गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २०० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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निपुण हो, उसीको सेनाध्यक्ष बनाना चाहिये।
जो व्यक्ति संकेतमात्रसे स्वामीके अभिप्रायको समझनेमें समर्थ है, बलवान् तथा सुन्दर शरीरवाला है, प्रमादहीन एवं जितेन्द्रिय है, उसको प्रतीहारके पदपर नियुक्त करनेके लिये कहा गया है। जो मेधावी, वाक्पटु, विद्वान्, सत्यवादी, जितेन्द्रिय और सभी शास्त्रोंकी सम्यक् आलोचना करनेवाला हो, वही सज्जन व्यक्ति लेखकके पदका अधिकारी है। जो बुद्धिमान्, विवेकशील, दूसरेके चित्तका परिज्ञाता, शूर तथा यथोक्तवादी है, उसे दूतके पदपर नियुक्त करना चाहिये। जो मनुष्य समस्त स्मृतियों और शास्त्रोंका पण्डित है, जितेन्द्रिय, शौर्य एवं पराक्रमादि गुणोंसे सम्पन्न है, उसे धर्माध्यक्षके पदपर नियुक्त करना चाहिये।
जिसके पितृ-पितामह आदिकी परम्परामें रसोइयेका ही काम होता रहा हो और जो विशेषरूपसे पाकशास्त्रका जाननेवाला, सत्यवादी, पवित्र एवं दक्ष हो, ऐसा पुरुष रसोइयेके लिये उचित होता है।
जो आयुर्वेदशास्त्रका सम्यक् ज्ञान रखनेवाला, सौम्य स्वरूपसे सम्पन्न, सभीके लिये देखनेमें प्रिय लगनेवाला, आयु, शील और गुणोंसे सम्पन्न हो, वह वैद्यके पदका अधिकारी होता है। वेद-वेदाङ्गके तत्त्वोंको जाननेमें समर्थ, जप-होमपरायण, नित्य आशीर्वाद देनेमें तत्पर (अर्थात् राजाकी मङ्गलकामनामें अहर्निश दत्तचित्त) विद्वान् राजपुरोहितके योग्य होता है।
यदि लेखक, पाठक, गणक, प्रतिरोधक (प्रतीहार) आदि पदाधिकारी कार्य करनेमें आलस्य करते हों तो राजा सदैव उनको उस कार्यसे पृथक् कर दे।
जो दो प्रकारकी बात करता है, उद्वेगकर वाणी बोलता है, क्रूरकर्मा है तथा अत्यन्त दारुण है, ऐसे दुष्ट व्यक्ति और सर्पका मुख—ये मात्र दूसरेके अपकारके लिये ही होते हैं। विद्यासे सुशोभित होनेपर भी दुर्जन व्यक्तिका परित्याग कर देना चाहिये, मणिसे अलंकृत सर्प क्या भयंकर नहीं होता?<sup>१</sup>
अकारण क्रोध करनेवाले दुष्टसे किस व्यक्तिको भय नहीं रहता? अर्थात् ऐसे दुष्टसे सभी भयभीत रहते हैं; क्योंकि महाभयंकर नागराजका विष तथा दुष्टका कुत्सित वचन दूसरेके लिये असहनीय होता ही है।
राजाको अपने समान धन-वैभवसे सम्पन्न, पौरुष और ज्ञानमें समकक्ष एवं अपने रहस्यको जाननेवाले और उद्योगशील भृत्यको पूर्णरूपसे निष्प्रभावी बना देना चाहिये, अन्यथा राजा निश्चित ही अपने राज्यसे भ्रष्ट हो जाता है; क्योंकि ऐसा भृत्य राज्यका अपहारक ही होता है।
आरम्भमें जो भृत्य शूरता दिखाये, मधुर और धीमे वाक्य बोले, जितेन्द्रियके रूपमें स्वयंको प्रदर्शित करे और साथ ही पराक्रमशीलता भी प्रदर्शित करे पर बादमें इसके विपरीत आचरण करे, ऐसे भृत्य हितैषी नहीं होते। आलस्यरहित, अच्छी तरहसे संतुष्ट, अनिद्रारोगसे रहित, सदा सजग रहनेवाले, सुख-दुःखमें स्थिर-मतिवाले तथा धैर्यसम्पन्न भृत्य इस जगत्में दुर्लभ हैं।<sup>२</sup> क्षमासे रहित, सत्यविहीन, क्रूरबुद्धि, निन्दक, अहंकारी, कपटी, शठ, लोभी, पौरुषहीन और भयभीत होनेवाला भृत्य राजाके लिये त्याज्य है। ऐसे व्यक्तिको किसी भी राज्य-कार्यमें नियुक्त नहीं करना चाहिये।
राजाको दुर्ग (किले)-में संधान किये जाने योग्य अस्त्र तथा विविध प्रकारके शस्त्रोंका अच्छी प्रकारसे
१-दुर्जनः परिहर्त्तव्यो विद्ययाऽलङ्कृतोऽपि सन्। मणिना भूषितः सर्पः किमसौ न भयङ्करः ॥ (११२। १५)
२-निरालस्याः सुसंतुष्टाः सुस्वप्नाः प्रतिबोधकाः। सुखदुःखसमा धीरा भृत्या लोकेषु दुर्लभाः॥ (११२।१९)