गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] नीतिसार २०५
मन्त्र या बलके प्रभावसे अथवा बुद्धि और पौरुषके बलपर अलभ्य-अदृष्ट वस्तुको प्राप्त नहीं कर पा रहा है तो उस विषयमें मनुष्यको किसी प्रकारका खेद नहीं करना चाहिये।
अयाचित कोई वस्तु मुझे प्राप्त हो और पुनः वह मेरे पाससे चली जाय तो कष्ट होता है, किंतु जो जहाँसे आयी थी वह पुनः वहीं चली गयी तो उसमें कैसा दुःख? दुःख करनेका कोई औचित्य ही नहीं है। रात्रिमें सदैव एक ही वृक्षपर नाना प्रकारके पक्षियोंका समूह शरण लेता है, किंतु प्रातःकाल होते ही वे सभी भिन्न-भिन्न दिशाओंमें चले जाते हैं। उस आश्रयके विषयमें उन लोगोंको कौन-सा दुःख होता है? इसी दृष्टान्तको ध्यानमें रखकर मनुष्योंको वियोगजन्य दुःखमें खिन्न नहीं होना चाहिये। एक साथ सामूहिक रूपमें चलनेवालोंमें यदि कोई एक त्वरित गतिसे चल रहा है तो उससे ईर्ष्या क्यों की जाय?
हे शौनक! सभी प्राणियों या पदार्थोंकी उत्पत्तिके पूर्वमें स्थिति नहीं थी और निधनके अन्तमें भी उनकी स्थिति नहीं रहेगी। सभी पदार्थ मध्यमें ही विद्यमान रहते हैं। इसमें दुःख करनेकी क्या बात है—
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि शौनक।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥
(११३।४८)
समय प्राप्त न होनेसे पहले प्राणी सैकड़ों बाण लगनेपर भी नहीं मरता और समयके आ जानेपर कुशकी नोंक लग जानेसे भी वह जीवित नहीं रहता¹। प्राप्त होने योग्य वस्तु ही प्राप्त होती है, गन्तव्य स्थानपर ही व्यक्ति जाता है। अतः प्राणीको जो दुःख-सुख प्राप्त होने योग्य है वही उसको प्राप्त होता है।
मनुष्य प्राप्त होने योग्य अमुक-अमुक वस्तुको ही प्राप्त करता है तो वह अभिलषित वस्तुके लिये नाना प्रकारसे प्रयास करके क्या प्राप्त कर लेगा? उसका तो अपनेको अभावग्रस्त समझकर प्रलाप करना व्यर्थ ही है।
जिस प्रकार प्रार्थना आदिके बिना ही यथासमय वृक्षके द्वारा प्राणीको अपने समयपर ही फल-फूलकी प्राप्ति हो जाती है, उसी प्रकार पूर्वजन्मकृत कर्म भी अपने समयके अनुसार यथोचित फल देता है। व्यक्तिमें अवस्थित शील, कुल, विद्या, ज्ञान, गुण तथा कुल-शुद्धि उसको कुछ देनेमें समर्थ नहीं हैं। पूर्वजन्मकृत तपसे प्राप्त हुआ उसका भाग्य ही समयके अनुसार वृक्षकी भाँति उसे फल देता है²।
प्राणीकी मृत्यु वहाँ होती है, जहाँ उसका हन्ता विद्यमान रहता है। लक्ष्मी वहीं निवास करती है, जहाँ सम्पत्तियाँ रहती हैं। ऐसे ही अपने कर्मसे प्रेरित होकर प्राणी स्वयं ही उन-उन स्थानोंपर पहुँच जाता है। पूर्वजन्ममें किया गया कर्म कर्ताके पीछे-पीछे वैसे ही रहता है, जैसे गोष्ठमें हजार गायोंके रहनेपर भी बछड़ा अपनी माताको प्राप्त कर लेता है—
तत्र मृत्युर्यत्र हन्ता तत्र श्रीर्यत्र सम्पदः।
तत्र तत्र स्वयं याति प्रेर्यमाणः स्वकर्मभिः॥
भूतपूर्वं कृतं कर्म कर्तारमनुतिष्ठति।
यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो विन्दति मातरम्॥
(११३।५३-५४)
हे मूर्ख प्राणी! इस प्रकार जब पूर्वजन्मकृत कर्म कर्तामें ही अवस्थित रहता है तो अपने
१-नाप्राप्तकालो म्रियते विद्धः शरशतैरपि। कुशाग्रेण तु संस्पृष्टः प्राप्तकालो न जीवति॥
२-आचोद्यमानानि यथा पुष्पाणि च फलानि च। स्वकालं नातिवर्तन्ते तथा कर्म पुराकृतम्॥ (११३।४९)
शीलं कुलं नैव च चैव विद्या ज्ञानं गुणा नैव न बीजशुद्धिः।
भाग्यानि पूर्वं तपसार्जितानि काले फलन्त्यस्य यथैव वृक्षाः॥ (११३।५१-५२)