रोपदेशसे ही अनुकूल की जा सकती हैं, वे तो सदा प्रतिकूल ही रहती हैं²।

विद्यार्जन, अर्थ-संग्रह, पर्वतारोहण, अभीष्ट-सिद्धि तथा धर्माचरण—इन पाँचोंको धीरे-धीरे प्राप्त करना चाहिये।

देवपूजनादिक कर्म, ब्राह्मणको दान, गुणवती विद्याका संग्रहण तथा सन्मित्र—ये सदा सहायक होते हैं। जिन्होंने बाल्यकालसे विद्यार्जन नहीं किया है, जिनके द्वारा युवावस्थामें धन और स्त्रीकी प्राप्ति नहीं की जा सकी है, वे इस संसारमें शोकके पात्र हैं और मनुष्यरूप धारण करके पशुवत् विचरण करते हुए दुःखसे परिपूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं।

विद्याके उपासकको अध्ययन-कालमें भोजनकी चिंता नहीं करनी चाहिये। विद्यार्थीको विद्यार्जनके लिये गरुडके समान सुदूर देशको यथाशीघ्र पार कर लेना चाहिये।

जो बाल्यावस्थामें विद्याध्ययन नहीं करते हैं और फिर युवावस्थामें कामातुर होकर यौवन तथा धनको नष्ट कर देते हैं, वे वृद्धावस्थामें चिंतासे जलते हुए शिशिरकालमें कुहरेसे झुलसनेवाले कमलके समान संतप्त जीवन व्यतीत करते हैं।

शुष्क तर्क स्वयंमें अप्रतिष्ठित है, अतः किसी सिद्धान्तकी स्थापना केवल तर्कके द्वारा नहीं हो सकती। श्रुतियाँ भी अनेक प्रकारकी हैं। ऐसा कोई भी ऋषि नहीं है जो भिन्न-भिन्न प्रसंगोंमें विभिन्न सिद्धान्तोंका निर्देश न करे। इसीलिये धर्मका तत्त्व न तर्कोंमें निहित है, न श्रुतियोंमें निहित है, अपितु आप्तोंकी प्रज्ञामें निहित है। फलतः शिष्ट लोग जिस मार्गका अनुसरण करते हैं, उसी मार्गको अपना


१-स्वकर्मधर्मार्जितजीवितानां शास्त्रेषु दारेषु सदा रतानाम्॥
जितेन्द्रियाणामतिथिप्रियाणां गृहेऽपि मोक्षः पुरुषोत्तमानाम्॥ (१०९।४३)
२-न दानेन न मानेन नार्जवेन न सेवया। न शस्त्रेण न शास्त्रेण सर्वथा विषमाः स्त्रियः॥ (१०९।४५)