गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २१२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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मनुष्यको हजारों चिन्ताएँ होती हैं, किंतु उन चिन्ताओंके मध्य चार चिन्ताएँ ऐसी हैं जो तलवारकी धारके समान अत्यन्त तीक्ष्ण हैं, यथा—नीच व्यक्तिसे प्राप्त अपमानकी चिन्ता, भूखसे पीड़ित पत्नीकी चिन्ता, अनुग्रहहीन भार्याकी चिन्ता तथा कार्यमें स्वाभाविक रूपसे उत्पन्न अवरोधकी चिन्ता। ये मनुष्यके मर्मस्थलपर तलवारकी धारके समान कष्ट पहुँचाती हैं।
अनुकूल पुत्र, अर्थकरी विद्या, आरोग्य शरीर, सत्संगति तथा मनोऽनुकूल वशवर्तिनी पत्नी—ये पाँच पुरुषके दुःखको समूल नष्ट करनेमें समर्थ हैं<sup>१</sup>।
मृग, हाथी, कीट, भ्रमर और मत्स्य—ये पाँच क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, गन्ध और रस—इन पाँचों प्रमादी विषयोंमें एक-एकका सेवन करनेपर ही नष्ट हो जाते हैं, परंतु जो मनुष्य पाँचों विषयोंका पाँचों इन्द्रियोंसे सेवन करता है, तो वह क्यों नहीं मारा जायगा—
कुरङ्गमातङ्गपतङ्गभृङ्ग-
मीना हताः पञ्चभिरेव पञ्च।
एकः प्रमादी स कथं न घात्यो
यः सेवते पञ्चभिरेव पञ्च॥
(११५। २१)
धैर्यरहित, रूक्ष स्वभाववाले, गतिहीन, मलिन वस्त्राच्छादित और अनाहूत (बिना बुलाये सभा-उत्सवादिमें उपस्थित होनेवाले)—ये पाँच प्रकारके ब्राह्मण बृहस्पतिके समान होनेपर भी पूजे नहीं जाते हैं। आयु, कर्म, धन, विद्या और मृत्यु—ये पाँच जन्मसे ही सुनिश्चित रहते हैं—
आयुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च।
पञ्चैतानि विविच्यन्ते जायमानस्य देहिनः॥
(११५। २३)
मेघकी छाया, दुष्टका प्रेम, परनारीका साथ, यौवन और धन—ये पाँच अस्थिर हैं। संसारमें प्राणीका जीवित रहना अस्थिर है, उसका धन और यौवन अस्थिर है तथा उसके स्त्री-पुत्र आदि अस्थिर हैं, किंतु उसका धर्म, कीर्ति और यश चिरस्थायी होता है—
अभ्रच्छाया खले प्रीतिः परनारीषु संगतिः।
पञ्चैते ह्यस्थिरा भावा यौवनानि धनानि च॥
अस्थिरं जीवितं लोके अस्थिरं धनयौवनम्।
अस्थिरं पुत्रदाराद्यं धर्मः कीर्तियशः स्थिरम्॥
(११५। २४-२६)
सौ वर्षका जीवन भी बहुत कम है, क्योंकि परिमित आयुका आधा भाग रात्रियोंमें ही व्यतीत हो जाता है। शेष बचे हुए समयका आधा भाग व्याधि, दुःख तथा वृद्धावस्थामें निष्क्रियताके कारण व्यतीत हो जाता है। मनुष्यकी आयु सौ वर्ष मानी गयी है। आयुका आधा भाग रात्रियोंमें ही समाप्त हो जाता है। उसकी शेष आधी ही आयु बचती है, जिसमेंसे आधेसे कुछ अधिक भाग बाल्यावस्थामें बीत जाता है, कुछ भाग परिजनोंके वियोग, उनकी दुःखदायी मृत्युसे प्राप्त कष्ट तथा राजसेवामें चला जाता है। इसके बाद जो आयुका शेष भाग बचता भी है, वह जलतरंगके समान चंचल होनेके कारण बीचमें ही विनष्ट हो जाता है। अतः लोगोंको मानसे क्या लाभ हो सकता है?
मृत्यु दिन-रात वृद्धावस्थाके रूपमें लोकमें विचरण करती रहती है। वह प्राणियोंको वैसे ही अपना ग्रास बनाती है, जैसे सर्प वायुका ग्रास करता है।
चलते हुए, रुकते हुए, जागते हुए और सोते हुए भी व्यक्ति यदि सभी प्राणियोंके हितके लिये चेष्टा नहीं करता है तो उसकी समस्त चेष्टा पशुवत् ही है<sup>२</sup>। हित और अहितके विचारसे शून्य बुद्धिवाले, वेद-पुराण तथा शास्त्रोंकी चर्चाके समय अत्यधिक तर्क-वितर्क करनेवाले एवं उदरपूर्तिमात्रमें संतुष्ट-
१-वश्यश्च पुत्रोऽर्थकरी च विद्या अरोगिता सज्जनसङ्गतिश्च। इष्टा च भार्या वशवर्तिनी च दुःखस्य मूलोद्धरणानि पञ्च॥ (११५।२०)
२-गच्छतस्तिष्ठतो वापि जाग्रतः स्वपतो न चेत्। सर्वसत्त्वहितार्थाय पशोरिव विचेष्टितम्॥ (११५।३०)