गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] राजाद्वारा सेवकोंके लिये अपनायी जाने योग्य भृत्यनीतिका निरूपण १९९
प्रति धिक्कार है! धिक्कार है!! मनुष्यको धनहीन होनेसे क्षीण हुए शरीरके प्रति भी खेद नहीं करना चाहिये। यह तो सुना ही गया है कि [पतिव्रता] पत्नीसहित पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर आदिने आपत्कालके दुःखसे मुक्त होकर पुनः सुख प्राप्त किया था। अतः अनुकूल समयकी प्रतीक्षा धैर्यके साथ करनी चाहिये।
गन्धर्व-विद्या, वाद्य, गणिकागण, धनुर्वेद और अर्थशास्त्रकी रक्षा राजाको करनी चाहिये, क्योंकि ये सभी अपनी-अपनी जगह राष्ट्रके लिये उपयोगी हैं। जो राजा भृत्यपर अकारण क्रोध करता है, वह काले भयंकर नागसे छोड़े गये विषसे ग्रस्त उन्मादको प्राप्त करता है।
राजाको कभी भी श्रोत्रियके प्रति, भृत्यके प्रति किं बहुना मानवमात्रके प्रति न कभी चपलदृष्टि रखनी चाहिये और न कभी भी मिथ्या वाक्यका प्रयोग करना चाहिये। जो राजा अपने योग्य भृत्य एवं योग्य स्वजनके बलपर गर्वित होकर शासनकी उपेक्षा करता है और मदान्ध होकर विलासी जीवन व्यतीत करता है, वह अति शीघ्र शत्रुओंसे पराजित हो जाता है।
राजाको क्रोधातुर होकर अहंकारमें भृकुटि टेढ़ी नहीं करनी चाहिये। जो राजा दोषरहित भृत्योंपर अधर्मपूर्वक शासन करता है, इस लोकमें उसके सभी विलासपूर्ण सुखोपभोग नष्ट हो जाते हैं। राजाको विलासी वस्तुओंका परित्याग कर देना चाहिये, परंतु धार्मिक राजाके सुखमें प्रवृत्त होनेपर भी उसके शत्रु युद्धमें पराजित हो जाते हैं।
उद्योग, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम—ये छः प्रकारके जो साहस कहे गये हैं, इनसे समन्वित राजासे देवता भी सशंकित रहते हैं। उद्योग करनेपर यदि व्यक्तिको कार्यमें सफलता प्राप्त नहीं होती है तो उसमें भाग्य ही कारण है, तथापि मनुष्यको सदा पुरुषार्थ करते रहना चाहिये। प्रयत्नसे विरत नहीं होना चाहिये, क्योंकि इस जन्मका ही पौरुष अगले जन्ममें भाग्य बनता है।*
(अध्याय १११)
राजाद्वारा सेवकोंके लिये अपनायी जाने योग्य भृत्यनीतिका निरूपण
श्रीसूतजीने कहा—उत्तम, मध्यम और अधम-भेदसे भृत्योंके तीन प्रकार जानना चाहिये। अतः उनकी योग्यताके अनुसार ही उन्हें विभिन्न कार्योंमें लगाना चाहिये।
सर्वप्रथम भृत्योंकी परीक्षण-विधिको कहा जा रहा है, साथ ही जिस-जिस भृत्यका जो गुण है, उसका भी वर्णन किया जा रहा है।
घर्षण, छेदन, तापन और ताडन—इन चार विधियोंसे जिस प्रकार सुवर्णकी परीक्षा की जाती है, उसी प्रकार राजाको व्रत, शील, कुल तथा कर्म—इन चार प्रकारोंसे भृत्यकी परीक्षा करनी चाहिये।
कुल, शील तथा सद्गुणसे सम्पन्न, सत्य-धर्मपरायण, रूपवान् तथा प्रसन्नचित्त मनुष्यको कोषाध्यक्षके पदपर नियुक्त करना चाहिये। द्रव्योंके मूल्य और रूपकी परीक्षा करनेमें कुशल व्यक्तिको रत्न-परीक्षकके पदपर नियुक्त करना चाहिये। जो सैन्य-शक्तिके बलाबलका परिज्ञान प्राप्त करनेमें
* उद्योगः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षड्विधो यस्य उत्साहस्तस्य देवोऽपि शंकते ॥
उद्योगेन कृते कार्ये सिद्धिर्यस्य न विद्यते। दैवं तस्य प्रमाणं हि कर्तव्यं पौरुषं सदा ॥ (१११।३२-३३)