भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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काण्ड ] राजनीति-निरूपण [ १९७

राजनीति-निरूपण

सूतजीने कहा—राजाको चाहिये कि वह सदैव सबकी भलीभाँति परीक्षा करता रहे। सत्यपरायण तथा धर्मपरायण राजा ही नित्य राज्यका पालन करनेमें समर्थ होता है, उसे चाहिये कि वह शत्रुसेनाओंको जीतकर धर्मपूर्वक पृथिवीका पालन करे।

राजाको जंगलमें मालीके समान पुष्पवृक्षसे पुष्प ग्रहण करना चाहिये, किंतु कोयला बनानेवालेके समान वृक्षका मूलोच्छेद नहीं करना चाहिये। अर्थात् राज्यरूपी वनमें राजाको अपनी प्रजासे कर ग्रहण करते समय मालीके सदृश आचरण करना चाहिये, वृक्ष काटकर कोयला बनानेवाले अंगारकका आचरण उसके लिये सर्वथा त्याज्य है।

जिस प्रकार दूध दुहनेवाले दुग्धका पान करते हैं, किंतु विकृत हो जानेपर उसका उपभोग नहीं करते, उसी प्रकार राजाओंको चाहिये कि वे परराष्ट्रका उपभोग तो करें, किंतु उसको दूषित न करें।<sup></sup> जिस प्रकार दुग्ध-प्राप्तिके इच्छुक मनुष्य गौके स्तनसे दुग्ध तो निकाल लेते हैं, परंतु उसके स्तनको काटते नहीं; इसी प्रकार राजाके द्वारा प्रयुक्त इस नीतिसे अर्थात् कर-रूपमें सम्पूर्ण धन ग्रहण करनेसे पीड़ित राष्ट्र अभ्युदयको प्राप्त नहीं करता है। अतएव राजाको सब प्रकारसे पृथिवीका पालन करना चाहिये; क्योंकि ऐसे राजाके पास ही भूमि, कीर्ति, आयु, प्रतिष्ठा और पराक्रम विद्यमान रहते हैं।

नित्य भगवान् विष्णुकी पूजा करके जो धार्मिक राजा गौ-ब्राह्मणके हितमें रत रहता है, वही जितेन्द्रिय राजा प्रजाके पालनमें समर्थ हो सकता है।

ऐश्वर्य अस्थायी होता है। अतः प्राप्त हुए अस्थिर ऐश्वर्यमें आसक्त न होकर राजाको धर्माचरणमें अपनी बुद्धिको लगाना चाहिये। धन-सम्पत्ति आदि तो क्षणभरमें ही नष्ट हो जाता है, क्योंकि धन आदि अपने अधीन नहीं हैं।<sup></sup> मनको रमणीय लगनेवाली स्त्रियाँ सत्य हो सकती हैं, विभूतियाँ (धन-सम्पत्ति) भी सत्य हो सकती हैं, किंतु यह जीवन तो स्त्रीके कटाक्षपातकी भाँति चंचल (असत्य) है। शरीरमें स्थित वृद्धावस्था सिंहनीके समान भयभीत करती रहती है, रोग शत्रुकी भाँति शरीरमें उत्पन्न होते रहते हैं। आयु फूटे हुए घड़ेसे निकलते हुए जलके सदृश क्षीण होती जाती है, फिर भी इस संसारमें कोई भी मनुष्य आत्महित-चिन्तनमें प्रवृत्त नहीं होता।<sup></sup>

हे मनुष्यो! इस क्षणभंगुर जीवनमें आप सब निश्चिन्त क्यों हैं? दूसरेका हित करना ही उचित है, जो बादमें कल्याणकारी है। इस परोपकार-धर्मसे विपरीत कामिनियोंके मन्द-मन्द कटाक्षपातसे कामपीड़ित आप सबके द्वारा जो आनन्द प्राप्त किया जाता है, क्या उसीमें आप सभीका हित संनिहित है? ऐसे आचरणमें तो कभी भी हित सम्भव नहीं है। अतः इस प्रकारका पाप न करें। आप सभीको सदैव ब्राह्मण, विष्णु और उस परात्पर ब्रह्मका विधिवत् निरन्तर भजन करना चाहिये; क्योंकि जलमें डूबे हुए घटके समान आयु मृत्युके बहाने एक दिनमें ही समाप्त हो सकती है,


१-दोग्धारः क्षीरभुञ्जाना विकृतं तन्न भुञ्जते। परराष्ट्रं महीपालैर्भोक्तव्यं न च दूष्येत्॥ (१११।४)
२-ऐश्वर्यमध्रुवं प्राप्य राजा धर्मे मतिं चरेत्। क्षणेन विभवो नश्येन्नात्मायत्तं धनादिकम्॥ (१११।८)
३-सत्यं मनोरमाः कामाःसत्यं रम्या विभूतयः। किंतु वै वनितापाङ्गभङ्गलोलं हि जीवितम्॥
व्याघ्रीव तिष्ठति जरा परितर्जयन्ती रोगाश्च शत्रव इव प्रभवन्ति गात्रे।
आयुः परिस्रवति भिन्नघटादिवाम्भो लोको न चात्महितमाचरतीह कश्चित्॥ (१११।९-१०)