भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२०४संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

इसीलिये मैं कर्मफलके विषयमें चिन्ता नहीं करता हूँ और न मुझे आश्चर्य ही है, क्योंकि जो मेरा है, उसे दूसरा कोई नहीं ले सकता—

प्राप्तव्यमर्थं लभते मनुष्यो देवोऽपि तं वारयितुं न शक्तः। अतो न शोचामि न विस्मयो मे यदस्मदीयं न तु तत्परेषाम्॥ (११३।३२)

जैसे साँप, हाथी और चूहा—ये शीघ्रतावश क्रमशः कुआँ, अपने वासस्थान तथा बिलतक ही भाग सकते हैं, इससे आगे कहाँतक जा सकते हैं ? इसी तरह अपने कर्म अथवा भाग्यसे कौन भाग सकता है? सब तो उसीके अधीन हैं।

सद्विद्या देनेसे उसी प्रकार बढ़ती रहती है कम नहीं होती, जिस प्रकार कुएँसे जल ग्रहण कर लेनेपर भी कुएँका जल बढ़ता ही रहता है [घटता नहीं]। जो धन धर्मानुसार अर्जित किया जाता है वही [वास्तविक] धन है। अधर्मसे प्राप्त हुआ धन तो मनुष्यके ऐश्वर्यका नाशक होता है। इस संसारमें धर्मार्थी ही महान् होता है। धनकी अपेक्षा करनेवाले मनुष्यको निश्चित ही श्रेष्ठजनोंके दृष्टान्तोंको स्मरण करके धनोपार्जनमें तत्पर होना चाहिये। अन्नार्थी कृपण व्यक्ति जिन दुःखोंको भोगता है, यदि धर्मार्थी होकर वह उन दुःखोंका चिन्तन करे तो पुनः उसको दुःखका पात्र होना ही न पड़े। सभी प्रकारकी शुचितामें अन्नकी शुचिता ही प्रधान है। जो मनुष्य अन्न और अर्थसे पवित्र है [वही शुचि है]। केवल मिट्टी और जलसे शुचिता नहीं आती।*

सत्यपालनमें शुचिता, मनःशुद्धि, इन्द्रियनिग्रह, सभी प्राणियोंमें दया और जलसे प्रक्षालन—ये पाँच प्रकारके शौच माने गये हैं। जिसमें सत्यपालनकी शुचिता है, उसके लिये स्वर्गकी प्राप्ति दुर्लभ नहीं है। जो मनुष्य सत्य ही सम्भाषण करता है, वह अश्वमेधयज्ञ करनेवाले व्यक्तिसे भी बढ़कर है—

सत्यं शौचं मनःशौचं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। सर्वभूते दया शौचं जलशौचं च पञ्चमम्॥ यस्य सत्यं हि शौचं च तस्य स्वर्गो न दुर्लभः। सत्यं हि वचनं यस्य सोऽश्वमेधाद्विशिष्यते॥ (११३।३८-३९)

दुष्ट स्वभावसे अपनी आत्माको दबाकर रखनेवाला दुराचारी पुरुष हजारों बार मिट्टीके लेप तथा सैकड़ों बार जलके प्रक्षालनसे पवित्र नहीं हो सकता। जिसके हाथ-पैर एवं मन सुसंयत हैं, जिसे अध्यात्म-विद्या प्राप्त है, जो धर्मपालनके लिये कष्ट सहन करता है तथा जिसने सत्कीर्ति अर्जित की है, वही तीर्थोंका यथार्थ फल भी भोगता है—

यस्य हस्तौ च पादौ च मनश्चैव सुसंयतम्। विद्या तपश्च कीर्तिश्च स तीर्थफलमश्नुते॥ (११३।४१)

जो मनुष्य सम्मानसे प्रसन्न नहीं होता, अपमानसे क्रुद्ध नहीं होता एवं क्रोधके आनेपर मुँहसे कठोर वाक्य नहीं निकालता, ऐसे ही मनुष्यको साधुपुरुष समझना चाहिये—

न प्रहृष्यति सम्मानैर्नावमानैः प्रकुप्यति। न क्रुद्धः परुषं ब्रूयादेतत् साधोस्तु लक्षणम्॥ (११३।४२)

विद्वान्, मधुरभाषी भी कोई व्यक्ति यदि दरिद्र है तो उसके समयोचित हितकारी वचनको सुनकर भी कोई संतुष्ट नहीं होता है। यदि कोई मनुष्य


* येऽर्था धर्मेण ते सत्या येऽधर्मेण गताः श्रियः। धर्मार्थी च महाँल्लोके तत् स्मृत्वा ह्यर्थकारणात्॥
अन्नार्थी यानि दुःखानि करोति कृपणो जनः। तान्येव यदि धर्मार्थी न भूयः क्लेशभाजनम्॥
सर्वेषामेव शौचानामन्नशौचं विशिष्यते। योऽन्नार्थैः शुचिः शौचान्न मृदा वारिणा शुचिः॥ (११३।३५-३७)