भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२९४ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

प्रमाद और विश्वास नहीं करना चाहिये। मनुष्यको भयसे उसी समयतक भयभीत रहना चाहिये, जिस समयतक उसका आगमन नहीं हो जाता। तीव्र भयके उपस्थित हो जानेपर तो उसे निर्भीक होकर उसका सामना करना चाहिये<sup></sup>

ऋण, अग्नि तथा व्याधिके शेष रहनेपर वे बार-बार बढ़ते जाते हैं। अतः उनका शेष रखना उचित नहीं है—

ऋणशेषं चाग्निशेषं व्याधिशेषं तथैव च।
पुनःपुनः प्रवर्धन्ते तस्माच्छेषं न कारयेत्॥
(११५।४६)

परोक्ष-रूपमें कार्यको नष्ट करनेवाले तथा सामने मधुर बोलनेवाले मित्रका, मायावी शत्रुके भाँति परित्याग कर देना चाहिये—

परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्।
वर्जयेत् तादृशं मित्रं मायामयमरिं तथा॥
(११५।४८)

दुष्टका साथ करनेसे सज्जन मनुष्य भी विनष्ट हो जाता है, क्योंकि सुन्दर-स्वच्छ पेय जल कीचड़के मिल जानेसे दूषित हो जाता है—

दुर्जनस्य हि संगेन सुजनोऽपि विनश्यति।
प्रसन्नमपि पानीयं कर्दमैः कलुषीकृतम्॥
(११५।४९)

जिस व्यक्तिका धन ब्राह्मणके लिये [समर्पित] होता है, वही [धनका] सम्यक् उपभोग करता है। इसलिये सभी प्रकारसे प्रयत्नपूर्वक द्विजकी पूजा करनी चाहिये। जो द्विजके उपभोगसे बचे हुए पदार्थोंका उपभोग करता है, वही उत्तम भोजन है। जो पाप नहीं करता, वही बुद्धिमान् है। जो पीठ-पीछे हित-सम्पादन किया जाता है, वही मित्र-भाव है और जो दिखावेके बिना (दम्भरहित) धर्म किया जाता है, वही वास्तविक धर्माचरण है<sup></sup>

वह सभा सभा नहीं होती, जिसमें वृद्ध जन नहीं होते। वे [वृद्ध] वृद्ध नहीं माने जाते, जो धर्मका उपदेश नहीं देते। वह [धर्म] धर्म नहीं है, जिसमें सत्यका वास नहीं होता। वह [सत्य] सत्य नहीं है, जो कपटसे अनुप्राणित रहता है—

न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः
वृद्धा न ते ये न वदन्ति धर्मम्।
धर्मः स नो यत्र न सत्यमस्ति
नैतत् सत्यं यच्छलेनानुविद्धम्॥
(११५।५२)

मनुष्योंमें ब्राह्मण, तेजमें आदित्य, शरीरमें सिर और व्रतोंमें सत्य ही श्रेष्ठतम व्रत है।

जहाँ मनको प्रसन्नताकी प्राप्ति हो, वहीं प्राणीका मङ्गल है। दूसरेकी सेवामें समर्पित जीवन ही यथार्थ जीवन है। जो उपार्जित धन स्वजनोंके द्वारा उपभोग्य है, वही धन सार्थक है। युद्धभूमिमें शत्रुके सामने की गयी गर्जना ही वास्तविक गर्जना है। स्त्री वही श्रेष्ठ है, जो मदोन्मत्त नहीं हो। तृणारहित व्यक्ति ही सुखी होता है। जिसपर विश्वास किया जाय, वही मित्र है और जो जितेन्द्रिय होता है, वही वास्तविक पुरुष है।

राज्यका ऐश्वर्य क्रुद्ध ब्राह्मणके शापसे विनष्ट हो जाता है, ब्राह्मणका तेज पापाचार करनेसे नष्ट हो जाता है, अशिक्षित गाँवमें निवास करनेसे ब्राह्मणका सदाचार समाप्त हो जाता है और दुष्ट स्त्रियोंके साहचर्यसे कुलका विनाश हो जाता है। सभी संग्रहोंका अन्त क्षय है और सभी उत्कर्षोंका अन्त पतन है। संयोगका अन्त वियोग है और जीवनका अन्त मरण है।

मनुष्यको राजासे रहित राज्यमें और बहुत राजाओंवाले राज्यमें निवास नहीं करना चाहिये। इसी प्रकार जहाँ स्त्रीका नेतृत्व हो या बालनेतृत्व


<sup></sup>तावद्भयस्य भेतव्यं यावद्भयमनागतम्। उत्पन्ने तु भये तीव्रे स्थातव्यं वै ह्यभीतवत्॥ (११५।४५)
<sup></sup>तद्भुज्यते यद्द्विजभुक्तशेषं स बुद्धिमान् यो न करोति पापम्। तत्सौहृदं यत्क्रियते परोक्षे दम्भैर्विना यः क्रियते स धर्मः॥ (११५।५१)