गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अथवा वह धीरे-धीरे नष्ट होती जाती है।
जो मनुष्य परायी स्त्रियोंमें मातृभाव रखता है, जो दूसरेके द्रव्योंको मिट्टी-पत्थरके ढेलेके समान नगण्य समझता है और सभी प्राणियोंमें अपने ही स्वरूपका दर्शन (आत्मदर्शन) करता है, वही विद्वान् है—
मातृवत्परदारेषु परद्रव्येषु लोष्टवत्।
आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः॥
(१११।१२)
हे ब्राह्मणो! सत्य तो यही है कि राजागण अपनी आत्माके लिये ही राज्यप्राप्तिकी कामना करते हैं और इसीलिये सभी कार्योंमें अपनी वाणीका उल्लंघन भी सहन नहीं करते हैं तथा धनका संचय भी इसीके लिये करते हैं, किंतु राजाको भी अपनी रक्षा करके शेष बचे हुए धनका उपयोग द्विजातियोंके भरण-पोषणमें करना चाहिये।
ब्राह्मणोंका मूल मन्त्र ॐकार है। इस ॐकारकी उपासनासे राष्ट्रकी अभिवृद्धि होती है और योगसे राजा वृद्धिको प्राप्त करते हैं और किसी भी प्रकारकी व्याधियाँ उसे बाँध नहीं सकतीं।
सब प्रकारसे असमर्थ मुनिजन भी द्रव्योपार्जन करते हैं, फिर पुत्रवत् प्रजाका पालन करते हुए अर्थका संग्रह करनेवाले राजाके विषयमें क्या कहा जा सकता है? धनसंचय करना तो उसके लिये आवश्यक ही है।
जिसके पास धन है, उसीके मित्र एवं बन्धु-बान्धव हैं। वही इस संसारमें पुरुष है और वही धन-सम्पन्न व्यक्ति विद्वान् है। धनरहित होनेपर मनुष्यको मित्र, पुत्र, स्त्री तथा परिजन छोड़ देते हैं। धनवान् होनेपर पुनः वे सभी उसीका आश्रय ग्रहण कर लेते हैं; क्योंकि इस संसारमें धन ही पुरुषका बन्धु है—
यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः।
यस्यार्थाः स पुमाँल्लोके यस्यार्थाः स च पण्डितः॥
त्यजन्ति मित्राणि धनैर्विहीनं पुत्राश्च दाराश्च सुहृज्जनाश्च।
ते चार्थवन्तं पुनराश्रयन्ति ह्यर्थो हि लोके पुरुषस्य बन्धुः॥
(१११।१७-१८)
जो राजा शास्त्रोंके ज्ञानसे शून्य है, वह नेत्रोंके रहते हुए भी अन्धेके समान है; क्योंकि अन्धा व्यक्ति तो अपने गुप्तचरके द्वारा देख सकता है, किंतु शास्त्र-ज्ञानसे रहित राजा देखनेमें असफल ही रहता है—
अन्धो हि राजा भवति यस्तु शास्त्रविवर्जितः।
अन्धः पश्यति चारेण शास्त्रहीनो न पश्यति॥
(१११।१९)
जिस राजाके पुत्र, भृत्य, मन्त्री एवं पुरोहित तथा इन्द्रियाँ प्रसुप्त रहती हैं अर्थात् अपने-अपने कर्तव्यके पालनमें सावधान नहीं रहती हैं, उसका राज्य निश्चित ही चिरस्थायी नहीं होता। जिस [ज्ञान-सम्पन्न] व्यक्तिने [बुद्धिमान् तथा आलस्यरहित] पुत्र, भृत्य एवं परिजन—इन तीनोंको योग्यरूपमें प्राप्त किया है, वह राजाओंके सहित चारों समुद्रसे संयुक्त पृथिवीपर विजय प्राप्त कर लेता है।
जो राजा शास्त्रसम्मत और युक्तियुक्त सिद्धान्तोंका उल्लंघन करता है, वह निश्चित ही इस लोक एवं परलोक—दोनोंमें नष्ट हो जाता है<sup>१</sup>।
आपत्कालके आनेपर राजाको दुःखी नहीं होना चाहिये, उसे समबुद्धि, प्रसन्नात्मा तथा सुख-दुःखमें समान रहना चाहिये। धैर्यवान् मनुष्य कष्ट प्राप्त करके भी दुःखी नहीं होते हैं, क्योंकि राहुके मुखमें प्रविष्ट होकर चन्द्र क्या पुनः उदित नहीं होता?<sup>२</sup> शरीरके लालन-पालनमें अनुरक्त जनोंके
१-लंघयेच्छास्त्रयुक्तानि हेतुयुक्तानि यानि च। स हि नश्यति वै राजा इह लोके परत्र च॥ (१११।२२)
२-धीराः कष्टमनुप्राप्य न भवन्ति विषादिनः। प्रविश्य वदनं राहोः किं नोदेति पुनः शशी॥ (१११।२४)