भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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काण्ड ] नीतिसार २१३


बुद्धिवाले पुरुष और पशुके बीच कौन ऐसा वैशिष्ट्य है जिसके अनुसार उन दोनोंमें अन्तर स्पष्ट किया जा सके ?

पराक्रम, तप, दान, विद्या तथा अर्थ-लाभमें जिस मनुष्यकी कीर्ति संसारमें प्रसिद्ध नहीं हुई, वह माताके द्वारा परित्याग किये गये मलके समान ही है। विज्ञान, पराक्रम, यश और अक्षुण्ण सम्मानसे युक्त होकर क्षणमात्र भी जो मनुष्य जीवन धारण करता है, विज्ञ लोग उसीके जीवनको जीवन मानते हैं। वैसे तो कौआ भी बहुत समयतक बलि-भक्षण करते हुए जीवित रहता ही है। धन-मानसे रहित जीवनसे क्या लाभ ? भयसे सशंकित मित्रसे क्या हो सकता है ? [इसलिये] विषादका परित्यागकर सिंहव्रत अर्थात् पराक्रमका आचरण करना चाहिये। अन्यथा कौआ भी तो बलिका भक्षण करते हुए बहुत समयतक जीवित रहता ही है। जो मनुष्य इस संसारमें अपने प्रति तथा गुरु, नौकर-चाकर और दीन-दुःखीके प्रति दयाभाव नहीं रखता है और मित्रके कार्यमें सहयोग नहीं करता है, मनुष्यलोकमें उसके जीवित रहनेसे क्या लाभ ? अरे, कौआ भी बहुत समयतक जीवित रहता है और मनुष्योंके द्वारा दिये गये बलिभागके अन्नको ही जीवनभर खाता है<sup></sup>

धर्म, अर्थ और काम—इस त्रिवर्गकी क्रियासे रहित जिस मनुष्यके दिन आते हैं और चले जाते हैं, ऐसा व्यक्ति लुहारकी धौंकनीके समान ही है, जो कि श्वास लेते हुए भी जीवित नहीं है।

स्वाधीन रहकर आचरण करनेवाले मनुष्यका जीवन सफल है। पराधीन रहकर जीवन व्यतीत करनेवालेका जीवन तो व्यर्थ है। जो परतन्त्र रहकर जीवन-यापन करते हैं, वे तो जीवित रहते हुए भी मरेके समान हैं<sup></sup>

आकाशमें घिरे हुए बादलोंकी छाया, तिनकेसे आग, नीचकी सेवा, मार्गमें दृष्टिगोचर हुआ जल, वेश्याका प्रेम और दुष्टके अन्तःकरणमें उत्पन्न हुई प्रीति—ये छः जलमें उठने और तत्काल विलुप्त होनेवाले बुलबुलेके सदृश ही क्षणभंगुर होते हैं—

अभ्रच्छाया तृणादग्निर्नीचसेवा पथो जलम्।
वेश्यारागः खले प्रीतिः षडेते बुद्बुदोपमाः॥

<p align="right">(११५।३९)</p>

केवल वाणीके द्वारा किये गये हित-सम्पादनसे मनुष्यको सुख नहीं प्राप्त होता। जीवनका मूल तो मान है। मानके नष्ट हो जानेपर मनुष्यके लिये सुख कहाँ होता है ?

निर्बलका बल राजा है, बालकका बल रोना है, मूर्खका बल मौन धारण कर लेना है और चोरका बल असत्य है<sup></sup>। मनुष्य जैसे-जैसे शास्त्र-ज्ञान प्राप्त करता जाता है, वैसे-वैसे उसकी बुद्धि बढ़ती रहती है और विज्ञान प्राप्त करनेमें रुचि होती जाती है। मनुष्य जैसे-जैसे जनकल्याणमें अपनी बुद्धिको संयुक्त करता है, वैसे-वैसे ही वह सर्वत्र सभीका प्रिय पात्र बन जाता है—

यथा यथा हि पुरुषः शास्त्रं समधिगच्छति।
तथा तथास्य मेधा स्याद्विज्ञानं चास्य रोचते॥
यथा यथा हि पुरुषः कल्याणे कुरुते मतिम्।
तथा तथा हि सर्वत्र श्लिष्यते लोकसुप्रियः॥

<p align="right">(११५।४२-४३)</p>

लोभ, प्रमाद और विश्वास—इन तीनके कारण व्यक्तिका विनाश होता है। अतएव प्राणीको लोभ,


१-यो वात्मनीह न गुरौ न च भृत्यवर्गे दीने दयां न कुरुते न च मित्रकार्ये।
किं तस्य जीवितफलेन मनुष्यलोके काकोऽपि जीवति चिरं च बलिं च भुङ्क्ते॥ (११५।३५)
२-स्वाधीनवृत्तेः साफल्यं न पराधीनवर्त्तिता। ये पराधीनकर्माणो जीवन्तोऽपि च ते मृताः॥ (११५।३७)
३-अबलस्य बलं राजा बालस्य रुदितं बलम्। बलं मूर्खस्य मौनं हि तस्करस्यानृतं बलम्॥ (११५।४१)