गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १९६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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समान दो ही स्थितियाँ होती हैं—या तो वह सबके सिरपर ही रहता है अथवा वनमें ही चला जाता है। मणि स्वर्णाभूषणमें संनिविष्ट करनेके योग्य होती है। यदि वह मणि लाखसे निर्मित आभूषणमें संनिहित की जाती है तो उस कुसंगतिके कारण वह न स्वयं संक्षुब्ध होकर विलाप करती है और न सुशोभित ही होती है। अश्व, गज, लौह, काष्ठ, पाषाण, वस्त्र, नारी, पुरुष तथा जल—इनमें परस्पर बहुत बड़ा अन्तर है।
तिरस्कृत होनेपर भी धैर्यसम्पन्न सज्जन व्यक्तिके गुण कभी भी आन्दोलित नहीं होते। दुष्टके द्वारा नीचे कर दी गयी अग्निकी भी शिखा कभी नीचे नहीं जाती।
उत्तम जातिका अश्व अपने स्वामीका चाबुक-प्रहार, सिंह-हाथीकी गर्जना और वीर पुरुष शत्रुपक्षकी भयंकर गर्जना सहन नहीं कर सकता।
यदि सज्जन मनुष्य दुर्भाग्यवश कदाचित् वैभवरहित हो जाता है तो भी वह न तो दुष्ट जनोंकी सेवा करनेकी अभिलाषा रखता है और न नीच जनोंका सहारा लेता है। भूखसे अत्यन्त पीड़ित होनेपर भी सिंह घास नहीं खाता, अपितु हाथियोंके गर्म रक्तका ही पान करता है।
जिस मित्रमें एक बार भी दुष्ट भाव परिलक्षित हो जाता है और पुनः उसीसे मैत्री सम्बन्ध स्थापित करनेकी जो इच्छा करता है, वह मानो अश्वतरी (खच्चरी)-के द्वारा धारण किये गये गर्भके सदृश मृत्युको ही प्राप्त करनेकी अभिलाषा रखता है।
शत्रुकी मृदुभाषी संतानोंकी उपेक्षा करना बुद्धिमान् जनोंके लिये उचित नहीं है; अर्थात् प्रिय बोलनेवाले शत्रुपुत्रोंसे भी सावधान रहना चाहिये; क्योंकि समय आनेपर वे ही असह्य दुःख-प्रदाता एवं विषपात्रके समान भयंकर विपत्ति उत्पन्न करनेवाले हो जाते हैं।
उपकारके द्वारा वशीभूत हुए शत्रुसे अन्य शत्रुको समूल उखाड़ फेंकना चाहिये, क्योंकि पैरमें गड़े हुए काँटेको मनुष्य हाथमें लिये हुए काँटेसे ही निकालता है।
सज्जन व्यक्तिको अपकारपरायण मनुष्यके नाशकी चिंता कभी नहीं करनी चाहिये; क्योंकि वह नदीके तटपर अवस्थित वृक्षोंकी भाँति स्वयं ही नष्ट हो जाता है।
अर्थका रूप धारण करनेवाले अनर्थ और अनर्थका रूप धारण करनेवाले अर्थ—ये दैवाधीन पुरुषके विनाशके लिये होते हैं। कभी-कभी कार्यकालके भेदसे निष्पाप बुद्धि उत्पन्न हो जाती है; क्योंकि दैवके अनुकूल रहनेपर पुरुषका सर्वत्र कल्याण ही होता है। धनार्जन करते समय, किसी भी प्रकारका प्रयोग करते समय, अपने कार्यको सिद्ध करते समय, भोजनके समय और सांसारिक व्यवहारके समय मनुष्यको लज्जाका परित्याग कर देना चाहिये।
जिस देश, प्रान्त, नगर एवं ग्राममें धनवान्, श्रोत्रिय, राजा, नदी तथा वैद्य—ये पाँच नहीं रहते हैं, वहाँ बुद्धिमान् व्यक्तिका रहना उचित नहीं है*। जहाँ आना-जाना न हो, जहाँ अनुचित आचरणको रोकनेके लिये भयकी सम्भावना न हो, लज्जा न हो तथा दानकी प्रवृत्ति न हो, वहाँ तो एक भी दिन निवास नहीं करना चाहिये। जिस देश-प्रान्तादिमें दैवज्ञ, वेदज्ञ, राजा, नदी एवं सज्जन व्यक्ति—इन पाँचका निवास नहीं है, वहाँपर निवास नहीं करना चाहिये।
हे शौनक! एक ही व्यक्तिमें सभी ज्ञान प्रतिष्ठित रूपमें नहीं रहते हैं। इसलिये यह सर्वमान्य है कि सभी व्यक्ति सब कुछ नहीं जानते हैं और कहींपर भी सभी सर्वज्ञ नहीं हैं। इस संसारमें न तो कोई सर्वविद् है और न कोई अत्यन्त मूर्ख ही है। उत्तम, मध्यम तथा निम्नस्तरीय ज्ञानसे जो व्यक्ति जितना जानता है, उसे उतनेमें विद्वान् समझा जाना चाहिये।
(अध्याय ११०)
* धनिनः श्रोत्रियो राजा नदी वैद्यस्तु पञ्चमः। पञ्च यत्र न विद्यन्ते न कुर्यात् तत्र संस्थितिम्॥ (११०। २६)